Saturday, September 3, 2011

जब मैं उड़ा



                   मेरे दोस्त और मेरी पहली हवाईयात्रा


''स्पाइस जेट के विमान में जब एयर होस्टेस ने आपात स्थिति से संबंधित निर्देश दिए और जब आकाश में कड़कती बिजली के बीच सूचना दी गई कि हम प्रतिकूल मौसम में हैं कृपया चहलकदमी न करें तो मुझे मां की याद आ रही थी जिन्हें बताये बिना मै आसमान में आ गया था. भूख से बिलबिलाता हुआ मैं अपने बनाये रास्ते पे चला जा रहा था. बेपरवाह. अकेला. चुपचाप. आशा की एक किरण की तलाश में.''

       साकेत ने मुझे काफी हद तक सुधार दिया था। जानबूझ कर रांग नम्बर डायल कर लड़कियों से बात करने की आदत मुझे उसी ने छुड़वाई थी। उसके मुझपर इतने एहसान हैं कि कह नहीं सकता। मेरे हिम्मत हारने पर उसकी फटकार, उसकी जीवनशैली, बात करने का अंदाज, संस्कार, अनुशासन और गजलों का शौक ताउम्र याद रहेगा। वो भूमिहार होकर भी भूमिहार को लेकर ग्रामीण मान्यताओं की कसौटी पर खड़ा नही उतरता था, हालांकि रंगबाजी में उसका  जोर नही था। काली स्थान के पास पान खाते हुए देश की दशा दिशा के बारे जोशीले अंदाज में चर्चा करना, लॉ कॉलेज में बदमाशी, शाम में छत पर आकर लड़कियों पर लाइन मारना, दूर चौड़ में एकांत में बैठ कर जिंदगी की तलाश करना और दिल खोल कर एक दूसरे से सब बातें करना और करियर के बारे में लंबी बाद विवाद प्रतियोगिता सरीखे हमारी बहस सब कुछ ऐसा था मानों एक आजाद जिंदगी की खिलखिलाती सुबह हो। 
       पूरे एक साल की कड़ी मेहनत के बाद हमदोनो बीएचयू के लिए तैयार हो गए थे। मुझे खुद से अधिक भरोसा उसपर था। दोस्तों के आगे बढ़ जाने पर जो फिलिंग होती है वो हमारे बीच नहीं था. मै बएचयू में चयन को लेकर आश्वस्त नहीं था इसलिए दिल्ली विश्वविद्यालय में दाखिले के लिए भी आवेदन दे दिया था, ताकि अगर बीएचयू में न हो तो डीयू में हो जाय। साकेत ने डीयू नहीं भरा। वो बीएचयू को लेकर आश्वस्त था। मैने भी ये डिसाइड कर लिया था कि डीयू में हो भी जाय तो पढ़ाई साकेत के साथ बीएचयू में ही करूंगा। साकेत से अलग हटकर पढ़ाई करने की सोच से भी घबरा जाता था। वैसा दोस्त मुझे फिर पूरी जिंदगी में नहीं मिलता इतना मैं समझता था।
उस शहर में अब कोई उम्मीद नही बची थी
        29 मई को बीएचयू का एंट्रेंस था। दोनो ने एक ही सेंटर दिया था। कलकता जाने की तैयारी हमलोग कर ही रहे थे कि डाकिया एक शोक संदेश ले लाया। दिल्ली विश्वविद्यालय का एंट्रेंस 30 मई को दिल्ली में होना था। मै पूरी तरह चिढ़ गया उस दिन। 29 को कलकत्ता में परीक्षा देने के बाद 30 मई को सुबह दिल्ली में गुरू तेग बहादुर कॉलेज में दिल्ली विश्वविद्यालय का एंट्रेस देना असंभव था। लेकिन घर के माहौल को छोड़ना बेहद जरूरी था। मैंने आईआईएमसी और जेएनयू भी भर रखा था। आत्मविश्वास की कमी शुरू से रही है इसलिए अधिक से अधिक विकल्प आजमाने के पक्ष में रहा हमेशा से। 19 मई को कटिहार में जेएनयू और 21 मई को पटना में आईआईएमसी तो दे आया लेकिन बाकी दोनो विकल्प कैसे आजमाउं समझ में नहीं आ रहा था। तनाव चरम पर था । सलाह लेना मुझे दम घोंटने जैसा लगता था। जिससे पूछता कोई कहता कि हमेशा एक टारगेट रखो, कोई कहता दो नावों पे पैर रखोगे तो ऐसा ही होगा, भगवान सर ने मधुशाला की वो पंक्ति कही कि राह पकड़ तू एक चलाचल पा जाएगा मधुशाला, सब ने सलाह दिया लेकिन किसी ने रास्ता नहीं बताया। सलाह का अंचार डालूं मैं! आखिर में साकेत के साथ मंथन शुरू हुआ और निष्कर्ष निकला कि दोनो परीक्षा में शामिल होने के लिए एक ही विकल्प है और वो है हवाईयात्रा। साकेत और मैंने साथ मिलकर ऐसे ऐसे बड़े सपने देखे थे कि बोलते वक्त हम दोनो भूल गए कि हम रेल यात्रा के लिए भी घर से पैसा लेते हैं और रास्ते भर पानी खरीदकर पीने की बजाय प्लेटफॉर्म की टंकी का पानी पीते थे और वो पैसा बचा कर प्रतियोगिता दर्पण और पत्रिकाएं खरीदते थे। शायद किसी ने सही कहा है कि सपने खूब देखो तभी उसे पूरा कर पाओगे।

''मै अपने घर और उस जालिम समाज से बहुत दूर जाना चाहता था. वहां, जहां सिर्फ मैं, मेरी डाइरी और मेरा रेडियो हो, जहां कोई मुझसे ये न पूछे कि मेरा भाई कहां है, जहां कोई मुझसे ये न पूछे कि मै क्या कर रहा हूं, कोई मुझसे सहानुभूति न जताए, कोई मुझे देख न पाए, कोई नहीं हो जहां बस एक शून्य हो जिसमे मैं खो जाऊं. जहां वो गली न हो जिसमे घुसने से पहले मन में अशांति हो, जहां वो छत नही हो, जिस पर चढ़ने से पहले मुझे सोचना पड़े और जहां वैसे पडोसी न हों. मै हर कीमत चुकाने के लिए तैयार था.''


        मैं हर हाल में दिल्ली विश्वविद्यालय की परीक्षा देना चाहता था। किसी भी तरह घर से दूर जाना चाहता था क्योंकि घर में रहकर समाज से लड़ने के लिए खुद को तैयार कर पाना काफी कठिन था। 2004 से अबतक घर में कोई खुशी नही आई थी अलबत्ता मनहूस खबरों की लहरें हर महीने दो महीने बाद जरूर आती थी। पापाजी का मेजर हार्ट एटैक इस दौर की सबसे मनहूस खबर रही, दूसरे नम्बर पर भैया का एसएससी यूडीसी में साक्षात्कार के बाद चयन नहीं हो पाना। खैर, साकेत से जिद करनी शुरू कर दी कि वो भी डीयू भरे ताकि हम साथ साथ हवाई जहाज पर चढ़ें। घरवालों को अगर पता चलता कि हम लोग हवाईजहाज की यात्रा की बात कर रहे हैं तो हमें पागलखाने जरूर भिजवा दिए होते। हालांकि साकेत को डीयू भरने के लिए फोर्स करने का कोई मतलब नहीं बनता था फिर भी मैं उसे अपने साथ रखना चाहता था। अब भी याद है एडमिट कार्ड का प्रिंट आउट निकालने के बाद हम दोनों चुपचाप रात के गरीब साढ़े दस बजे एन एच 31  के पास सावित्री सिनेमाहॉल के बगल में ज्ञान गंगा  की छत पर खूब देर तक बात किए थे। सारी दुकानें बंद हो चुकी थीं और रेलवे लाइन के उस पार मेरा घर था। एकांत में हम दोनों ने खूब बातें की। बीच बीच में ट्रेन की आवाज से लगता की दुनियां जाग रही है. मैने उससे कहा कि वो हवाईजहाज के भाड़ा की फिकर न करे वो सिर्फ दिल्ली के लिए हां कर दे। मैने भी कह तो दिया था लेकिन हवाईजहाज का भाड़ा जुगाड़ कहां से होगा यह सोचकर खुद टेंशन में था। अंतिम में तय किया कि चाहे मुझे गुल्लक फोड़ना पड़े, पोस्टऑफिस में जमा एक एक पैसा निकालना पड़े, बैंक एकाउंट को खाली कराना पड़े या फिर कर्जा लेना पड़े लेकिन दोनो परीक्षा में शामिल हूंगा। उस रात मैंने आधी रात तक लैंप में डायरी लिखी थी और भगवान को जमकर गरियाया था। काफी अकेला था। एकदम अकेला। कल्पना नहीं कर सकेगा उस क्षण का कोई जब मैं डर के मारे सोते वक्त दिवाल से सट जाता था। मां और पापाजी का रोना, समाज का जुल्म, गलीवालों की फुसफुस वाली गाली सुनसुनकर टूट चुका था। जी करता था इस सबको छोड़ कर अपनी डायरी और कलम को साथ लेकर एक ऐसी जगह चला जाउं जहां हमेशा रात होती हो और दिन का नामो निशान न हो।   
किसी ने सही कहा है किसी तरह का रिस्क नहीं लेना ही सबसे बड़ा रिस्क होता है. खासकर तब जब वह आंख से आंख मिलाकर रूबरू हो. मैंने किस्मत को खुली चुनौती दे थी कि जो उखाड़ सकता है उखाड़ ले स्साले बहुत देख लिया तेरी मनमानी, मेरे नास्तिक होने की शुरुआत तभी हुई थी.
         कल भोरे भोर साकेत साईकिल से पहुंच गया। सेट प्रैक्टिस करने के बाद दोनो अपनी अपनी साइकिल से निखिल के साइबर कैफे के लिए निकल गए। मन भारी, तन बेपरवाह, अपनी धुन, बाबरा मन, एक शांति और एक अजीब अहसास, एक विश्वास। पाइडल मारते मारते मैने उससे पूछा कि केत्ते लगतई अंदाज, उसने अपने खंाटी अंदाज में कहा ''बरगाही, हम्मे छियै विजय माल्या! मन में डर और जुनून के साथ निखिल के पास पहुंचे। निखिल सिक्किम का रहनेवाला था और बेगूसराय उसका ननिहाल था। साइबर कैफे को वही देखता था। हम दोनों चुंकी कभी कभार जाते रहते थे तो हमारे बीच के रिश्ते सुनहरे हो गए थे। निखिल ने हम दोनों को देखते ही मुस्कुरा दिया और हंसते हुए पूछा भैया क्या सोचे फ्लाइट बुक कर दूं? उसे चौंकाते हुए मैंने कहा हां कर दो। उसे इस जवाब की उम्मीद नहीं थी। एकदम नहीं। उसके चेहरे का रंग बता रहा था। मैंने उसे इतना जरूर कह दिया कि सबसे सस्ता वाला टिकट बताना। निखिल ने तुरंत कहा भैया आप निश्चिंत रहिए। हम दोनो एक सिस्टम पर बैठगए। गुमशुम से। मानो कोर्ट में किसी फैसले का इंतजार कर रहे हों। थोड़ी देर बाद निखिल ने उधर से कहा कि भैया सबसे कम तीन हजार का है। मैं पांच हजार से उपर सोच कर चल रहा था लेकिन तीन हजार सुन कर थोड़ा सुकून मिला। मैने स्वाभाविक रूप से निखिल से कहा कि क्या इससे कम का कोई नहीं है। वहां जो लोग भी थे उन्हें शायद हमारे बीच चल रही बातचीत में काफी दिलचस्पी थी। खासकर हम लोग बार बार फ्लाइट कह रहे थे इससे हमारा इंप्रेशन भी बन रहा था। निखिल ने मुझे समझाते हुए कहा कि भैया फ्लाइट के भाड़ा रेल भाड़ा की तरह निश्चित नहीं होता है। यह घट बढ़ भी सकता है। मेरा विवेक कब का शुन्य हो चुका था। मैने उससे कहा कि ऐसा करते हैं कुछ दिन वेट कर लेते हैं भाड़ा कम होगा तब ले लेंगे। मैं ये भूल गया कि निखिल ने कहा था कि भाड़ा बढ़ भी सकता है। कुछ दिनों बाद निखिल ने बताया कि भैया भाड़ा बढ़कर पांच हजार हो गया है। मै मुफलिसी में था और खुद को हर तरह से मजबूत बना चुका था। फटाफट पोस्टऑफिस से सब पैसा निकाल कर टिकट का प्रिंट आउट ले लिया। घरवालों की तो दूर साकेत के अलावे हवा को भी पता नहीं था कि मैंने फ्लाइट की टिकट ली है। कलकत्ता में हम और साकेत बीएचयू की प्रवेश परीक्षा देकर एक दूसरे का बाय किए। मै सौ तरह की उम्मीदों के साथ एयरपोर्ट आया। जहां से बस ने उतारा वहां से एयरपोर्ट आने के पैसे न होने के कारण मुझे करीब दस किलोमीटर पैदल चलना पड़ा। एक बैग था जिसमें पत्रिकाएं और सेट बुक पड़ी थी। मिजाज इतना गरम था कि मैने दाढ़ी भी नहीं बनाई थी और एक गमछा ओढ़ के हवाईअड्डा में घुसा। जब मन काफी भारी हो जाता था तो मधुशाला की कुछ पंक्तियां पढ़ लेता था। स्पाइस जेट की फ्लाइट थी। पांच बजे की फ्लाइट रात में नौ बजे आई। चार घंटे भूख से मैं बिलबिलाता रहा क्योंकि वहां एक  बूंद पानी भी खरीदने के पैसे पास में नहीं थे। फ्लाइट पे चढ़ने से पहले ही एक रईस से दिखनेवाले आदमी को मैने बताया कि मैं घर में बिना बताए फ्लाइट पे चढ़ रहा हूं मेरे पास पैसे नहीं हैं आप दिल्ली उतरने के बाद मेरी मदद कर देंगे? वो सज्जन मान गए। उन्होंने कहा दिल्ली में उन्हे लेने के लिए गाड़ी आएगी जिससे वो मुझे रिंग रोड छोड़ देंगे। मैंने उनका नम्बर ले लिया। वादे के मुताबिक उन्होंने मुझे गाड़ी में रिंगरोड तक छोड़ दिया।  इस बीच उन्होंने मुझे काफी समझाया और कहा कि तुम्हें घर में बता कर फ्लाइट से आना चाहिए। उन्होंने घर के बारे में पूछा जब मैंने उन्हें बताया कि मेरा एक भाई मर्डर केस में जेल में है तो उसके बाद बेचारे ने चुप्पी साध ली और फोन पर किसी से बतियाने लगे। खैर मैंने रिंग रोड उतर के सुमित को कॉल किया कि मैं आ रहा हूं। ऑटो से उत्तम नगर पहुंचा। रोटी भूंजिया खाकर सुबह सुबह परीक्षा देने निकल गया। साकेत और सुमित को मैं कभी नहीं भूल पाउंगा।

      ''मै इतिहास को पलटना चाहता हूं फिर से, ताकि यकीन आ जाए कि वो सब सच था.''






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