Sunday, October 30, 2011

                                      हाल ए दिल

         धीरे धीरे दर्द बढ़ रह था उसका. पास कोई न है ये सोच कर दर्द और भी दर्दनाक हुआ जा रहा था. मन में आता था कि सर को दीवाल से दे मारूं और सारा दर्द निकाल दूं. मोबाइल पास में था. चौथी बार आधा एस एम एस लिख कर डिलीट कर दिया था. शब्द मिल नहीं पा रहे थे शायद. जो भी हो मोबाइल साइलेंट करने के बाद करवट बदल कर गमछे को चेहरे पड़ डाल कर खुद को उनमें समां लिया. दर्द वैसा ही रहा. किसी का फोन मिस न हो गया हो इस डर से मोबाइल को टटोला और फिर उसी तरह छोड़ दिया. कमरे में अंधेरा था. नीचे गली में एक नए किरायेदार के घर की रौशनी खिड़की और रोशनदान से अन्दर आ रही थी. खिड़की बंद करने का मन तो किया लेकिन फिर गमछे से मुंह बाहर करने का मन ही नहीं किया.
        सब्जी बनाना उफ्फ़ ..!! दो समोसा दस रूपये में. नींद रूठी थी. अचानक ध्यान कि डायरी ठीक से मेंटेन नहीं हुई है . समोसा वाला खर्चा तो लिखा ही नहीं. अंधेरे में हाथ फिर टटोला. फिर से मोबाइल. फिर से मेसेज. फिर से डिलीट और फिर से सर दर्द का दर्दनाक दौरा. उफ्फ़!! गमछे को बगल कर उठा और लाईट ओन करना था कि सर दर्द का फिर से जोर का झटका. बर्तन कल धोने से अच्छा कि अभी धो लो. कल धो नहीं पाए तो!! वापस बेड पर. दर्द यथावत. एक रुपया कुछ पैसा फोन में. पहला फोन उस दोस्त को जिसने तुमसे मिलाया, उसने फोन काट दिया. क्यूं ले फोन? ये कोई समय है फोन करने का...हम्म!! ठीक है. दूसरा फोन उन्हें जिनका रास्ता यही था. ''मम्मी सो गई है''. ओ के. फिर से अंधेरा. इस बार करवट दीवाल की तरफ. आंख में कुछ गीला गीला सा एहसास. अरे!! तुम रो रहे हो!! 
        दर्द कम. हल्की हल्की रूमानियत. सपने. ग्लेमरस सपने. कोई अतीत नहीं सिर्फ सपने. सोने से पहले वाले सपने. दर्द फिर से तेज. झटके से बिस्तर छोड़ कर कमरे के बाहर आना. वाशरूम में शायद कोई गया है. हां हां कोई है!! बालकोनी पे रेलिंग पर टिक कर नीचे की सड़कों पर ये सन्नाटा देखना कितना हसीं लगता है न!! सन्नाटा हर जगह अच्छा लगता है सच पूछो तो. लोगों से तो डर लगता है कसम से! एक चुप्पी. अंधेरा उजाला दोनों साथ साथ. कूलर की आवाज के बीच चीखता अतीत उससे कहीं तेज और भयानक आवाज में. अन्दर से आकर वापस कमरे में. इस बार करवट न उधर न इधर सीधे छत पे. पंखे की वही पुरानी आवाज. एक बार फेसबुक चेक कर लिया जाय!! फिर से जोरदार दौरा. भींगी आंखें. सुबह फिर देर हो गयी ऑफिस में उफ्फ़!!

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