Wednesday, December 21, 2011

मीडिया

                                    मीडिया, बालीवुड और अंडरवर्ल्ड
 
       लगभग भुला दी जा चुकी एक हिन्दी फिल्म अभिनेत्री आज कल अपने बदले तेवर को लेकर मुख्यधारा की मीडिया में छा चुकी है। इसके अलावे भुलाने की प्रक्रिया के अंतिम चरण में पहुंचने वाली एक पाकिस्तानी बाला भी एक विदेशी पत्रिका के भारतीय संस्करण को कथित तौर पर अपनी सहमति से नंगी तस्वीर देकर विवादों के रास्ते सुर्खियों में है। कोल्हापुर में जबर्दस्त हंगामा मचा देने वाली राखी सावंत के सारे रिकार्ड टूट चुके हैं और मुख्यधारा की मीडिया में राखी सावंत फिलहाल हाशिये पर जा पहुंची हैं। खुले बाजार की नीति अपनाने के बाद ग्राहकों को लालची बनाने के बाद अब बिक्रेताओं के सामने यह चुनौती खड़ी हो गई है कि ग्राहकों की लगातार बढ़ रही भूख को कैसे शांत किया जाये। क्योंकि उपभोक्ता की जरूरतों को निरंतर बढ़ाना और फिर उसका फायदा उठा कर उसे अपनी सामग्री बेचना ही बाजार का मुख्य लक्ष्य है। ग्राहक वह है जिसके पास पूंजी है और सही सौदागर वह है जो उस पूंजी को हासिल करने की कला जानता हो। भारत में जिस अठारह फीसदी लोगों के पास पूंजी का अंबार है उन्हें नैतिकता, संस्क्रिति, जीवनशैली और आदर्शों के बारे में बताकर आप उनकी ‘खुली सोच‘ को दबा नहीं सकते। बाॅलीवुड जगत यह खूब जान चुका है कि अगर अपने ग्राहकों को जोड़े रखना है तो उन्हें वो सब सुख देना होगा जो वह चाहते हैं। ऐसे में जो लोग हिन्दी सिनेमा को अब भी भारतीय समाज का आईना और भारतीय मीडिया को लोकतंत्र के चैथे स्तंभ के रूप में देखते हैं तो उन लोगों पर तरस ही खाया जा सकता है। इसके इतर खबर यह है कि पिछले कुछ सालों में हिन्दी फिल्म एक भी ऐसी फिल्में देने में नाकाम रहीं है जो देश के किसी भी हिस्से में एक महीने से अधिक लगातार हाउसफुल चले। अलबत्ता हिन्दी फिल्म जगत में कई संदिग्ध सी दिखने वाली और कई आशंकाएं समेटे हुए फिल्में दबे पांच जरूर आईं। जमीन अधिग्रहण पर भारत में हो रहे चैतरफा विरोध को गलत ठहराने के साथ साथ मीडिया जगत में बदनाम हो चुके कुछ पत्रकारों की भी सिनेमा में ैराॅल माॅडल की तरह पेश किया गया। गुरू और नो वन किल्ड जेसिका सरीखी हिन्दी फिल्मों ने देश भर के संजिदा दर्शकों को न केवल लंबे समय से बाॅलीवुड के सम्मोहन से ध्यान हटाया बल्कि मोनिका वेदी, शाईनी आहुजा, मधुर भंडारकर और दक्षिण फिल्म अभिनेत्रियों के एक के बाद एक करके देह व्यापार में धंसे होने की खबर से लोगों की इसकी पर्याप्त वजह भी दी कि लोग मायानगरी की आम धारना के अलावे भी विचार बनाना शुरू करें। ऐसे में अब सवाल यह है कि क्या हिन्दी सिनेमा को आज के दौर में समाज का आईना कहा जायेगा? क्या जिस माधवी शर्मा को मधुर भंडारकार ने पेज थ्री में दिखाकर तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीते और जिस मेघना माथुर की कहानी को फैशन का थीम बनाकर उसी मधुर भंडारकर ने 2009 में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीतकर आगे बढ़ते गये क्या उस ेअब बाॅलीवुड के रियल लाइफ में वह रील लाइफ ससम्मान स्वीकार कर लिया गया है?
        पिछले दिनों एक दिलचस्प घटना दिल्ली में हुई जिसे अखवारों ने जगह नहीं दी। दरअसल, हिन्दी फिल्म अभिनेता मनोज वाजपाई अपनी एक फिल्म के अघोषित प्रमोशन के लिए जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय पहुंचे। यह शायद पहला मौका था जब फिल्म प्रमोशन के लिए जेएनयू जैसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय को निशाना साधा गया। हालांकि इससे पहले भी दिल्ली के विश्वविद्यालयों में दो चार सीन शूट करके दर्शकों से जोड़ने की कोशिशें की गई है लेकिन जेएनयू में मनोज वाजपाई का नाटकीय अंदाज में आना अपने आप में रोचक है। सोशल मीडिया पर इसकी थू थू न केवल वरिष्ठ शिक्षाविदों ने की बल्कि इसको लेकर अलग अलग मंचों पर कई सवाल भी खड़े किये गए। क्या हिन्दी सिनेमा जगत करवट ले रहा है?
अब जबकि भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष जस्टिस मार्कण्डेय काटजू सार्वजनिक रूप से यह कह चुके हैं कि भारतीय मीडिया लोगों को बांट रहा है तो ऐसे में यह सवाल उठाना लाजमी है कि भारतीय मीडिया से गुत्थम गुत्थी होते जा रहे हिन्दी सिनेमा का मौजूदा चरित्र क्या है? और सिनेमा का समाज का आईना होना आज के दौर में क्या प्रासंगिक रह गया है? अगर हां, तो कितना? इसे समझने के लिए हिन्दी सिनेमा के अतीत और उदारीकरण के बाद मीडिया और बाजार के तेजी से बदले विभिन्न पहलुओं को ध्यान में रखकर इसका विश्लेषण करना होगा। हिन्दी सिनेमा अपने आर्थिक श्रोतों को लेकर हमेशा आरोपों के घेरे में रहा है। अंडरवल्र्ड से हिन्दी सिनेमा के रिश्ते समय समय पर जाहिर भी होते रहें हैं। पंजाब के होशियारपुर में जन्मी मोनिका वेदी को कथित तौर पर बुलंदी तक पहुंचाने वाले अंडरवल्र्ड की औकात का खुलासा तब और बेहतर से हुआ था जब अगस्त, 2001 में एक राष्ट्रीय अंग्रेजी दैनिक के मुंबई संस्करण ने सलमान खान और ऐश्वर्या राय की रिकार्डेड बातचीत को प्रकाशित किया था। बातचीत में सलमान खान, ऐश्वर्या राय से कथित तौर पर अपशब्दों का इस्तेमाल करते हुए अबू सलेम के किसी शो में नाचने के लिए कह रहे थे। हिन्दी फिल्म ‘चोरी चोरी चुपके चुपके‘ में छोटा शकील की भूमिका को साफ करते हुए सलमान ने अंडरवल्र्ड से डरते हुए ऐश्वर्या से कई ऐसी बातें की थी जो उस दौर में काफी चर्चित हुई थी। सिनेमा जगत को नजदीक से जानने वाले लोग बाॅलवुड और अंडरवल्र्ड के रिश्ते को बेहतर से जानते हैं लेकिन इस रिश्ते के साथ भारतीय मीडिया भी अब जुड़ गया है इसको लेकर लोगों में अभी भी भ्रम की स्थिति बनी हुई है। संभव है मार्कण्डेय काटजू की टिप्पणी के बाद उठे बवंडर में इस सब सवालों की भी बारी आये। गुलशन कुमार, मुकेश दुग्गल, दिनेश कुमार और अजित बघानी पर अंडवल्र्ड के हमले के बाद अब खबरों के केन्द्र में जिग्ना वोरा, ज्योतिर्गामय डे सहित दिल्ली और मुंबई में अपराध को कवर करने वाले वो तमाम संवाददाता हैं जिन्होंने पिछले कुछ दशक में अपनी आर्थिक हैसियत बढ़ाई है। सवाल जितना वीणा मलिक के आईएसआई से कथित रिश्ते को लेकर है उससे कहीं अधिक हिन्दी फिल्म जगत और मीडिया को लेकर है। मीडिया पार्टनर के बाद का सिनेमा जगत कुछ अनसुलझे सवाल खड़े कर रहा है। मसलन वो कौन सी ताकत है जिसने नीरा राडिया प्रकरण के बाद काॅरपोरेट लाॅबी और सरकार से गुत्थम गुत्थी करने के कारण कई विवादास्पद कारणों से सरेआम हो चुकी एक अंग्रेजी चैनल की समूह संपादक को एक हिन्दी सिनेमा में रोल माडल की तरह पेश किया? क्या यह उम्मीद की जाये कि कल को जिग्ना वोरा किसी वीरांगना की भूमिका में हिन्दी फिल्मों में दिखाई जायेंगी?
       देश का एक बड़ा तबका ऐसा है जो मीडिया को अब भी लोकतंत्र का चैथा खंभा समझने की भूल कर रहा है। विदेशी प्रत्यक्ष निवेश और विदेशी संस्थागत निवेश की उर्जा को समेटकर लगातार नैतिकता और वस्तुनिष्ठता की ढ़लान पर लुढ़कते मीडिया को लेकर लोगों में जागरूकता न फैले इसके लिए फिल्मों का न केवल सहारा लिया जा रहा है बल्कि फिल्मों के जरिये जिस तरह एक समय अंडरवल्र्ड सहानुभूति जीत रहा था उसी तरह आज इसे आवारा पूंजीवाद और काॅरपोरेट की कठपुतली बन चुके मीडिया के सरेआम हो चुके कथित पत्रकार अपनी पहुंच के जरिये खुद की छवि बना रहे हैं। जो प्रासंगिकता ‘पीपली लाइव‘ की इस दौर में दिखती है वो प्रासंगिकता करीब एक दशक पहले हुई एक घटना को लेकर बनी ‘नो वन किल्ड जेसिका‘ को लेकर इस दौर में तो बिल्कुल भी नहीं दिखती। तो क्या ये मान लिया जाये कि फिल्म इंडस्ट्री अब अंडरवल्र्ड के अलावे किसी और के हाथ भी खेल रहा है।
        सवाल हिन्दी फिल्मों के अलग अलग और बदलते कौशल के साथ साथ उसके भारतीय समाज पर पड़ रहे प्रभावों पर भी है। भीड़ जुटाकर जब बिद्या बालन अपनी उंगली होंठ में दबाकर पोज देती है तो निश्चित रूप से महीने की बजट की चिंता करते हुए साड़ी में उनके द्वारा दिखाये गए विज्ञापन की याद आ जाती है। हिन्दी सिनेमा अजीब दोराहे पर है। एक तरफ जहां मीडिया पार्टनर उससे अपनी कीमत कथित तौर पर अपनी छवि को सुधारने के रूप में वसूल कर रहा है वहीं अंडरवल्र्ड उसी मीडिया में जेडे और जिग्ना वोरा जैसे प्यादों को अब सीधे सीधे निशाना बना रहा हैे। सीधे सीधे देखें तो अंडरवल्र्ड, बाॅलीवुड और भारतीय मीडिया का रिश्ता बेहद ही दिलचस्प होता जा रहा है। इस रिश्ते ने हिन्दी सिनेमा के स्तर को भी लपेटे में ले लिया है। इसे बारीकी से समझना होगा। मसलन फिल्म उद्योग में अपनी बेहतरीन अभिनय शैली को लेकर जो अभिनेत्रियां आज से पांच साल पहले बनी हुईं थी वो आज लगभग नहीं दिखाई दे रहीं हैं। नहीं दिखाई देना और नहीं होना में फर्क है। नहीं दिखाई देना का मतलब आज के संदर्भ में मीडिया का कवरेज न मिलने से है। अगर फिल्मों को लोगों की जुबान पर लाना है तो अब कहानी से ज्यादा अभिनेता और अभिनेत्रियों की चर्चा का महत्व है। इसके अलावे मीडिया में फिल्मों का जिक्र होता रहे यह एक नितांत आवश्यक शर्त है अगर आप अपनी फिल्म को सफल देखना सुनना चाहते हैं। दूसरी तरफ एक अजी स्थिति यह है कि फिल्मों को पब्लिसिटी देने वाला मीडिया अपनी छवि को बचाने की कोशिश में लगा है। न्यूज ब्राडकास्ट स्टैण्डर्ड अथाॅरिटी गाइडलाइन्स जारी कर रहा है कि ऐसे करें और ऐसे न करें। जाहिर सी बात है भोजपूरी फिल्मों के बढ़ते दायरे और बड़े अभिनेताओं द्वारा भोजपूरी फिल्मों में बढ़ते दखल को भांप कर पहले से सावधान हो चुके हिन्दी फिल्मों के सामने बीते कुछ वर्षों में कई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं। जिस दर्शक वर्ग, माफ कीजिएगा, जिस ग्राहक वर्ग  को ध्यान में रखकर फिल्में बनाई जा रही है उसे खुश करने के लिए नंगा होना जरूरी है और मीडिया चूंकि खुद अब कई सारे सवालों से दो चार हो रहा है ऐसे में राडिया प्रकरण में पत्रकारिता को दागदार कर देने वाले पत्रकारों को और बुलंदी देने वाले और अंडरवल्र्ड के इशारे पर काम करने वाले मीडिया से कोई यह उम्मीद नहीं कर सकता है  िकवह भारतीय समाज को शर्मशार कर देने वाली इन घटनाओं की ओर ध्यान दिलाये।
               

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