Sunday, November 20, 2011

                             फिर से वही गाना और वही मैं        
         
        अभी अभी वो गाना फिर से सुन लिया अचानक. बचने का समय भी न मिला. फिल्म का नाम कुर्बान, गाना ''नजरों से नजरें मिली तो जन्नत सी महकी फिजां''. फिर से बेचैनी और वही अतीत. अतीत में फिसलता मैं और मुझे संभालता मेरा वर्तमान. ऑफिस आना मुश्किल से दस मिनट हुआ होगा. क्वार्क, जी मेल, शब्दकोष और ट्वीटर खोलकर ठीक से संभल भी नहीं पाया था कि ऐसा हो गया फिर से! झटके की तरह कटे हुए घाव पर अचानक दर्द का एक ज्वार और अंतर्मन में एक डरावनी चीख. पूरे मन में उथल पुथल और फिर एक शांति. धुंआ धुंआ सा.
         पेन किलर का ये कोलर ट्यून तब था जब मैं शायद अकेला पटना से दिल्ली आ रहा था. ट्रेन थी पटना दिल्ली राजधानी और आरक्षण बड़े साहेब ने  करवाया था. क्या सुनहरे दिन थे! आई आई एम सी का रिजल्ट आने के बाद दिल्ली आने से पहले वहां गया और शायद अपनी जिन्दगी में पहली दफा राजधानी पर अकेला चढ़ा. बेगूसराय से पटना इंटरसिटी से आया था और रास्ते भर उसे न जाने कितने कोल किये और हारकर उदास निराश कितने ही एसेमेस किये थे कि बिहार छोड़ने से पहले वो एक बार दिख जाए. करीब डेढ़ साल एकतरफा बात(!) हुई थी. पटना पहुंचकर भी काफी वेट किया था उसका. उसका वेट इतनी बेसब्री से कर रह था कि प्लेटफोर्म पर मुझे छोड़ने आये दोस्तों से भी ठीक तरह से बात नहीं कर सका. 
          ट्रेन जब तक बिहार में रही तब तक उसे कोल करता रहा. उसका कोलर ट्यून सुन कर अब भी अजीब सा लगता है. ऐसा लगता है कि वो अब भी जिन्दा है और मैं अब भी पहले की तरह मरा हुआ हूं.

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