Tuesday, September 13, 2011


                           पंचटकिया का वो डब्बा और एक सवाल


       ठीक से याद नहीं है कि ये आदत कब लगी थी लेकिन बहुत पुरानी थी। बहुत पुरानी। कम से कम आज से पांच साल या उससे भी अधिक। मोबाइल रिचार्ज करने के लिए अनगिनत बार इसका उपयोग किया था। रोग बहुत पुराना था। 

      इस बार दिल्ली आते वक्त पापाजी से कह दिया कि जरूरत पड़ने पर बिना हिचकिचाए इस डब्बे से पंचटकिया निकाल लीजिएगा। पंचटकिया का वो डिब्बा मेरे लिए कई यादों को समेटा एक प्रत्यक्ष सबूत था। जब भी बेगूसराय जाता था एक बार पूरे डिब्बे को बिछावन पर उझल कर संतोष जरूर करता था। इस दौरान अपने कमरे का दरवाजा बंद कर लेता था। इतना लगाव था उस डब्बे से। दस दस को एक तरफ करके गिनता और फिर खुश होकर वापस डब्बे में रख देता था। आज भी याद है सावित्री सिनेमाहॉल में चाउमीन खाते वक्त तावा पे अंडा फोड़ कर डालते देख मेरा मन भन्ना गया था और मैंने डिसाइड किया था कि जो खर्चा लगे लेकिन अब कभी मार्केट का चाउमीन नहीं खाउंगा। उसी शाम परमोद भैया के एक रिश्तेदार के क्रोकड़ी दुकान से चाउमीन के लिए बड़े से तावे का दाम पता किया। लाहे का तावा था तौल के हिसाब से दो सौ साठ या ऐसे कुछ बना। मैं चाउमीन का शौकीन था। खासकर जब मैं खुद बनाता था। मैंने बिना किसी को बताए चुपचाप एक एक कर जमा किए पंचटकिया को गिन गिन कर दुकानवाले को दिया और चाउमीन का तावा लेकर घर आ गया। पंचटकिया का वो डब्बा मेरा संकटमोचन था।
      कहीं भी पंचटकिया मिलता तो मैं उसे पिछवाड़े के बांयी वाली जेब में रखता और तो और सौ सौ के नोट के खुल्ले कराकर उसे पंचटकिया में भंजा कर उसे डब्बे में डालता। इतना मोह हो गया था कि उस पंचटकिये के डब्बे से कि मोस्ट एमरजेंसी में ही उससे एक भी सिक्का निकालता था।
       पापाजी को उंगली में बड़ा जख्म हो गया है। डायबीटिज पेसेंट होने के कारण उनका वो जख्म ठीक नहीं हो रहा है। वो काफी डरे हुए हैं। वैसे भी जब से बाय पास सर्जरी हुई है उन्हें छोटा सा जख्म भी काफी बेचैन कर देता है और अनाप शनाप सोचने लगते हैं। खैर आज जब उन्होंने फोन पर कहा कि ‘‘तोहार पंचटकिया बहुत काम कैर रहलय हन'', तो मैं निशब्द रह गया। क्या बोलता मैं? 

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