Friday, August 26, 2011


                                     मीडिया पाला बदले तो चौकिंयेगा नहीं
           
             ''अफरा तफरी का माहौल बनाना कॉरपोरेट मीडिया का अघोषित चरित्र रहा है''

भारतीय मीडिया के लिए ये धर्मसंकट का दौर है 

      भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रहे अभियान में हुल्लड़वाजी और हुड़दंग और तमाम कुव्यवस्था की खबरें आने वाले दिनों में मुख्यधारा की मीडिया में छा जाय तो इसमें चौंकिये बिल्कुल नहीं क्योंकि यह मीडिया की स्वाभाविक प्रतिक्रिया है। याद कीजिए पिछले दिनों जब वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट को लागू करने के लिए केन्द्र सरकार पर दवाब बनना शुरू हुआ था तो मीडिया के 'क्रीमी लेयर' आईएनएस और उसके शुभचिंतकों ने इसके खिलाफ अफरा तफरी का माहौल बना दिया था। कहा यहां तक गया कि अगर यह एक्ट लागू हो जाता है तो अखवार छपने बंद हो जाएंगे। दरअसल सामाजिक न्याय के लिए लड़ रहे कई संगठनों ने मीडिया को भी लोकपाल के दायरे में लाने की मांग को तूल देना शुरू कर दिया है। पूरी बहस सोशल मीडिया में परवान चढ़ रही है और मायावती द्वारा जनलोकपाल पर पाला बदलकर मुखर विरोध को इसी से जोड़ कर देखा जा रहा है। पिछले दिनों नोएडा में हुए किसान आंदोलन और मीडिया के राहुल प्रेम से सबक लेकर ही मायावती का यह बयान आया है। गौरतलब है एक तरफ जहां यूपी में जंगलराज बताने वाली खबरें मीडिया में आश्चर्यजनक रूप से घट गई हैं वहीं पांच से दस मिनट का यूपी का महिमामंडन करता विज्ञापन करीब करीब हर चैनल में देखा जा रहा है। ये विज्ञापन का चमत्कार है और मीडिया की जरूरत। मायावती आई बी एन के एक पत्रकार शलभ मणि त्रिपाठी को अन्दर भी करवा चुकी हैं.
अन्ना की छाया में रहना मीडिया की मज़बूरी है
इसी तरह याद कीजिए उस रैली को जो दिल्ली में आज से दो साल पहले हुई थी। 19 नवंबर, 2009 को राजधानी दिल्ली में गन्ना किसानों ने एक बड़ी रैली की। किसान गन्ने की ज्यादा कीमत मांग रहे थे और उनका आरोप था कि केन्द्र सरकार ने कीमत का जो फॉर्मूला बनाया है, उसकी वजह से उन्हें पिछले साल से भी कम कीमत मिलेगी, जबकि 2009 में चीनी की कीमत पिछले साल से लगभग दो गुनी हुई है। अगले दिन यानि 20 नवंबर, 2009 को दिल्ली से प्रकाशित होने वाले अंग्रेजी के अखवारों में इस रैली का कवरेज देखकर एक आम पाठक के मन में यह डर पैदा होना तय था कि दिल्ली की कानून व यातायात व्यवस्था पर खतरा मंडरा रहा है। किसानों की मांग सामने रखने के बजाय मीडिया ने अफरा तफरी का माहौल बना दिया। मानो कर्फ्यू लगाने की नौबत आ गई हो. आरक्षण के समर्थन में भी हो रहे प्रदर्शन पर मीडिया का यही रुख रहा है. इसी तरह मजदूर यूनियन के लोगों ने जब भारी संख्या में अपने हक को लेकर दिल्ली सहित देशभर में प्रदर्शन किया तो मीडिया चुप रहा। ऐसे में कथित सिविल सोसायटी के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान में मीडिया का ओवरटाइम इतना स्पष्ट कर देता है कि दाल में कुछ काला है।
भारतीय मीडिया का खुला विरोध हो चुका है
        इसे बेहतर समझने के लिए मीडिया की रिपोर्टिंग को बारीक से देखना होगा। मीडिया में कोई नेता शायद ही दिख रहा है। प्रिंट मीडिया अन्नामय हो जाने के बावजूद जनसत्ता सरीखे खांटी जमीन से जुड़े दिखने वाले  अखवार लोकपाल की गुणवत्ता पर बहस कर रहे हैं। लेकिन ज्यादातर अखवार लोकपाल पर बहस न करके इसमें अधिक रूची ले रहे हैं कि किस ओर से क्या बयान आए। पिछले दिनों मुलायम सिंह का बयान आया कि मीडिया को भी लोकपाल के दायरे में रखना चाहिए। ये बयान गुम हो गया। एनजीओ को लोकपाल के दायरे में लाने की मांग भी खबर नहीं बन सकी। हालांकि कुछ दलित संगठनों द्वारा अन्ना के तरीके के विरोध का मीडिया ने दमन जरूर कर दिया। अलबत्ता एक अंग्रेजी अखवार ने अन्ना विरोधियों की एक चोर छवि बनानी चाही। किसी के  हवाले से कैसे कुछ कहलवाया जाय ये किस पत्रकार को नही आता! एक कॉलम में उसने प्रकाशित किया कि अन्ना के विरोधी बिके हुए हैं। गौरतलब है कि अन्ना ने पिछली बार जब जंतर मंतर में अनशन खत्म किया था तो इंडिया गेट पर विजयी की खुशी मनाने आए लोगों ने एनडीटीवी की ग्रुप एडीटर को वहां से खदेड़ कर भगा दिया था। उनपर मंत्रियों के चयन के लिए दलाली करने का आरोप था और तथ्य के रूप में कई प्रमाण लोगों तक पहुंच चुके थे। यह घटना मुख्यधारा की मीडिया में नहीं आई। हालांकि एक अखवार ने इसे बचते बचाते पहले पेज पर छाप ही दिया. सोशल मीडिया में यह घटना खूब दूर तक गई और अंत में एक अंग्रेजी अखवार ने अपने कार्टून स्पेस में इस ओर सबका ध्यान खींचा। इसके कुछ दिनों बाद ही एक साप्ताहिक अंग्रेजी अखवार में यह खबर छपी। इस घटना के बाद यह साफ हो गया कि मीडिया भ्रष्टाचार के खिलाफ लोगों के आक्रोश को दिखाने से ज्यादा रूची कहीं और ही ले रहा है। क्योंकि अगर मीडिया सचमुच भ्रष्टाचार को लेकर इतना गंभीर होता तो उसकी रिपोर्टिंग संतुलित होती।
इण्डिया गेट पर बरखा दत्त को लोगों ने खदेड़ कर भगा दिया था  
विकीलिक्स के खुलासे और देश की दो शीर्ष कॉरपोरेट घरानों की लॉबिंग कर रही नीरा राडिया के टेप सार्वजनिक होने से जितने खुलासे हुए उस आधार पर यह कहा जा सकता है कि निजी क्षेत्र भ्रष्टाचार में आकंठ डूबा हुआ है और सरकार पर इसका पूरी तरह नियंत्रण है। चाहे केजी बेसीन का मामला हो या रिटेल सेक्टर में विदेशी पूंजी के प्रवेश को अनुमति देने का फैसला ये साफ हो चुका है कि निजी क्षेत्र ही अप्रत्यक्ष रूप से सरकार की नीतियां बनाता है। ऐसे में निजी क्षेत्र को लोकपाल के दायरे में क्यों न लाया जाय? मीडिया में यह सवाल कहीं नहीं है और जो यह उम्मीद पाले हैं कि मीडिया ये ज्वलंत सवाल उठाएगा वो नादान हैं। मीडिया पर लोकपाल के दायरे में आने के बढ़ते दवाब के कारण मीडिया की असहजता अब साफ दिखने लगी है। मीडिया अब अगर यूपी में अपनी रिपोर्टिंग की तर्ज पर सीधा हां को न बोल दे तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं होगा।

[मीडिया का सही चरित्र जानने के लिए इस लिंक को देखें





http://vicharamanthan.wordpress.com/2011/04/13/barkha-public-aint-bakras/ ]

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