Thursday, September 15, 2011

     शोषण और दमन से पोषित है भारत की ऑटोमोबाइल क्रांति

       मारुती सूजूकी ने पिछले दिनों विशेष दर्जा वाले बेहद लोकप्रिय कार  स्विफ्ट का नया मॉडल लांच किया। मीडिया में इस खबर का जलवा रहा और इसे खूब सुर्खियां मिली। कंपनी का ऐसा रुतवा है  इसके कार की 80,000 अग्रिम बुकिंग फिलहाल है और खरीददारों की संख्या दिन ब दिन बढ़ती जा रही है। हालांकि मारूती के हरियाणा स्थित मानेसार कारखाने में पिछले तीन महीने से मजदूरों के संघर्ष के कारण खरीददारों को यह कार फिलहाल नहीं मिल पायेगा। ये खबर मीडिया में लगभग नहीं है। अपवाद के तौर पर  पिछले दिनों फिनांसियल एक्सप्रेस में यह खबर दी गई है कि मारूती के उत्पादन में बाधा आ रही है। खबर में यह भी कहा गया कि मारूती कारखाने में काम करने वाले मजदूरों को कुछ राजनीति करने वाले लोग बरगला रहे हैं और उन्हें जानबूझ कर भड़का रहे हैं।
      चूंकि मीडिया ने मजदूरों की आवाज को दबा दिया इसलिए बाहरी दुनिया इस घटना से अनजान रह गई। किसी को कुछ पता ही नहीं चला कि पूरा मामला क्या है। मुख्यधारा की मीडिया की ख़बरों पर आश्रित लोगों को अब भी कुछ पता नही है. दरअसल सार्वजनिक रिपोर्टों और वेबसाइट के जरिये जो जानकारी सामने आई है उसके अनुसार वहां काम करने की सेवा और शर्तें कम से कम दमन और घोर मानवाधिकार हनन को अपने में समेटे है। मानेसर कारखाने में 3,000 के करीब कामगारों को ठेके पर रखा गया है। अनुभवी स्थाई कर्मचारी को 6,000 से 18,000 रूपये तक मासिक वेतन दिया जाता है। इनसे आठ घंटे काम लिया जाता है। हर कर्मचारी को प्रतिदिन 600 कारों के उत्पादन के लिए आठ घंटे यानि 480 मिनट  काम करता है, इसका सीधा मतलब यह है कि हर मजदूर को एक मिनट के अन्दर अपना काम हर हाल में करना होता है। मजदूरों को चाय, नाश्ते और फ्रेश होने के लिए अधिकतम सात मिनट का समय दिया जाता है इसके अलावे प्रतिदिन 20 मिनट अतिरिक्त खाना खाने के लिए दिया जाता है। मेडिकल या अन्य छुट्टियां पर पाबंदी है और एक दिन अनुपस्थित होने पर मजदूर के वेतन से 1,500 रूप्ये की कटौती कर ली जाती है, यहां तक कि सात मिनट के टी ब्रेक के बाद वापस कतार में खड़े होने में एक मिनट की भी देरी होने पर आधे दिन का वेतन काट लिया जाता है। काम करने की सेवा शर्तों से जुड़े कई अन्य गंभीर मामले इसलिए सामने नहीं आ पाए क्योंकि मजदूरों का संगठन प्रबंधन के नियंत्रण में है या इसे ऐसे कहें प्रबंधन ने मजदूरों का नेतृत्व खरीद लिए है. मजदूर पिछले कई महीनों से अपनी अलग यूनियन बनाने और उसे मान्यता दिए जाने की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। मजदूरों ने मारूती सूजूकी इम्प्लायी यूनियन ‘‘एम एस इ यू‘‘ बनाया है जिसमें मानेसर प्लांट में काम करने वाले सभी मजदूर शामिल हैं। प्लांट के प्रबंधन और हरियाणा सरकार के श्रम विभाग ने इस संगठन को मान्यता देने और इसके साथ किसी तरह की बातचीत से इनकार कर दिया।
         एमएसइयू की बढ़ती ताकत और आक्रोश को देखते हुए मारूती प्रबंधन ने इस यूनियन के कुछ नेताओं को नौकरी से निकाल दिया जिनके नेतृत्व में जून में मजदूर हड़ताल पर जाने वाले थे। तब 13 दिनों के हड़ताल के बाद हरियाणा सरकार और मारूती प्रबंधन ने यह आश्वासन दिया था कि वह एमएसइयू को मान्यता दे देगी और नौकरी से निकाले गए मजदूरों को वापस नौकरी पर रख लिया जायेगा। साथ ही यह भी आश्वासन दिया गया कि आगे से मजदूरों पर कोई कार्रवाई नहीं की जायेगी। इन सारे वादे और आश्वासन को हरियाणा सरकार और मारूती प्रबंधन ने तोड़ दिया। तकनीकी आधारों पर एमएसइयू की मान्यता खारिज कर दी गई और जिन मजदूरों को वापस काम पर लाया गया था उनपर कई गलत आरोप लगाकर उन्हें वापस बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। अगस्त के अन्त में मारूती प्रबंधन ने कुछ मजदूरों पर यह आरोप लगाया कि उन्होंने कुछ गाड़ियों को जानबूझ कर नुकसान पहुंचाया है। मजदूरों ने इस पर कड़ी असहमति जताई। मजदूरों ने स्पष्ट किया कि फैक्टरी में सभी जगहों पर कैमरे से निगरानी की जाती है। प्रबंधन के लिए यह जानकारी जुटाना बिल्कुल आसान है कि किस कर्मचारी ने ऐसा किया है। मजदूरों की बात को दरकिनार करते हुए बिना किसी ठोस सबूत के प्रबंधन ने कड़ा फैसला लेते हुए 23 कर्मचारियों को बर्खास्त कर दिया और अन्य 26 को ससपेंड कर दिया। इनमें से लगभग सभी कर्मचारी मजदूरों के संगठन के पक्ष में कर्मचारियों को संगठित कर रहे थे और अपने हक के लिए प्रबंधन पर दबाव बना रहे थे। अगस्त के अंतिम सप्ताह जब कर्मचारी सुबह की शिफ्ट में आए तो फैक्टरी पुलिस छावनी में तब्दील हो चुकी थी. प्रबंधन ने सभी कर्मचारियों से एक बोंड पेपर साइन कराया जिसमें स्पष्ट लिखा था कर्मचारी अपनी मांगो की मनवाने के लिए किसी तरह के यूनियन का गठन नहीं करेंगे। भारत सरकार से हाल में अवकाश प्राप्त श्रम सचिव ने इस बांड को गैर कानूनी बताया है। जिन मजदूरों ने बांड पेपर पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया उसका प्रवेश फैक्टरी में रोक दिया गया।
      जानकार बताते हैं कि मारूती प्रबंधन ने हरियाणा सरकार और मीडिया पर जबर्दस्त पकड़ बना ली है। आखिरकार मारूती सिर्फ मानेसर ही नहीं समूचे भारत की शान कही जाती है। पेट से फाजिल विज्ञापन के मोह को कोई मीडिया छोड़ना नहीं चाहता इसलिए मारूती में गैरकानूनी और शर्मनाक रूप से हो रहे दमन और शोषण पर मीडिया आंख मूने बैठा है।
         मारूती निजी क्षेत्र में मजदूरों के शोषण का कोई अपवाद नहीं है। सच यही है कि उदारीकरण के बाद राजनीति को पूरी तरह अपने कब्जे में ले चुका निजी क्षेत्र शोषण और दमन की क्रूर दास्तान लिख रहा है और उसकी पूंजी के आगे न तो मीडिया टिक पा रही है और न ही भारतीय राज्य।

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