Friday, October 14, 2011

                           तेरा न कहना भी बहुत कुछ कहता है

       उसके भैया उसके लिए बेंक पी ओ चाहते हैं ऐसा मुझे उसी ने कहा, पहले से खट्टा मन और खट्टा हो गया. मन बावरा है कैसे समझाएं! दुर्गापूजा में कोई इंटरेस्ट कभी नही रहा. भीड़ भाड़ में फ़ालतू का बेमतलब चलते जाना..उफ्फ़..इससे अच्छा तो कमरे में बंद होकर डायरी लिखी जाय. 
       टिकट वेटिंग का था और ट्रेन बारह घंटे लेट. एक बार साऊथ एक्स होकर वापस आनंद बिहार आना हो चुका था. वो आने के लिए मना कर रही थी लेकिन मेरा मन आर या पार करने के लिए बावला हुआ जा रहा था. घर में एक एक कर के सब नाराज थे. रूठों को मानाने में अब और देर कैसे करता! हम दोनों काफी आगे निकाल चुके थे और बोर्डर पहुंचने वाले थे. अच्छा हुआ कि सब को पता चल गया! 
      पावर हॉउस में सर से बात हो रही थी. कविता श्रीवास्तव के घर पुलिस ने रेड डाली थी. जिस नक्सली के बहाने पुलिस ने रेड डाली वो धराया दिल्ली में. मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने देश भर में विरोध किया. सर से उसी पर चर्चा हो रही थी कि इतने में उसका फोन आ गया. उसे पता था कि मैं एकांकी टाइप का लड़का हूं और कहीं अकेले पड़ा हुआ हूंगा. उसने चुपके से फुसफुसाते हुए फोन पर कहा कि हमलोग अभी घुमने निकलेंगे..मन फिर से बावला हो गया. सर सामने थे और कविता श्रीवास्तव के घर पे रेड होना बड़ी बात थी. '' सुनो..हम्म..भैया भी है...गली में मत आना'', तो फिर?,...अरे बाबा चौक पे..बीप बीप..फोन कट गया इस बार भी. ''सर मै निकलता हूं कुछ काम है...ह्म्म्म ..'' कह के जैसे तैसे रसगुल्ला घोंटा और मार्क्सवादी कुर्ते में ही  चल दिया उसके मोहल्ला. जब कोलेज में था तो एक रात उसे मजाक में कहा था कि तुम्हारा भैया मोटू है. बाप रे ऐसा चिल्लाई कि मैं हिल गया..''मेरे भैया के बारे में कुछ बोलोगे तो अच्छा नही होगा...कह देते हैं...हम्म...'' फिर एक एसेमेस की ''मलाई में सिंदूर मिलाने से जो रंग बनता है उसी रंग का है मेरा भैया...जब मै बीमार थी तो वो मेरे लिए वैष्णोदेवी गया था...''.
      उसकी गली के बाहर नुक्कड़ की दुकान में मै टिक गया. पुराने दिन..सायकिल से नवीन सर के घर जाकर अमानत सीखना, प्रतियोगिता दर्पण में लेख कम्पीटीशन में दलित साहित्य के मुद्दे पर लिखने के लिए जानकारी इकट्ठा करने सीताराम चौधरी के घर जाना, इंटर में पढने के दौरान एक लड़की को लाइन मारने के लिए इस रास्ते पर भागना...इतिहास हमेशा डरावना तो नही होता! सीसीटीवी की तरह नजर टिकी थी गली के मुहाने पर. थोड़ी देर में ही जत्था निकला.करीब आधा दर्जन लोग थे. उसने थोड़ी देर बाद ही किसी बहाने पीछे देखा फिर सब कुछ नोर्मल हो गया. एक सुरक्षित दूरी बनाकर कदमताल होने लगा. वो मेला देखती मै उसे देखता साथ में यह भी देखता कि कोई देखता न हो! कभी आगे कभी पीछे सिलसिला कोई बीस मिनट तक चला. बोर होने जैसा कुछ फिल नही हुआ. किस्मत ने फिर कमाल दिखा दिया..उफ्फ़..स्स़ा..ये कहां से मिल गये!! एक खूब दूर के बेकार वाले रिश्तेदार मिल गये..रिश्ते में तो हम तुम्हारे मामा लगते हैं पर नाम है योगेश कुमार शीतल! वो मुझसे दस कदम आगे और रिश्तेदार उससे मुश्किल से तीन कदम पीछे और उतना ही पीछे उनसे मैं. नजर मिल गयी तो घसेट शुरू हुआ. ''कब आये..कैसे आये...कहां से आये...कब तक हैं...घर में सब कैसे हैं...ह्म्म्म'' एक को तो बायलेंस करते करते हालत पतली थी अब ये नई आफत!! वो बेचारे घरवाली के साथ थे, घरवाली मुझे देखकर बिदक गई, बेचारी मन ही मन स्वामी से कह रही होगी ''ए जी, ये ठीक नही है, एक तो साल में एक दिन घुमाने निकलते हो उसमे भी ये हाल है..'' क्या पता मुझे भी मन ही मन क्या क्या कह रही हो! अच्छा हुआ कि एक मूर्ति देखने वो रुके और मै आगे निकाल गया लेकिन उफ्फ्फ्फफ्फ़...उसके जत्थे को लांघते हुए निकाल नही पाया और बीच से निकलने के क्रम में इंजीनियर भैया की नजर पर चढ़ा तो ऐसा चढ़ा की बस माने पूरी बोतल चढ़ गयी हो भरी  बरसात में. उसके घर में हंगामा बरप गया. वो बेचारी रह गयी और सामूहिक फटकार से बेचारी फफक फफक कर रो पड़ी. ''तुम आगे क्यूं आये...अरे सुनो तो..कुछ नहीं सुनना, तुम आगे क्यूं आये...अरे सुनो तो...तुम पीछे पीछे नही चल सकते थे...हम्म...''. थोड़ी चुप्पी फिर उसने धीरे से कहा ''रिजर्वेशन केंसिल करा लो न!!''  

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