Saturday, October 1, 2011

दमन और शोषण की खुराक से चमचमाता मारुती इण्डिया

      अगस्त के आखिरी सप्ताह से मारूती इंडिया प्राइवेट लिमिटेड की रीढ़ टूटी हुई है। कंपनी के सभी मजदूर अपने साठ से अधिक साथियों को बेवजह नौकरी से निकाल देने और कंपनी प्रबंधन द्वारा जबरन  कथित अच्छे बांड पेपर पर हस्ताक्षर कराने की शर्त थोपने के विरोध में हड़ताल पर हैं। विवाद का मुख्य केन्द्र मजदूरों की एक मांग है जिसमें मजदूरों ने अपनी एक यूनियन को मान्यता दिए जाने की बात की है। मजदूर अपनी यूनियन बनाना चाहते हैं। बता दें कि मारूती के मजदूरों की एक अन्य यूनियन है लेकिन उसपर पूरी तरह से प्रबंधन का नियंत्रण है। मजदूरों के हित से जुड़े किसी मामले पर वह यूनियन प्रबंधन के अधीन होने के कारण आवाज नहीं उठा पाता है। इसलिए मजदूर लोकतांत्रिक तरीके से अपनी एक यूनियन बनाने की मांग कर रहे हैं।

क्या मारूती के मजदूर गैरअनुशासित हैं?
         अपने पिछले भारतीय दौरे में सूजूकी मोटर कार्पोरेशन के अध्यक्ष सह मुख्य कार्यकारी अधिकारी ओसामू सूजूकी ने कहा था कि कंपनी न तो जापान में और न ही भारत में अनुशासनहीनता बर्दाश्त करेगी। मारूती इंडिया प्राइवेट लीमिटेड द्वारा मजदूरों के खिलाफ लिए गए फैसले का आधार भी इसी बयान को बनाया गया है। ऐसा लगता है कि श्री सूजूकी ने मारूती इंडिया प्राइवेट लीमिटेड की समस्या का सही आकलन नहीं कर पाये या उन्हें इस बारे में सही जानकारी नहीं दी गई।
        पिछले तीन सालों में मारूती इंडिया प्राइवेट लीमिटेड ने जबर्दस्त उत्पादन और लाभ के बलबूते सूजूकी मारूती कारर्पोरेशन को बहुत उंचा पहुंचा दिया है। इसकी वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार 2008-09 के दौरान जहां जापान में पंजीकृत उत्पादनों में भारी गिरावट आई वहीं भारत में इस दौर में भी एक तरफा रूझान देखने को मिला और कंपनी खूब उंचाई पर गई। क्या ये गैरअनुशासित कर्मचारियों के बदौलत संभव हो पाता? क्या इससे मजदूरों की मारूती के प्रति वफादारी और प्रतिबद्धता नहीं साबित होती है?
       हाल की वार्षिक रिर्पोट के अनुसार सूजूकी मोटर कार्पोरेशन ने 2010-11 में 26,41,634  ईकाई की दुनिया भर में बिक्री की। इनमें से 5,88,395 ईकाई जापान में बेची गई और बाकी 20,53,239 ईकाई जापान को छोड़कर विश्व के बाकी देशों में बेची गई। इन सबके अलावे सिर्फ मारूती इंडिया प्राईवेट लिमीटेड ने इस दौरान 12,71,005 कारों की बिक्री की। इसका सीधा सा मतलब यह है कि मारूती सूजूकी ने बारसठ फीसदी कारें बेची जबकि सूजूकी ने इस दौरान मा़त्र 48 फीसदी कारें बेची जिनमें जापान में हुई उसकी बिक्री शामिल नहीं है। 2009-10 और 2110-11 के बीच जापान में सूजूकी की कार बिक्री में 5.4 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई जबकि जापान से बाहर इसकी बिक्री में 18.8 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई। इसमें सबसे बड़ा योगदान मारूती इंडिया प्राईवेट लिमिटेड का रहा जिसकी बिक्री में 24.8 फीसदी की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई।
       यह मानी हुई बात है कि सूजूकी जैसी अंतर्राष्ट्रीय कार्पोरेशन के लिए लाभ का ज्यादातर हिस्सा भारत जैसे विकासशील देशों से अर्जित होता है। एक तरफ मजदूर अपनी कड़ी मेहनत से उत्पादन में रिकार्ड बढ़ोत्तरी करते है वहीं दूसरी ओर भारत जैसे विकासशील देशों का बाजार इन उत्पादनों के लिए अनुकूल वातावरण तैयार कर इनकी बिक्री मंदी में भी बनाए रखता है। परिणामस्वरूप, जब अमेरिका, जापान और यूरोपीय बाजार मंदी और कंगाली में डूबे रहते हैं वैसे समय में भी भारत इन कम्पनियों का लगातार ओक्सीज़न देते रहता है।
        वर्षिक रिपोर्टों के आकलन से पता चलता है कि आटोमोबाइल क्षेत्र में सूजूकी मोटर कारपोरेशन की वैश्विक भागीदारी 2005 में 12 फीसदी से बढ़कर 2007 में 27 फीसदी हो गई और इसकी वैश्विक आमदनी 2005 में 42 फीसदी से बढ़कर 2010 में 55 फीसदी हो गई।
        इन सब के बावजूद सूजूकी के मालिकों का नजरिया भारतीय कामगारों के प्रति काफी शोषक और दमन से भरा हुआ है। इतने कटिबद्ध और कंपनी के प्रति समर्पित मजदूरों को अनुशासन के नाम पर जबरन बांड साइन कराया जा रहा है। यह दमन की चरम अवस्था है जिसने मजदूरों को हड़ताल करने पर बाध्य किया है।

क्या है मजदूरों की समस्या?
        मारुती सूजूकी इंडिया लिमिटेड की वार्षिक बिक्री जहां 2001-02 में 900 करोड़ थी वहीं यह 2010-11 में 36,000 करोड़ हो गई। करों को हटा दें तो कंपनी का शुद्ध लाभ जहां 2001-02 में 105 करोड़ था वहीं यह 2010-11 में बढ़कर 2,289 करोड़ हो गया। लेकिन इससे मजदूरों को क्या मिला?
        एक स्थायी कर्मचारी को कंपनी मासिक वेतन के अलावे 8,000 रूप्ये भुगतान करती है। अनुभवी और वयस्कता के आधार पर इसकी अधिकतम सीमा 14,000-15,000 रूप्ये है। महीने में मजदूरों द्वारा ली जाने वाली  छुट्टियों के अनुसार इसमें कटौती की जाती है, स्थायी कर्मचारी द्वारा एक दिन न आने पर इस भुगतान से 1,500 रूप्ये काट लिये जाते हैं। इसका मतलब यह हुआ कि अगर कोई स्थायी कर्मचारी पांच दिन से अधिक की छुट्टी लेता है तो उसका पूरा भुगतान रद्द हो जायेगा और उसे मात्र 8,000 रूप्ये मिलेंगे। ठीक इसी तरह वयस्क कर्मचारियों के लिए यह भुगतान 10,500 रूप्ये है यानि कि अगर कंपनी का कोई वयस्क कर्मचारी सात दिनों की छुट्टी लेता है तो उसे सिर्फ मूल वेतन ही दिया जायेगा। यह सभी छुट्टियों में लागू होगा और कोई भी छुट्टी अपवाद नही होगी। वेतन के यही नियम और शर्त कंपनी के सभी मजदूरों पर लागू हैं। ट्रेनी कर्मचारियों के लिए एक दिन की छुट्टी पर 8,00 रूप्ये की कटौती की जाती है। इन सबके अलावे ठेके पर बहाल कर्मचारियों के वेतन से अतिरिक्त मिलने वाला भत्ता सिर्फ दो दिनों की छुट्टी लेने पर ही समाप्त हो जाता है। बेशक वेतन की इन सेवाशर्तों से कर्मचारियों का मानसिक और शारीरिक दोहन किया जा रहा है और मजदूर क्यों कंपनी प्रबंधन के खिलाफ एकजुट हो रहे हैं।
      कंपनी के मानेसर प्लांट में पैंसठ फीसदी से अधिक कर्मचारी ठेके पर बहाल किये गए हैं। इनके साथ कंपनी द्वारा जबर्दस्त शोषण और लेबर लो  की अवहेलना की जा रही है। कंपनी इन कर्मचारियों को अलग अलग भागों में बांट कर इनके साथ घटिया खेल खेल रही है।
      कंपनी के मानेसर और गुड़गांव प्लांट में वेतन की नियम और शर्तें कमोवेश एक ही है। मारूती इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के पिछले कार्यकाल पर गौर करना भी जरूरी है। मसलन, 2007 में अगर कोई स्थायी कर्मचारी साल भर में एक भी छुट्टी न लेने पर 2.80 लाख कमाता था तो आज वह 3 लाख कमा रहा है। यानि की चार साल में उसके वेतन में मात्र 5.5 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई। वहीं अगर उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर नजर डालें तो हरियाणा के फरीदाबाद केन्द्र में यह सूचकांक 2007 से 2011 के बीच पचास फीसदी चढ़ा है। ऐसी स्थिति में कर्मचारियों और मजदूरों की मानसिक स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है।
      सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि मारूती इंडिया प्राइवेट लीमिटेड के सीईओ का वेतन जो कि 2007-08 में 47.3 लाख था वह 2010-11 में 2.45 करोड़ हो गया। इसके अलावे अध्यक्ष के वेतन में इस दौरान 91.4 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई। इन पुष्ट आंकड़ो से साफ पता चलता है कि किस तरह मारूती प्रबंधन मजदूरों और कर्मचारियों के मानवाधिकारों का दमन और शोषण करके मीडिया के बड़े हिस्से को खरीद कर अपनी मनमानी कर रहा है।
      ऐसी स्थिति में कर्मचारियों का एक यूनियन बनाने के लिए एकजूट होना कोई अप्रत्याशित कदम नहीं है। आईएलओ और मजदूर से जुड़े तमाम कानूनों के अनुसार भी कर्मचारियों को यूनियन बनाने का हक मिला हुआ है लेकिन इसके बावजूद मारूती इंडिया प्राइवेट लिमिटेड इन तमाम कानूनों और प्रावधानों को ताक पर रखकर और मीडिया पर अपनी पकड़ बनाकर हीरो बना हुआ है। यह कहने की जरूरत नहीं कि हरियाणा सरकार से यह सब छुपा हुआ नहीं है और हरियाणा सरकार खुलकर कंपनी प्रबंधन के साथ खड़ी है।

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