Thursday, March 8, 2012

रिपोर्ट

                     राजेन्द्र यादव के बारे में मेरी राय

      तब आरकुट था। साइबर कैफे जाकर ओनर्स के नोट्स कलेक्ट करने के अलावे आरकुट की लत भी लग चुकी थी। गुजरात दंगे पर लिखी एक कविता को आईआईएमसी के एनुअल डे पर बड़े ही प्रभावशाली तरीके से रखने वाली एक युवा कवयित्री को मैंने आरकुट पर सर्च करके खोज लिया था। उन्होंने मेरा फ्रेंडशिप रिक्वेस्ट एक्सेप्ट कर लिया। फिर एक दिन चेट करते हुये मैंने पूछ ही लिया कि आप जिंदगी को किस तरह जीना चाहती हैं? जवाब था ‘मैं अपनी शर्तों पर जीना चाहती हूं।‘ जेएनयू कैम्पस के बच्चे समाज को लेकर इतनी पृथक सोच क्यूं रखने लगते हैं पता नहीं! मैं भी यहां आने से पहले इतना जिद्दी, बदमाश, जातिवादी, सांप्रदायिक, अनुशासनहीन, असंवेदनशील, कट्टर वगैरह वगैरह नहीं था, अब हूं।
          अपनी शर्तों पर जीना आखिर कैसा होता है! क्या अपनी शर्तों पर जीना संभव है? कैसा होता है अपनी शर्तों पर जीना? कौन से लोग होते हैं जो ऐसा करते हैं? उनकी पृष्ठभूमि क्या होती होगी और पारंपरिक समाज के तानेबाने को वह किस तरह से देखते होंगे? वगैरह वगैरह।
           पिछले दिनों राजेन्द्र यादव से संयोग से मुलाकात हुई। एक न्यूज पोर्टल के संपादक उनसे मिलने जा रहे थे, सो उन्होंने मुझे भी साथ कर लिया। हम दोनों उन्हीं की गाड़ी से नोएडा फेज 2 स्थित उनके आवास पर पहुंचे। हर्निया का आपरेशन कराकर राजेन्द्र यादव स्वास्थ्य लाभ कर रहे थे। कई साहित्यकारों, पत्रकारों और कार्यकर्ताओं ने उन्हें सम्मानित करने के लिये एक सम्मान समारोह का आयोजन किया था। 
          राजेन्द्र यादव से मेरी पहली मुलाकात एबान ए गालिब में हुई थी। हंस का 25वां सालगिरह था और वाद विवाद मचना तय था। अग्निवेश, विभूति नारायण राय, अरूंधती राय, आनंद प्रधान, आलोक मेहता सरीखे बौद्धिक आतंकवादी के आने की योजना थी, सो चाह कर भी खुद को रोक नहीं पाया। जिसका अंदाजा था वही हुआ और कार्यक्रम के आखिर होते होते आंध्रप्रदेश में फर्जी एनकाउंटर में मारे गए पत्रकार हेमचंद्र पांडे पर आलोक मेहता लपेट लिये गए और विभूति नारायण राय और अग्निवेश में खूब चीख पुकार मची। पुण्य प्रसून वाजपाई भी पशोपेश में दिखे और फाइनली राजेन्द्र यादव को लेकर मेरी यह धारणा पुष्ट हुई कि वह आदमी गजब की काबिलियत अपने में समेटे हुए है।
       खैर, सम्मान समारोह में हमसे पहले भी कई लोग पहुंचे हुए थे। दिलीप मंडल ने हाथ बढाते हुए जोशीले अंदाज में गुड मोर्निंग विश किया और फिर सरकते सरकते मैं और यशवंत जी कुर्सी पर बैठ गये। कार्यक्रम शुरू हुआ। फूलों का गुलदस्ता और भावनात्मक भाषणवाजी के बाद बारी आई राजेन्द्र यादव की। एक जघन्य हिन्दी लेखक। कई बातें कह गये लेकिन माइक की व्यवस्था न होने के कारण सुन नहीं सका। इसी बीच आगे खड़े दो सज्जनों के बीच से जो दिखा वो था धुंआ। राजेन्द्र सिगरेट पी रहे थे। चैंकना स्वाभाविक था। इस मौके पर सिगरेट! मैं अब खड़ा होकर सरकते सरकते उनके पास जा पहुंचा और उन्हें गौर से सुनने लगा। वर्जनाओं और बंधनों के खिलाफ इतना गुस्सा और अपनी शर्तों पर जिंदगी जीने की इतनी जिद मैंने पहले किसी आदमी में नहीं देखी थी। फोर्टिस अस्पताल के डाक्टरों ने राजेन्द्र को एक इलेक्ट्रिक सिगरेट दे रखी थी, ताकि वह अपनी आदत को बनाये रखते हुए सिगरेट से दूर रहे सकें लेकिन राजेन्द्र यादव उन लोगों में से हैं जो जबतक जीता है अपने मनमाफिक जीता है। अपनी शर्तों पर जीने की ऐसी जिद मैंने शायद ही पहले कभी देखी थी। 



अजीत अंजुम बेगूसराय से ही हैं  और बड़े खुशमिजाज टाइप के आदमी हैं    

राजेन्द्र यादव जैसे लोग ही सामाजिक न्याय के लिए लड़ सकते हैं 


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