Sunday, November 20, 2011

                                ये उन दिनों की बात है...

          खूब सोच कर और हिम्मत कर के इस बार कमरे से निकला. मकानमालिक बेटे को स्कूल छोड़ने गया था. ''इस महीने कमरा खाली कर दूंगा'' मकानमालिक को बोल डाला. ''...जोड़ लीजिये ठीक पंद्रह दिन पहले कहा है'' कहता जा रह था. उसने कारण पूछा तो गंदगी बता दी और आगे बढ़ गया. जूस पीने के लिए आज पैसे नहीं थे. पिछली बार कब पी ये भी याद नहीं.
           जिन्दगी मानो कुहासों को चीरती हुई अब थक गई हो और उसकी गति मंथर पर गई हो. धीरे धीरे सरकती हुई जिन्दगी काफी डरावनी हो चली थी. आस पास सब कुछ साफ़ साफ़ दिखाई देने लगा था वो सब जो जिन्दगी की तेज गति के कारण नहीं देख पा रह था अब वो सब दिख रह था. साफ़ साफ़. एक झुर्रियों सा चेहरा, काठ की कुर्शी, गन्ने का कुछ छिलका जिसे चिवा कर फेका गया हो, उसे बुहारकर आग लगाने के लिए इकठ्ठा करती एक औरत और पास दम हिलाता एक कुत्ता जिसे यह उम्मीद है कि आग लगने पर उसे थोड़ी गर्माहट मिल जायेगी. ये कौन सा दौर है!! कैसा फ्लेश बेक है!
           वो नहीं आएगी. 
           एक बड़े से मैदान का चक्कर काटते हुए थक जाने के बाद लोग बीच में आकर बैठे हैं. पता है क्यूं? नहीं तो, तुम बताओ. अरे वो इसलिए कि जिस रस्ते पर चलते हुए वो थक गए हों वो रास्ता उन्हें आराम कैसे दे सकता है!! लेकिन वो रास्ता कभी कभी उतना भी बुरा नहीं होता है. होता होगा लेकिन अपन के लिए नहीं. अपन तो बस हाशिये पर चलते चलते हाशिये पे ही लुढ़क लिए हैं. 
          जो बोलो लेकिन वो आएगी नहीं.
          समय को खीच कर पास लाकर कुछ कह लेने दो अब. क्या पता उस समय तक पहुंचते हुए दम टूट जाए! ऐसा क्यूं होगा भला? पता नहीं लेकिन समय का वेट करना हमेशा आसान नहीं होता कभी कभी समय को खीच कर पास लाकर देखना पड़ता है कि केनवास कैसा दिख रह है. हम्म..कैसा दिखा केनवास? कुछ खास नहीं. कई चीजों के आगे अब भी परदा डाला है जैसे. वो देखो वो एक बच्ची है, उसे बेचारी मत कहना क्यूंकि उसमे अब भी बहुत हिम्मत है, जिस उम्र में बच्चे मां के दूध के बिना रह नहीं पाते उस उम्र में ये धुल फांक कर जी चुकी है. तो क्या सोचे हो उसके बारे में? कुछ नहीं कुछ भी तो नहीं. सोचने के लिए कम से कम एक दिमाग तो चाहिए जो ठीक ठाक काम करता हो लेकिन अपन के पास है ही नहीं वो चीज!! जब जानते हो कि तुम्हारे पास वो चीज नहीं है फिर भी इतना क्यूं सोचते हो? क्यूंकि अगर नहीं सोचूं तो और कोई सोचने वाला भी तो नहीं है.
          वो आएगी नहीं.
          दिल्ली कैसी लगी? शब्दों में कह नहीं सकता लेकिन एक कोलेज के लाइब्रेरी में पढ़ा था कि दिल्ली उस औरत की तरह है जो लुभाती और आपको इशारा करती है लेकिन अपनी सच्चाई आपको कभी नहीं बताती. ऐसा क्यूं? और नहीं तो क्या दिल्ली में कुछ भी मायने नही रखता सिवाय  पैसे के. क्यूं तुम्हे पैसा नहीं चाहिए? हां चाहिए लेकिन...! लेकिन क्या? बोलो पूरा बोलो. बोलो. नहीं बोलना. क्यूं सच से डर लगता है? सच क्या है ये बता दे फिर बताता हूं कि सच से डर लगता है या नहीं!! बताना क्या है जो दीखता है वो सच है बस. झूठ, बिल्कुल झूठ जो दिखता है वो सच होता तो फिर दुनियां ऐसी नहीं होती और लोग ऐसे नहीं होते. माफ़ करना लेकिन सच जो भी हो कम से कम जो दीखता है वो सच कभी नहीं हो सकता. फिर सच क्या है? वो सब जो नहीं दिख रह वही सच है. हें?? ये कैसी चीज है जो दिखती ही नहीं!! हां वो दिखती जरुर नहीं है लेकिन वो है जरुर. अगर वो है तो फिर उसे डर क्यूं लगता है सामने आने से? ये मुझे नहीं पता लेकिन वो कहीं न कहीं है. मुलायम सा उजले रंग का और एकदम पारदर्शी.

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