Thursday, March 8, 2012

लव या अरैंज


                 लव मैरेज की असफलता के बहाने


        राकेश उन दोस्तों में से है, जिसके साथ पतंगवाजी के अलावे क्रिकेट, पीट्टो, चेस, वीडियोगेम खेलने के अलावे बचपन की कई बदमाशियों को अंजाम दिया था। सुमित और राकेश के बीच एक बार लव मैरेज की विफलता पर मैराथन बहस छिड़ गई थी। चूंकि हम सब अच्छे दोस्त थे इसलिये उस बहस में मेरा हस्तक्षेप राकेश को बुरा नहीं लगा। बहस आखिरकार नाबाद चली जैसा आमतौर पर हुआ करता है। लेकिन उस बहस के बाद लव मैरेज को लेकर हम तीनों के विचार बाहर आ चुके थे। मैं और सुमित लव मैरेज के पक्ष में थे, जबकि राकेश लव मैरेज को लेकर आशंकित था। बहस संक्षिप्त होने के कारण कई जरूरी पहलू हमलोग नहीं रख पाये लेकिन इतना जरूर स्पष्ट हो गया कि मैरेज की सफलता का आकलन या मापदंड इससे तय होता है कि पत्नी और पति जीवनभर साथ रहें।
       आज इस घटना को करीब दो साल पूरे होने को हैं। हम तीनों जाॅब में हैं। सुमित हाल में हुये दूसरे ब्रेकअप के सदमें से बाहर आने की प्रक्रिया में है। राकेश अब सैमसंग के मोबाइल पर फेसबुक यूज करने लगा है और मैं एक हिन्दी अखवार में काम कर रहा हूं।
       कहते हैं विचार मरते नहीं हैं और अगर आप समाज में जी रहे हैं तो विचारों से आपकी मुलाकात निरंतर होती ही रहेगी। इसलिये बेहतर यह होगा कि आप उससे बचने या भागने की बजाय हमेशा भिड़ने के लिये तैयार रहें। कहा भी गया है कि अगर आप शांति से जीना चाहते हैं तो हमेशा युद्ध के लिये तैयार रहें।
      खैर, पिछले दिनों आॅफिस में फिर इसी बिषय से मुलाकात हो गई। आॅफिस की बहस और घर की बहस में बुनियादी फर्क यह है कि वहां पर आप एक दूसरे को पहले से जानते हैं जबकि यहां ऐसा नहीं होता। आॅफिस के लोग लव मैरेज को ज्यादातर असफल मानते थे जबकि मैं लव मैरेज और कोर्ट मैरेज को हमेशा प्राथमिकता देने वालों में से हूं। बहस थोड़ी देर चलने के बाद इस मुद्दे पर आकर थोड़ी धीमी हो गई कि मैरेज को कब सफल माना जाये। मेरा सवाल ये था कि क्या अगर कोई पत्नी अपने पति से लगातार पीटने और प्रताडि़त होने के बावजूद पति को परमेश्वर मानकर ये सब झेलकर उसके साथ जीवनभर साथ रहे तो इसे सफल मैरेज कहा जाना चाहिये? इसके जवाब मुझे ये मिला कि बर्दाश्त की एक सीमा होती है। इस जवाब से मुझे उखाड़ कर रख दिया और मैंनं दोगूनी आक्रामकता से वार किया कि ये तय कौन करेगा कि औरत को पति का कितना जुल्म बर्दाश्त करना चाहिये? ज्यादातर लव मैरेज की असफलता का कारण यही होता है कि पत्नी वो सहिष्णुता नहीं दिखाती है या फिर अपने आत्मसम्मान से समझौता नहीं करती। ऐसे में पत्नी के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिये उसके द्वारा साहस के साथ उठाये गए कदमों की सराहना करते हुये लव मैरेज की असफलता को एक बड़ी सफलता क्यूं न माना जाये!
         बहस फिर से मुकाम तक नहीं पहुंच पाई क्योंकि आॅफिस काम के लिये होता है बहस के लिये नहीं। बहरहाल, इस विषय पर किसी से अगली मुठभेड़ जबतक होती है तबतक इस विषय को लेकर मंथन जारी है। ध्यान रहे कि लव मैरेज या कोर्ट मैरेज और एरैंज मैरेज में एक बड़ा फर्क ये है कि एक में ब्रह्मणों की श्रेष्ठता प्रदर्शित नहीं होती जबकि दूसरे में मंत्रों का सहारा लिया जाता है। अगली बार इसपर बहस हुई तो सामाजिक न्याय की किताबों के भी कुछ चीजों का जिक्र करने का इरादा है। 

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