Tuesday, January 31, 2012

औरत, महिला और लेडी


                                   दलित शब्दों की अस्मिता 

         पिछले दिनों एक शब्द को लेकर एक व्यक्ति से मुठभेड़ हो गई। परिस्थित के कारण मुझे मजबूरन हथियार डालकर आत्मसमर्पण करना पड़ गया लेकिन पूरा दिन काफी असहजता और अजीब सी बेचैनी में बीता। शब्दों को लेकर मेरे अब तक के अनुभवों में सबसे यादगार बन जाने वाला यह शब्द ‘औरत‘ था। फेसबुक पर एक बार आईआईएमसी के एक शिक्षक के वाल पर जब किसी ने उन्हें गालियां दी थी तो उन्होंने उसे उसी तरह छोड़ दिया था। उसके बाद शब्दों के लोकतंत्र पर मजेदार बहस शुरू हो गई थी। क्या गालियां शब्द नहीं होती? ऐसा क्या है जो एक हिंदी गाली को अंग्रेजी में अनुवाद करके उस गाली को स्तरीय बना देता है? ‘नो वन किल्ड जेसिका‘ और दबंग जैसी हिन्दी फिल्मों में जो गालियां उपयोग में लाई गई उन्हें समाज के एक वर्ग से खुशी खुशी स्वीकार किया। वहीं बिहारी प्रष्ठभूमि को लेकर बनी फिल्म गंगाजल में दी गई गाली को महानगरों में इस्तेमाल करने से परहेज किया गया और यह गाली हिन्दी भाषी या पिछड़े क्षेत्रों तक ही रह गई।  
दरअसल अपराध की एक खबर में एक महिला को उसके दो बेटों ने मारपीट कर घर से भगा दिया था। उस खबर में महिला को ‘औरत‘ शब्द से संबोधित किया गया था जिसके मैं खिलाफ था। मैं वहां ‘महिला‘ शब्द का इस्तेमाल करना चाह रहा था। विधी की पढ़ाई करने के दौरान इमरजेंसी पर जब कोलेज में बहस हो रही थी तो मैंने इंदिरा गांधी को आयरन लेडी न कहकर जानबूझ कर मजबूत औरत कहकर संबोधित किया था। मेरे इतना कहते ही एनएसयूआई के कुछ छात्रों ने न केवल मेरा विरोध किया था बल्कि बात इतनी बढ़ गई थी कि प्रिंसिपल को हस्तक्षेप करना पड़ा था। कुछ इसी तरह का अनुभव तब भी था आईआईएमसी में इंटरव्यू बोर्ड में सुभाष धुलिया ने राबड़ी देवी का जिक्र आने पर मुझसे लेडी और वूमन में अंतर पूछा था। मेरे यह कहने पर कि वीमेन और लेडी में बुनियादी फर्क प्रष्ठभूमि या परिवेश का है, इंटरव्यू बोर्ड में शामिल एक औरत, माफ कीजियेगा, महिला हंस पड़ी थी और फिर पूरा साक्षात्कार मेरे लिये अनौपचारिक सा रहा।

        जातिवाद, नस्लवाद, धर्मवाद, क्षेत्रवाद की तरह ही शब्दवाद को परिभाषित किया जा सकता है। मसलन हरियाणा में आनर कीलिंग की घटना को रिपोर्ट करते वक्त मीडिया स्थानीय समाज, पिछड़ा समाज, कठमुल्ला समाज, परंपरावादी समाज, यथास्थितवादी समाज, रूढ़ीवादी समाज आदि शब्दों को इस्तेमाल में लाता है इसके विपरीत वही मीडिया अन्ना टीम के लिये सिविल सोसाइटी शब्द को उपयोग में लाता है। कुछ इसी तरह खबरों में मृत्यु की रिपोर्टिंग के वक्त भी होता है। ऐसे कुछ लोग ही हैं जिन्हें निधन या देहांत जैसा आदरसूचक शब्द नसीब हो पाता है। शब्दों का लोकतंत्र अपने आप में बेहद दिलचस्प है और इसके दिलचस्प होने की एक बड़ी वजह इसके भीतर का वह चरित्र है जिसे सामाजिक न्याय के नाम से लोग जानते हैं। 
सवाल सिर्फ औरत, महिला, गर्ल या लेडी का नहीं है बल्कि इन शब्दों से जुड़ी एक पहचान या आइडेंटीटी का है, जिसके आधार पर एक छवि बनती है। हिन्दी फिल्म ‘तारे जमीन पर‘ में डायलेक्सिया के शिकार एक बच्चे को एक उदाहरण के रूप् में पेश करना यहां सही रहेगा। इशांत अवस्थी सिर्फ इसलिए आम बच्चों से अलग था क्योंकि वह शब्दों के आधार पर छवि नहीं बना पाता था। 
  थोड़ी और गहराई में जाये तो हम पाते हैं कि हिन्दी शब्द का संबंध संस्कृत शब्द सिन्धु से माना जाता है। ‘सिन्धु‘ सिन्ध नदी को कहते थे और उसी आधार पर उसके आसपास की भूमि को सिन्धु कहने लगे। यह सिन्धु शब्द ईरानी में जाकर ‘हिन्दू‘, हिन्दी और फिर ‘हिन्द‘ हो गया। बाद में ईरानी धीरे धीरे भारत के अधिक भागों से परिचित होते गये और इस शब्द के अर्थ में विस्तार होता गया तथा हिन्द शब्द पूरे भारत का वाचक हो गया। इसी में ईरानी का ईक प्रत्यय लगने से हिन्दीक बना जिसका अर्थ है ‘हिन्द का‘। यूनानी शब्द ‘इन्दिका‘ या अंग्रेजी शब्द ‘इण्डिया‘ आदि इस ‘हिन्दीक‘ के ही विकसित रूप हैं। कुल मिलाकर हिन्दी को संस्कृत शब्दसंपदा एवं नवीन शब्दरचना सामर्थ्य विरासत में मिली है। यानि की वह भाषा जो एक खास वर्ग के एकाधिकार के कारण हाशिये पर चली गई उसी भाषा से हिन्दी की गुत्थमगुत्थी है। ऐसे में उत्तमपुरूष, मध्यमपुष और निम्नपुरूष जैसा कुछ अगर हिन्दी में भी दिखे तो इसे   समझा जा सकता है और नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। आखिर क्या कारण है कि बिहार के मुजफ्फरपुर और बखरी के चकलाकर में काम करने वाली लड़कियों को औरत, दिल्ली के जीबीरोड और कलकत्ता के सोनागाछी में देह व्यापार करने वाली लड़कियों को महिला और मुंबई के बार से गिरफ्तार होने वाली लड़कियों को कोल गर्ल्स  कहा जाता है? धंधा और बिजनेस में आखिर अंतर क्या है और कौन है जो इस अंतर को उसी तरह बने रहने देना चाहता है? मकई के भुंजे को पापकार्न का नाम देने के पीछे क्या वो मानसिकता काम नहीं कर रही है जो उत्तरप्रदेश में दलितों द्वारा बनाये गए मध्याहन भोजन को न खाने वालों का पोषण करती है? आखिर दलित, आदिवासी और पिछड़े समाज के लोगों ने जब अपने नाम के पीछे सवर्ण उपनाम लगाना शुरू किया तो इसके पीछे कुछ तो वजह रही होगी? इन चीजों की जड़ें काफी गहरी हैं लेकिन उसे कमजोर किये बिना लोकतंत्र नहीं लाया जा सकता.
पहचान और आइडेंटीटी का ही कमाल था कि महात्मा गांधी ने धोती धारण किया और भीमराव आंबेडकर  ने शूट धारण किया। समय आ गया है जब भारत के संविधान द्वारा दिये गए समानता के अधिकार के दायरे को बढ़ा कर इसमें शब्दों के लोकतंत्र को भी जगह दी जाये ताकि लोग ‘महिला आरक्षण‘ को अंग्रेजी में ‘वीमेन रिजर्वेशन‘ न कहकर ‘लेडी रिजर्वेशन‘ कहने की हिम्मत जुटा सकें और उन्हें आत्मसमर्पण न करना पड़े। सोच के बताइये दिल्ली मेट्रो में गति की दिशा में पहला डब्बा किसके लिए आरक्षित है? 


No comments:

Post a Comment