Tuesday, October 25, 2011

                                         समय से संवाद 
        डर रोज बढ़ते ही जा रह है. ख़त्म कब होगा कुछ कहा नहीं जाता लेकिन मन यह जानता है कि जहां ये डर ख़त्म होगा वहां से दूसरा डर शुरू होगा. ठीक वैसे ही जैसे पिछला डर ख़त्म होने के बाद ये डर शुरू हुआ था. एक डर, घरवालों को कुछ पता न चल जाय इसका! फिर एक डर, पता चल जाने के बाद कुछ अति अप्रत्याशित न हो जाय इसका! फिर एक डर, उसके घर में आये भूचाल के कारण मचने वाले तवाही का! तबाही के बाद मलवे में उसके जिन्दा होने के शक के पीछे का एक अजीब सा डर! एक डर, पुराने घाव के ताज़ा होने का और इसी से मिलता जुलता एक और डर उनके ससुराल में होने वाले तांडव का! इस सब के बाद एक डर खुद पर कंट्रोल न रख पाने का!
     कभी कभी सब कुछ भूलने के चक्कर में भूली गई बातें भी दिमाग में सनसनाते हुए घुस जाती है. फिर जिसे भुलाना है वो एक कोने में छिप कर टीस देती है. क्या चाहती है ये जिन्दगी? 
     हां न करते करते उसने पूछ ही लिया कि ''मान लो अगर मैं तुम्हें न मिल पायी तो!!'' हमेशा की तरह मैं सोचता रहा और फोन कट गया. शायद फिर से कोई आ गया था! खैर कोई हो उसे जो कहना था सो उसने कह मारा अब बारी मेरी थी. कहने को कुछ न था और ये उसे भी खूब पता था. इसीलिए फोन काटने से पहले यहां तक कह चुकी थी कि वो मुझे नहीं छोड़ेगी लेकिन घर वाली उसे मजबूर कर दें तो!! 

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