Sunday, January 29, 2012

गरीबी का सिम्बल



                  गरीबी के सिम्बल के मायने 

दिल्ली के प्रगति मैदान में आयोजित आटो एक्सपो 2012 में पहुंचे टाटा समूह के अध्यक्ष रतन टाटा के उस बयान को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिये जिसमें उन्होंने नेनो की ‘गरीब आदमी की कार‘ के रूप में बनी पहचान को दूर करने के लिए हर संभव प्रयास करने की बात कही है। रतन टाटा ने माना है कि शुरूआती समस्याओं के कारण नेनो ने बेहतर संभावनाओं के अवसर खो दिये। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि टाटा मोटर्स नेनो से ‘गरीब आदमी की कार‘ का तमगा हटाने के हर संभव प्रयास करेगी। साफ है कि शुरूआती बाधा से इशारा गरीबों के सिंबल की तरफ है। टाटा के इस बयान को इसलिए भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है क्योंकि 2005 में जब तत्कालीन रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव ने गरीब रथ की शुरूआत की थी तब उसका मकसद न केवल गरीबों को कम पैसे में स्तरीय सुविधा मुहैया कराना था बल्कि उन फासलों को भी कम करना था जो भारतीय ऐतिहासिक और सामाजिक वजहों के कारण यहां के समाज में गहरे जड़ जमाये बैठे हैं। मार्क्सवाद और पूंजीवाद से इतर व्यवस्था में यकीन रखने वाले समाजवादी चिंतक राम मनोहर लोहिया ने गरीबी को एक वर्ग विशेष से जोड़ा था। जातिगत जनगणना पर सरकार को सर के बल खड़ा करके उसके मुंह से इसकी जरूरत को कबुल करवाना भी इसलिए संभव हुआ क्योंकि गरीब नामक जाति का उभार आरक्षण और सक्रियता के कारण पिछले एक दशक में काफी हुआ है। टाटा की छवि भारत में अन्य पूंजीवादियों से बिल्कुल अलग है। जमशेद जी टाटा द्वारा ताज होटल बनाये जाने के पीछे की कहानी और खुद टाटा द्वारा नेनो की भारतीय बाजार में उतारने की घटना गरीब रथ के पीछे की अवधारणा के कितने नजदीक है और क्या टाटा भारत को बाजार से अलग भी देखते हैं, इसे समझने के लिए कई पहलुओं पर ध्यान देना आवश्यक है।



      उदारीकरण के बाद देश के अंदर कई नये वर्गों का उदय हुआ। पहले का मध्यवर्ग भी कई टुकड़ों में बंटा। उच्च मध्यवर्ग और निम्न मध्यवर्ग के अलावे इन परतों के बीच भी कई तरह के समाज उपजे। आरक्षण की आग भी खूब दहकी और निजी क्षेत्रों में आरक्षण से लेकर काॅरपोरेट के पंजे में कसते जा रहे मुख्यधारा की मीडिया भी गरीबों के प्रतिनिधियों के निशाने पर रही। युवा वर्ग की अवधारणा भी धीरे धीरे प्रबल हुई और आज युवा नेता, युवा सोच के साथ साथ मीडिया में भी युवा अखवार का उपयोग परवान चढ़ता गया। युवा दिखना, सम्पन्न दिखना और बाजार की नजर में खरीददार दिखना धीरे धीरे एक जरूरत बनती चली गई। उदारीकरण ने भारतीय समाज को इतना लालची बना दिया कि जिसके पास खरीदने की हैसियत न रह पाई वह हाशिये पर जाता रहा और दमन और शोषण के दंश में जकड़ता चला गया। इसी तरह गरीब की भी एक अपनी पहचान बनती चली गई। इसी तर्ज पर हाल में एक सिविल सोसाइटी भी खूब चर्चा में रही। सिविल सोसाइटी को मीडिया में इस तरह पेश किया गया कि अब इसपर एक अघोषित काॅपीराइट हो चुका है। इस तरह देखा जाये तो टाटा नेनो खरीदने की हैसियत न रखने वाले लोगों की गरीबी और जिस खरीददार को लक्ष्य बनाकर रतन टाटा ने नेनो को भारतीय बाजार में उतारा इन दोनों गरीब और गरीबी में कहीं न कहीं एक विरोधाभास दिखता है। रेडियो पर गुटखा कंपनी के एक विज्ञापन में कहा जाता है कि स्टैंडर्ड लोग क्वालिटी से समझौता नहीं करते। ऐसे विज्ञापनों से पूरा बाजार पटा है जिसमें गरीबी का खुला मजाक उड़ाया जा रहा है या फिर गरीबी को इस तरह दिखाया जा रहा है कि गरीबों से नफरत सी हो जाये। यह कहने की जरूरत नहीं है कि ये सब छवि किसके इशारे पर और किसके मदद से बनाई जा रही है। इसे समझने के लिए भारतीय ट्रकों के पीछे लिखा ‘बुरी नजर वाले तेरा मुंह काला‘ के बोर्ड पर भी नजर दौड़ाना होगा। क्या यह कहना गलत है कि प्राक्रतिक रूप् से काले रंग का देह पाने वाले लोगों के लिए यह बोर्ड न केवल अपमान है बल्कि उसमें हीन भावना उत्पन्न करने का भी एक बड़ा कारण है। इसी साल जून में उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में मध्याहन भोजन योजना के अन्तर्गत बने भोजन को सवर्णों का एक वर्ग इसलिए खाने से मना कर दिया क्योंकि भोजन बनाने वाले दलित थे। ऐसी खबरें देश के अलग अलग कोनों से आती रहती हैं। तमिलनाडु की स्थित इस मामले में और भी रोचक है। जब खुद अनुसूचित जाति व जनजाति आयोग के अध्यक्ष पीएल पुनिया को उड़ीसा के एक मंदिर में जाने के लिए मशक्कत करनी पड़ी तो इन स्थितियों में भारतीय समाज की स्थिति समझी जा सकती है। जो वर्ग दलित से बना खाना खाने से मना करता हो उस वर्ग की अवधारणा गरीब को लेकर क्या होगी इसे समझने के लिए ज्यादा तर्कों की आवश्यकता नहीं है। जाहिर तौर पर वर्गों में बंटे भारतीय समाज में जीवनशैली भी न केवल बंटी हुई है बल्कि इसके अंदर अपनी विशिष्ट पहचान, घमंड और विरासत का दंभ भी मिला हुआ है। ऐसे में उदारीकरण के बाद देश से बाजार बन चुके भारतीय समाज के लिए उत्पादों की बिक्री करने के लिए कभी कभी कड़वी सच्चाईयों को भी कह देना पड़ता है। रतन टाटा के इस बयान से कम से कम इतना तो साबित हो ही गया।
     
 यह मानी हुई बात है कि भारत में गरीबी और पिछड़ेपन का दंश झेल रहे अधिकांश नागरिक दलित, आदिवासी और अन्य पिछड़े वर्ग से ताल्लुक रखने वाले हैं। 1993-94 और 2004-05 के बीच सरकारी आंकड़ों की सहायता से अर्जुन सेनगुप्ता कमीशन ने जो रिपोर्ट दी उसके अनुसार करीब अस्सी फीसदी आबादी बीस रूप्ये रोजाना कमाती है। इसके बाद से लगातार यह मांग उठी कि इन अस्सी फीसदी में बड़ा हिस्सा किस जाति का है इसकी पड़ताल की जाये। जातिवार जनगणना इसी का एक हिस्सा था जिसे सरकार ने मान कर भी नहीं माना। हालांकि रतन टाटा को पिछड़े या दलित और आदिवासी विरोधी विचारधारा वाला कहना जल्दीवाजी होगी। रतन टाटा देश के अकेले उद्योगपति हैं जिन्होंने पिछले दिनों दिल्ली में दलित इंडियन चैम्बर्स आॅफ काॅमर्स द्वारा आयोजित तीन दिवसीय कार्यक्रम में न केवल शिरकत की बल्कि भारतीय बाजार में समाज से कट रहे वर्गों के दखल को बढ़ाने की भी पुरजोर वकालत की। इसके अलावे रतन टाटा ही वह शख्श हैं जिन्होंने 26 नवंबर को मुंबई में हुए आतंकवादी हमले के बाद ताज होटल के आसापास पाव भाजी, सब्जी, मछली आदि का ठेला लगाने वाले ठेलाचालकों को, जो कि सुरक्षा बलों और आतंकवादियों की गोलाबारी में घायल हुए, अथवा उनके ठेले नष्ट हो गये, को प्रति ठेला 60,000 रूप्ये का भुगतान किया था। एक ठेले वाले की छोटी बच्ची को ‘क्रास फायर‘ में फंसने के दौरान चार गोलियां लगीं जिसमें से एक गोली सरकारी अस्पताल में निकाल दी गई, बाकी की नहीं निकलने पर टाटा ने उस बच्ची का पूरा इलाज 4 लाख रूप्या में करवाया। जब तक ताज होटल बंद रहा, सभी कर्मचारियों का वेतन मनीआॅर्डर से उनके घर पहुंचाने की व्यवस्था करने के साथ साथ सभी 46 म्रत कर्मचारियों के बच्चों को टाटा संस्थानों में आजीवन मुफ्त शिक्षा की जिम्मेदारी उठाने वाले रतन टाटा उदारीकरण के बाद गरीबों के लिए शुरू की गई एक कार पर पछता रहे हैं!

                दरअसल, उदारीकरण के बाद सामंती और जमींदारी विरासत के रंग से रंगे भारतीय समाज का रंग और भी घिनौना हो गया। गरीबी तो मिटने से रही उल्टे गरीबों पर रही सही जो चर्चा और उनके उत्थान को लेकर एक समझदारी की जरूरत मीडिया के माध्यम से बन रही थी वह भी धीरे धीरे खत्म होती चली गई। उपभोक्तावाद के रंग में पूरी तरह रंग रहे भारतीय समाज में गरीब अब मुद्दा नहीं बल्कि एक ऐसा सिंबल बन गया है जिससे बाजार बचना चाह रहा है। चकाचैंध और दिखावे की दुनिया का कोई भी उत्पाद खुद को गरीबों से जोड़ने से बच रहा है। बाजार का यह रूप् निश्चित रूप् से एक आदर्श समाज के लिए जहरीला है और सामाजिक विषमता की लगातार बढ़ रही खाई से तवाह हो रहे देश के लिए खतरे की घंटी है।
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