Monday, October 10, 2011


                                            समय से संवाद

          लगता है कि कुछ दिनों में आत्महत्या कर लूंगा। एक समय मैं ऐसा नहीं था। इस बार दूर्गापूजा में घर आने का एकमात्र मतलब एक नई सुबह की शुरूआत थी। मैं इसमें असफल रहा। रात अभी और लंबी चलने वाली है और लगता है कि मैं इस रात के अंतिम पहर के अन्त अन्त तक इस जिंदगी को अलविदा कह दूंगा।
         बेटे का मन ज्लेबी खाने का था शायद क्योंकि सिंघारा कल उसके बड़े पापा ले आए थे। बेटी चुप थी। हालांकि घुमने चलने की जिद बेटी की ही थी। काफी कमजोर है बेचारी दिल से। शाम में खेलते समय शायद आज उसके आंख में चोट आ गई थी। उसने अपने छोटे से फ्राक में मुंह का भाप दिया और फिर अपनी आंखे सेंकी। उसने ऐसा तीन बार किया। मैं खिड़की से देख रहा था और वह इससे अनजान थी। कलेजा मुंह को आ गया मेरा। हूं तो आखिर आदमी ही। भावनाओं को कैसे हटा दूं। पता नहीं ममता कहां से आ गई मेरे अन्दर! उसे अंदर बुलाया। पुचकारते हुए कहा, क्या हुआ बेटा? उसने दो बार कहा कि कुत नहीं। शायद मुझसे बहुत डरती थी इसलिए मुझे नहीं बता रही थी। मैं उसका पापा नहीं था और वह ये जानती थी। पापा जेल में हैं। यह भी उसे पता है। मैने पूछना जारी रखा तो कही कि कुछ भोंका गया। उसका यूं अपने फ्राक से खुद ही मुंह का भाग लेकर चुपचाप आंख सेंकना मुझे विचलित किये जा रहा था। बदनसीबी ऐसी! उफ! अभी उसकी मां होती तो अपने आंचल से उसका आंख पोछती। लेकिन इत्ती से बच्ची का फ्राक आंचल कैसे बन गया! क्या चलता है इसके मन में! क्या गुजरेगा उसके मन पर जब उसे पता चलेगा कि उसकी मां, जो शायद ही उसे कभी दूध पिलाई हो, एक हाटल के कमरे में फंदे से लटकी मिली थी हाॅटल मालिक को कभी। जिंदगी ऐसी क्यों है? इतनी जालिम, इतनी निर्दयी, इतना दर्द लिए क्यों जिंदगी किसी को मौका नहीं देती कि कोई उसे यह बताए कि वो जिसे दर्द देती है, उसके आस पास का करीब पूरा परिवार और उस परिवार का एक एक सदस्य उस दर्द को भोगता है। क्यूं है जिंदगी ऐसी कि हर कोई एक खुट्टे से बंधा है। इस बंधन को तोड़ने की क्या कीमत लेती है जिंदगी। कितनी कीमत है इसकी। क्या नास्तिक होना इसकी कीमत है? क्या कू्रर और असहाय हो जाना ही इसकी कीमत है? क्या आत्महत्या करना इसकी कीमत है? अगर आत्महत्या करना इसकी कीमत है तो मैं जाने अनजाने जल्द ही यह कीमत चुका दूंगा। अब बर्दाश्त नहीं होता।

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