Monday, October 10, 2011



                                                समय से संवाद

        प्यार क्या है? प्यार एक त्याग है। बस। और कुछ नहीं। त्याग क्या है? मुझे नहीं पता। क्या यह पता करना जरूरी है? खुद से बहस जारी थी और मैं पूरे गुस्से में था। क्यूं परिभाषित करूं मैं कि प्यार क्या है और त्याग क्या है? उसने सवाल किया कि तू इतना ही बता दे कि तूने जो किया वह प्यार है या त्याग? मैं चिढ़ा हुआ जरूर था लेकिन झुकने के मुड में बिल्कुल भी नहीं था। मैंने प्यार नहीं किया था सिर्फ त्याग किया था। उसने तुंरत दूसरा सवाल दागा कि अगर तूने प्यार नहीं किया तो इस रोग के लक्षण तेरे अन्दर कैसे आ गये? कौन बोलता है मेरे अंदर प्यार वाले रोग के सिम्टम हैं? कौन बोलता है स्साला कि मैंने प्यार किया! छी! मैं और प्यार। प्यार तो रोग है। रोग। एक लाईलाज और निहायत ही गुप्त रोग!


       वो थोड़ी देर चुप रहा। फिर कहा कि अच्छा ये बता कि रोग क्या है? मैंने सीधा सा जवाब दिया कि कुपोषण के कारण होने वाली शारीरिक विकृति की तरह ही माहौल और दुनियादारी के बीच जब व्यक्ति मानसिक कुपोषण का शिकार हो जाता है तो उसे रोग कहते हैं। प्रेम ऐसा ही एक रोग है। वो शांत था लेकिन मैं शांत होने की एक्टिंग कर रहा था बस। उसने कहा कि तू मेरे सवाल का जवाब देने की बजाय खुद को जस्टिफाय कर रहा है। मैंने तुझसे पूछा त्याग क्या है तो तूने बात बदल दिया फिर मैंने पूछा रोग क्या है तो तू अपना दुखड़ा लेकर बैठ गया। नहीं...यह गलत है...मैं अपना दुखड़ा क्यूं सुनाउं तूम्हें! हो कौन तुम! क्या हो! क्या मैं पागल हूं जो तुम्हें अपना दुखड़ा सुनाउं!

 वो चुपचाप सुनता रहा ओर अन्त में गायब हो गया। ठीक से बोलने भी नहीं दिया उसने। आखिर में मैंने चुपचाप धीरे से कहा कि प्यार तो एक जहर है। वो स्साला पीछे छुपा हुआ था। उसने सुन लिया और तपाक से कहा कि स्साले तू भी नौटंकी है पहले कहता है कि त्याग है फिर कहता है कि रोग है और अब कहता है प्यार एक जहर है। अब मैं कुछ न बोल सका। बिल्कुल चुप हो गया मैं! निशब्द! एक शून्य!! बस!!!

No comments:

Post a Comment