Tuesday, August 23, 2011

अन्नाग्रह


                           मैं अरुंधती न होकर अन्ना क्यूं हूं!

''द हिन्दू'' में आज अरूंधती राय का एक लेख प्रकाशित हुआ है जिसमें उन्होंने भावपूर्ण तरीके से जनलोकपाल के पक्ष में चल रहे अभियान के बारे में कई बिन्दुओं को अनदेखा कर दिया है। इस लेख में मैं कोशिश कर रहा हूं कि उन्होंने जिन बिन्दुओं को उठाया है उसे मैं एक व्यापक परिप्रेक्ष्य में रख सकूं।
अरूंधती ने अपने लेख की शुरूआत इस शिकायत से की है कि इस अभियान से जुड़ी जनता वन्दे मातरम, भारत माता की जय, इंडिया इज अन्ना, अन्ना इज इंडिया, जय हिन्द सरीखे नारे लगा रही हैं। क्या लोगों को घर से बाहर आकर इंडिया हाय हाय, भारत सरकार मुर्दाबाद, पाकिस्तान जिंदाबाद सरीखे नारे लगाना चाहिए़? अरूंधती ये पसंद करती हैं?
अरूंधती झूठ बोल रही हैं कि लोग जनलोकपाल के बारे में पूछे जाने पर नारे लगाते हैं। जनलोकपाल के समर्थन में जो टीम काम कर रही है उसने बातचीत के सभी विकल्पों को खुला रखा है, और वे भ्रम की स्थिति से बचने के हर संभव उपाय कर रहे हैं। कई महीनों से खुले मंच पर लोग जनलोकपाल के बारे में अपनी सलाह दे रहे हैं और तेजी से आ रही प्रतिकियाओं को जनमत की सहमति के बाद इसमें शामिल किया गया है। अरूंधती राय इस बारे में जो कह रहीं हैं वह झूठ और भ्रम फैलाने वाला है।
यहां तक कि खुद अन्ना हजारे और उनकी टीम ने जनलोकपाल पर किसी तरह की खुली बहस का पुरजोर समर्थन किया है और इससे जुड़े किसी भी सवाल का जवाब देने के लिए हमेशा सक्रिय दिखे हैं। कल अरविंद केजरीवाल और प्रशांत भूषण ने एक टीवी चैनल पर ऐसा किया भी। कई महीनों से जनता से सीधे सवाल जवाब के कई वीडियो भी सार्वजनिक किये जा चुके हैं।

अरूंधती का झूठ
उनका दूसरा आरोप है कि जनलोकपाल का मकसद भारतीय राज्य का तख्ता पलट करना है। करीब एक साल से जनलोकपाल टीम इस ओर रूची रखने वाले सरकार के हर संस्था व व्यक्ति के साथ काम कर रही है। जनलोकपाल टीम सत्ता पक्ष के शीर्ष नेताओं, विपक्षी नेताओं, मुख्यमंत्रियों, सांसदों से मिलकर भ्रष्टाचार विराधी मजबूत कानून के बारे में सलाह ले रही है। क्या ये सब तख्ता पलट के लिए है?
टीम ने सरकार के बेहद प्रतिकूल रवैये के बावजूद अपने प्रस्ताव को एक सही प्रक्रिया के तहत सरकार के समक्ष रखा। सरकार द्वारा देश का कीमती समय की व्यर्थ बर्बादी और टालमटोल रवैये के बावजूद टीम उन्हें मनाती रही। सरकार द्वारा आरोपी पर कार्रवाई के बदले पीड़ित को परेशान किये जाने के संकेत के बाद टीम ने सरकार पर मजबूत बिल को लेकर दबाव बनाने के लिए लोकतांत्रिक तरीके से विरोध करने का निर्णय लिया। पूरा विरोध लोकतांत्रिक व अनुशासन के साथ हुआ।

अरूंधती का झूठ
उनके अनुसार अन्ना को संत के रूप में गढ़ा गया है, उनका संकेत है कि इसलिए उन्हें जनता के साथ हो रहे अन्याय पर कुछ बोलने का अधिकार नहीं है, इसका यह मतलब निकला जा सकता है कि सिर्फ धर्मयुद्ध करने वाले संतों को ही यह अधिकार है। अन्ना के बारे में अरूंधती की टिप्पणी आधारहीन है। अन्न ने 1978 में सेना से स्वैच्छिक अवकाश लिया था और तभी से सामाजिक सुधार में जुट गए थे। शराब बंदी, गरीबों के हित, बेहतर दूध की आपूर्ति, छूआछूत, सामूहिक शादी सहित कई ज्वलंत विषय पर अन्ना ने समाज को जगाया। जब 1991 में अन्ना ने भ्रष्टाचार विरोधी जन अभियान शुरू किया था तो अरूंधती कहां थीं? दरअसल तब उन्होंने अपनी पहली किताब भी नहीं लिखी थी।
अन्ना ने कई जन अभियान को नेतृत्व दिया है और समाज के हित में तिहाड़ जा चुके हैं। उनकी उपलब्धियों की लंबी लिस्ट है बजाय अरूंधती की एकमात्र उपलब्धि की जो कि विवादास्पद बयान देकर चर्चा में रहने की है। अरूंधती जैसी औरत का अन्ना के बारे में ऐसा कहना बेहद शर्मनाक है।

अरूंधती का झूठ
तिहाड़ जेल में अन्ना के साथ हुई सिलसिलेवार घटना को उन्होंने दूषित और एकपक्षीय नजरिये से सामने रखा है। वह कहती हैं कि अन्ना वहां बतौर आदरणीय अतिथि की तरह रहे। अरूंधती को अगर तिहाड़ का आदर सत्कार देखना हो तो वह सुरेश कलमाड़ी, कनिमोझी, ए राजा, मनू शर्मा, विकास यादव या फिर अफजल गुरू को देखें। अन्ना उनलोगों में से नहीं हैं।
अरूंधती को यह जान लेना चाहिए कि अन्ना हजारे को दिल्ली पुलिस ने उनके आवास से गिरफ्तार किया था उनपर किसी की हत्या का इलजाम नहीं है।
पुलिस ने अन्ना को तिहाड़ से सात दिनों की न्यायिक हिरासत में भेजा। पुलिस क्या रोकना चाहती थी? भ्रष्टाचार के खिलाफ देश के अहिंसक विरोध को? 16 अगस्त को दिल्ली और मुम्बई के करीब पंद्रह हजार लोगों को गिरफतार किया गया। लोगों ने जेपी पार्क, आजम मैदान और अन्य जगहों पर जाकर गिरफ़्तारी दी। लोगों ने न कोई बस जलाया, न शीशे तोड़े और न ही किसी के घरों में आग लगाया। छत्रसाल स्टेडियम को जेल घोषित कर दिया गया जिसकी तस्वीर यहां देखिए।
आम लोगों को गिरफ्तार कर के छत्रसाल स्टेडियम लाया गया 

सरकार को यह लग रहा था कि अन्ना के लिए कोई आगे नहीं आयगा और वह अन्ना के अभियान को वैसे ही कुचल देगी जैसे रामदेव के अभियान का दमन किया था। लेकिन सरकार गलत साबित हुई और लोग वहां डट गए। जेल के अन्दर और बाहर संगठित हुए जनमत ने अन्ना को आदरणीय अतिथि बनाने पर मजबूर किया।
अरूंधती का सवाल है कि अन्ना बाहर क्यूं नहीं आए? इसलिए नहीं आए क्योंकि उनसे कहा गया कि वह अपने घर जाएं या शहर को छोड़ दें। जब अन्ना ने बिना शर्त अनशन की मांग की तो दिल्ली पुलिस ने उसे खारिज कर दिया। अन्ना से स्पष्ट कर दिया कि उन्हें अगर रिहा किया जाता है तो वह इस जनमत का नेतृत्व करेंगे और वापस उन्हें पकड़ लिया जायगा इसलिए यह बेहतर है कि उन्हें जेल में ही रहने दिया जाय जबतक कि सरकार बिना शर्त अनशन की उनकी मांग नहीं मान लेती।
जब भी कोई बड़ा विरोध प्रदर्शन होता है तो उसकी तैयारी के लिए वक्त की जंरूरत होती है। भारी तादाद में लोगों के जुटने पर भगदड़ या अफरा तफरी न मचे और कोई अप्रिय घटना न हो इसके लिए ये तैयारी जरूरी होती है। क्या अरूंधती इस बात को समझती हैं?
अरूंधती का कहना है कि अन्ना की टीम की आगत भागत की गई और उन्हें अघोषित रूप से कुछ विशेषाधिकार मिल गए। अन्ना की टीम ने जनमत की पूरी परवाह की। जब अन्ना ने हिलने से मना कर दिया तब जाकर सरकार ने किरण वेदी और अन्य सदस्यों को बातचीत के लिए आमंत्रित किया। क्या इसकी तुलना कलमाड़ी से की जायगी जिसे जेल के वार्डन अपने साथ चाय नाश्ते पर आमंत्रित करते थे या फिर मनु शर्मा को चोरी चोरी पेरोल दिए जाने से इसकी तुलना हो सकती है? क्या अरूंधती इन लोगों के कारनामें से अनभिज्ञ है?

अरूंधती का झूठ
अरूंधती का अगला झूठ है कि दिल्ली नगर निगम ने रामलीला मैदान को व्यवस्थित करने के लिए कड़ी मेहनत की। क्या ये सही है? मैं यह शर्त लगा कर कह सकता हूं कि अरूंधती तैयारियों का जायजा लेने के लिए रामलीला मैदान गई ही नहीं। अरूंधती के लिए यहां एक तस्वीर है। क्या इसमें एमसीडी दिख रहा है? या फिर युवा दिख रहे हैं जो कि तैयारी के लिए एड़ी चोटी का पसीना बहा रहे हैं। युवकों ने इस जगह को खड़े होने लायक बनाया है।
जगह को खड़ा होने लायक बनाने के लिए युवा आगे आये न कि एमसीडी 

कारपेट बिछाती हुई एक छात्रा





अगर एमसीडी द्वारा अन्ना हजारे के अभियान के संदर्भ में सफाई कराने की बात सच भी मान ली जाय तो इसमें आपत्ति किस बात को लेकर है? एमसीडी ने जो किया वो उसका काम है। एमसीडी सभी विरोध प्रदर्शन के लिए सफाई व्यवस्था कराती है। ठीक एक महीना पहले सोनिया गांधी की एक रैली में भी एमसीडी ने व्यवस्था प्रबंधन किया था। क्या अरूंधती का यह मानना है कि एमसीडी को अपना काम नहीं करना चाहिए क्योंकि यह विरोध प्रदर्शन किसी राजनीतिक पार्टी से प्रेरित नहीं था?

अरूंधती का झूठ
 अरूंधती इस बात को लेकर चिंतित दिख रही हैं कि लोकपाल एक शक्तिशाली संस्था होगी जिसे जांच, निरीक्षण और अभियोजन का अधिकार होगा, इसके बाद अरूंधती अपनी लेखन शैली का नमूना पेश करते हुए सलाह देती हैं कि लोकपाल के पास अपना जेल न हो। अरूंधती, भारतीय कानून व्यवस्था के बारे में सवाल उठाने वालों से उस विषय में थोड़ी जानकारी रखने की उम्मीद की जाती है। पुलिस के पास जांच, निरीक्षण और अभियोजन का अधिकार है। यही काम सीबीआई भी करती है। फिर लोकपाल को लेकर ये प्रतिक्रिया क्यों? अन्ना जो एकमात्र मांग कर रहे हैं वह है कि लोकपाल भ्रष्टाचार के खिलाफ एक स्वायत्त संस्था हो जिसे किसी भ्रष्ट अफसर के खिलाफ मुकदमा चलाने से पहले किसी की अनुमति की आवश्यकता न हो। हमारी वर्तमान व्यवस्था में इस संबंध में कई गंभीर खामियां हैं। यही कारण है कि जबतक सीबीआई प्रधानमंत्री के अंदर काम कर रही थी उसने ए राजा के खिलाफ मामला दर्ज नहीं किया लेकिन ज्यों ही जांच उच्चतम न्यायालय के अधीन हुई ए राजा को जेल जाना पड़ा।

अरूंधती का झूठ
अरूंधती ने जिस बेहूदे तरीके से पाठकों के मन में जनलोकपाल को लेकर कचरा भरा है वह सचमुच विस्मयकारी है। अगर आप भारत सरकार के साथ उनकी समस्याओं को नहीं जानते हैं तो आप इसका अनुमान इस बात से लगा सकते हैं कि उन्होंने पैसे के लिए यह लेख लिखा है। वो दरअसल इसको लेकर शक  में हैं कि ‘‘लोकपाल प्रतिनिधि‘‘ कहीं उसी भूमिका में न हो जिस भूमिका में फेरीवाले के लिए स्थानीय कांस्टेबल होता है जो कुछ पैसे ले कर कानून तोड़ने में मदद करता है।
लोकपाल प्रतिनिधि? अगर वह अपने इस विचार को लाल किला पर भी टांग देंगी तो भी यह सच नहीं होगा। लोकपाल कोई कोतवाली व्यवस्था नहीं है। वह फेरीवाले से हफ्ता नहीं वसूल सकता।
जब किसी मकान मालिक से उसकी जमीन एक मॉल बनाने के नाम पर छीन ली जाती है, या किसी गरीब को घरबदर कर दिया जाता है, या एमसीडी या पुलिस कांस्टेबल किसी सरकारी एजेंसी से मिलकर आम लोगों से रिश्वत लेता है, तो यह करप्शन है। लोकपाल इसके निदान के लिए बनने वाली संस्था होगी।
जनलोकपाल के प्रावधानों के अनुसार एक नागरिक किसी अधिकारी की शिकायत कर सकता है, और इसकी जांच लोकपाल करेगा। अगर शिकायत सही निकलती है तो कार्रवाई की जायगी। लोकपाल हफ्ता वसूलने नहीं जा रहा है। अरूंधती कल्पना कर रही हैं जिसमें तथ्य नहीं है।

अरूंधती का झूठ
वह कहती हैं कि यह अभियान आरक्षण विरोधी और अंधराष्ट्रवाद से प्रेरित है। यह दरअसल दलितों को भ्रष्टाचार विरोधी अभियान से तोड़ने का प्रयास है। भ्रष्टाचार से सबसे अधिक प्रभावित नीचले तबके के लोग हैं जिसमें दलित अधिक संख्या में हैं। धनी और प्रभावशाली पदों पर उंची जातियां हैं जो कि धन बल के सहारे शीर्ष पर बनी हुई है।
दलित के पास संसाधनों की कमी है, भ्रष्टाचार विरोधी अभियान का सबसे अधिक लाभ दलितों को मिलने जा रहा है। आरक्षण विरोधी अभियान की तुलना अन्ना के अभियान से करना कहीं से भी तर्कसंगत नहीं है। अन्ना के अभियान में न तो स्कूलें या कॉलेज बन्द हुए, न ही आगजनी या आत्मदाह की कोई घटना हुई, न कोई सरकारी संसाधनों को कोई नुकसान पहुंचाया गया। अन्ना का अभियान एक अनुशासित और शांतिपूर्ण तरीके से चल रहा है।






2 comments:

  1. योगेश,अच्छा है तुम्हारी यह टिप्पणी.पर मैं चाहूँगा कि तुम भी टेबल रिपोर्टिग न कर वहाँ अपने कैमरे के साथ जाकर लोगों से बात कर लिखो तो फिर बात बने.

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  2. सर मै अन्ना के आन्दोलन में मीडिया को लेकर कुछ शोध कर रहा हूं, अपडेट हूं.

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