Wednesday, September 21, 2011

        अफ़सुर्दा कसक (सागर के ब्लॉग 'सोचालय' से साभार)

 

 डर लगता है, हाँ डर लगता है बहुत सारा डर लगता है. इतने सारे आरोपों के बाद भी खुल के लिखने में, कई बातें कहने में, कई दृश्य खींचने में, कई वाकये पेश करने में, कई परतें उधेड़ने में. डर है यह कहीं किसी को लील ना जाये, खुदकशी पर मजबूर ना कर दे, निराशा, अवसाद, दुःख, दर्द के उस घेरे में ना ले जाये जिससे बचने के लिए लोग अक्सर लिखते हैं.

लेखकों पर समाज की बेहतरी की जिम्मेदारी होती है, लोग किसी के जीवन में पोजिटीविटी के लिए लिखते हैं या लिखना चाहिए. कहाँ से यह बात घर कर गई थी और क्यों कर गई थी ये आज तक याद नहीं और इसका वजह  नहीं जान सका... यह दिल में ऐसे ही चलता रहता है जैसे पाप और पुण्य की लड़ाई चित्रलेखा में खींची गई है.

पर कई उपन्यास पढते हुए और हर्फों के आईने में उगे अपने चेहरे को पढते हुए लगा, नहीं, यही सही और मुकम्मल (आप अपने लिए बेहतर, पढ़ें) रास्ता है जो अपने तड़प को कम करता है कि जब हम जो चाहें, सोचें और करें वो लिख सकें. भले ही वो गलत हो, अनैतिकताओं को अनजाने में या परिस्थितिवश सही करार देता हो या फिर उसका समर्थन करता हो, वो आदमीरुपी महत्वाकांक्षा में डूबी हो या फिर कोई कठोर निर्णय के आधार पर कसी गयी हो.

दास्तोएवस्की को पढते हुए मुझे भी यह विचार आने लगा बल्कि यह विचार तो पहले से था पर इसे लिख पाने का साहस नहीं था. समाज की जिम्मेदारियों के प्रति ध्यान अटक जाता और इसे अगले ख्याल तक के लिए मुल्तवी कर दिया जाता. लेकिन मैं कब से जिम्मेदार होने लगा? या हुआ हूँ ? मैं होश में तो हूँ ! कब पलट कर यह सोचा कि इस लिखे से फलाने का जीवन बदल जाएगा, कोई थका हुआ इंसान उठ कर फिर से चल देगा, किसी की नींद टूटेगी, कोई तानाशाह  जागेगा, रोज़मर्रा के काम बंद हो जायेगे, इश्क में फरेब नहीं रहेगा, हम सभ्य नागरिक बन जायेंगे जाहिरी तौर पर दुनिया बदल जायेगी रही है या फिर अब तक मेरा ही क्या बदला है. ओह नहीं! यह तो मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा और आज भी सोचना मूर्खता ही लगता है. (पाठक इसे मेरा बड़प्पन/ महानता ना मानें)

पिछले पन्ने जिन पर मन भर धूल खेली है, रंग उडाये हैं, शराब उड़ेली है, इश्क फ़रमाया है, क़त्ल किये हैं, संगीन कारगुजारियों को अंजाम दिया है जो माफ़ी के काबिल नहीं है और ना लोग यह कह पा रहे हैं कि मुझे फांसी दे दी जाये. कुल मिला कर तजवीज की जाये तो हालत मुहाजिरों जैसी लगती है, शरणार्थियों सी लगती है या फिर फिलिस्तीन के उन्मादी वतनपरस्त सा जो जब तब दीवार के उस पार बम फेंक आता है तो इन देख कर तो यह दुःख नहीं होना चाहिए. जिंदगी जीते (नहीं इसे सुधारते हुए कहता हूँ कि सांस लेते) पच्चीस साल होने को आये और उधेड़बुन ज्यों की त्यों है और क्या गेरेंटी है की यह खतम ही हो जायेगी?

जिसे पाना था उसे छोड़कर मलाल किया, दुःख तय था और ऐसे मनोभाव में सुख मिला तो यह अप्रत्याशित था. इसे जीते रहने (पाठक इसे फिर से क्षमा करें, और यहाँ सांस लेना ही समझें) में हमने जो सूक्त वाक्य जमा किये जो कितना कारगर है, क्या यह सिर्फ मुसाफे भर नहीं है? मैं भूखा सोया और भूखे रहना अच्छा लगने लगा फिर पीछे से तकलीफ आई और कई सारे सपने पूरे हुए, कुछ चेहरों को हमने जान बुझ कर इतने करीब आने दिया जिसे वक्त-बेवक्त याद कर हम अवसाद में जा सकें, कुछ रिश्तों में खटास लाकर हमने अपनी उपयोगिता सिद्ध की और अपने जीवन को सार्थकता देखी. इन पर मेरा पूर्ण नियंत्रण था.

प्रेम भी एक नहीं कईयों से की बाबजूद उसके, सबके लिए वफादारी रही ताकि इतिहास में कुछ गवाह रहें और  कई बार तो यह भी नहीं सोचा बस प्रेम किया इन सब से ऊपर उठ कर. ऐसा नहीं की मैं बड़ा महान था बल्कि मेरे चरित्र में तो दो लाख छेद हैं. यह प्रेम कई स्तरों पर था. तमाम जटिलताएं इनमें थी.

कुछ ऐसे खंजर भी थे जिससे हम खुद को पूरे होशो-हवास में दो टुकड़े कर आतें बाहर निकाल कर देखते. पहले तकलीफ होती फिर ये आदत, राहत ले कर लाने लगी.

समाज, इंसान, ज्ञात-अज्ञात सभी चीजों से यह क्रूर प्रेम था, है.

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