Monday, October 10, 2011



                                             समय से संवाद

        भूलने की कोई दवा अगर बनी होती तो जिंदगी थोड़ी आसान हो जाती। कुछ ऐसी गलतियां जिनपर माफी नहीं मिल सकती और आत्मग्लानी के आंसुओं ने बिस्तर गीला कर कर के जीना मुहाल कर दिया हो, उन गलतियों को भुलाने के अलावे क्या विकल्प है? लिखने में अब मन नहीं लगता, और अकेले अकेले खुद से बात करते करते आवाजें भी थक कर चुप होने लगती है। रोने धोने से कुछ बदल तो जाता नहीं! बकरे के आंसू क्या कसाई को दिखते हैं? मुर्गे को नोचते समय अगर कसाई उसकी भावनाओं को पढ़ने लगे तो बेचारा उसी चाकू से अपने नस को काट लेगा। इसलिए अच्छा है कि भावनाओं को नजरअंदाज किया जाय। वैसे भी भावनाएं आज के दौर में कोई मायने नहीं रखती है।
       कुछ चीजें सोचना नहीं चाहता फिर भी सोच डालता हूं। उसका यूं फोन पर मुझे डांटना फिर परपोज की छोटी सी प्रक्रिया, मेरा हां कह देना। एक बामुश्किल पटरी पर आ रही गाड़ी को वापस रास्ते से उतार देना। एक विश्वास का नृशंस कत्ल करना। रिश्तों का खून करना और खुद भी खून से लथपथ होकर असहाय सा निढ़ाल हो जाना। उफ। सब बर्बाद हो जाने के बाद भी आकाश की तरफ देखते रहना। एक अवसाद। एक चुप्पी। एक खामोशी। एक अंत की शुरूआत। बस। कुछ सूझ नही रहा. एक ऐसा चौराहा जिसमे हर तरफ एक डरावनी बदबू आ रही है, आलम ये है कि चौराहे पर भी सोचने के लिए वक्त नही है. कोई छः महीने का समय दे रहा है तो कोई साल भर का. कैसे करें! मै अचानक इतना बड़ा कब हो गया या अल्लाह!!!

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