Monday, August 8, 2011


                            आई आई एम सी में धांधली की खबर झूठी: जांच रिपोर्ट 


भारतीय जनसंचार संस्थान के सत्र  2011 -12 में दाखिले में कथित गड़बड़ी की पहली खबर फेसबुक पर आईआईएमसियन कम्युनिटी पे आई, कम्युनिटी पे जामिया के एक पूर्व छात्र ने एक क्रमांक का हवाला देते हुए सवाल उठाया कि इस छात्र का नामांकन आर टी आई डालने के बाद हुआ है. मामले पर तेजी से प्रतिक्रियाएं आनी शुरू हुईं जिसने कुछ हद तक आई आई एम सी को दाखिलों में संदेह के आरोपों से घेर लिया. इसी बीच मैंने बहस में हिस्सेदारी करते हुए कहा कि आई आई एम सी में हिंदी पत्रकारिता के पाठ्यक्रम निदेशक डॉ आनंद प्रधान ने मुझ पर एक कक्षा के दौरान मेरा दाखिला पैरवी से होने की बात कही है. मेरी प्रतिक्रिया ने आग में घी डाला और मामल इतना गर्म हुआ कि ठीक अगले दिन एक राष्ट्रीय हिंदी दैनिक में ये खबर प्रकाशित हुई. आग की लपटों ने तब और जोर पकड़ा जब सत्र २०१०-११ के मेरे एक सहपाठी नीरज पटेल ने आर टी आई का हवाला देकर आरक्षित सीटों पर होने वाले दाखिले पर सवाल उठाए. मैंने फेसबुक के उस पेज को सेव करके अपने स्टेटस पे साझा किया, जिसके बाद कुछ न्यूज साईट पे ये खबरें एक एक कर प्रकाशित हुई. इसके तुरंत बाद कई पत्रकारों के फोन कॉल्स और मेल मुझे आये जिन्होंने पूरे मामले पर मेरी प्रतिक्रिया जाननी चाही. मै टाल गया, जिसका एक बड़ा कारण यह भी था कि संस्थान की ओर से कोई औपचारिक बयान इस पूरे मामले पर जारी नहीं किया गया था. मामले पर संस्थान की चुप्पी और शिक्षकों पर लगने वाले आरोपों का रोज नए शक्ल के साथ सामने आने की घटना ने मुझे हिलाकर रख दिया और मैंने खुद पूरे मामले की गोपनीय जांच करने का निर्णय लिया. जांच के दौरान मैंने पाया कि,
क) आई आई एम सी में बिल्डिंग निर्माण के काम में वहां केबल और कंप्यूटर ठीक तरह से व्यवस्थित नहीं हैं. इस अव्यवस्था के कारण जिस छात्र के दाखिले को लेकर सवाल उठाये गए, उस छात्र के क्रमांक को कंप्यूटर पर सूचीबद्ध करने में मानवीय भूल हुई. ये भी पता चला है कि आर टी आई आने से पहले ही उक्त छात्र को दाखिले के लिए भेजा जाने वाला आमंत्रण तैयार किया जा चुका था.
ख) फेसबुक पर एक मित्र की दी गई ये जानकारी कि एक शिकायतकर्ता को प्रधान सर ने बुलाया है, में कोई सच्चाई नहीं थी, सच ये था की खुद उक्त शिकायतकर्ता ने प्रधान सर को मेल करके मिलने की इच्छा जताई थी, जिसपर सर ने सहमति दी थी.गौरतलब है कि उसी ने इस कथित धांधली की खबर को वेब मीडिया में उठाया था, जानकरी ये भी मिली है कि उनका दाखिला संस्थान में नही हो पाया था. इसके पीछे उनका क्या उद्देश्य था, ये मै नही जानता,
ग) कक्षा में जो बातें प्रधान सर ने योगेश को कही थी वो ये थी कि उसने यहां आने से पहले पैरवी कराई थी, जबकि जो मामला प्रकाश में आया उसके अनुसार प्रधान सर ने कहा था कि तुम्हारा एड्मिसन यहां पैरवी से हुआ है. दरअसल दोनों दो बातें हैं, लेकिन एक जैसी दिखने के कारण भ्रम की स्थिति बनी. योगेश का दाखिला पिछली बार साक्षात्कार में नही हो पाया यह अपने आप में दाखिले में पारदर्शिता को सिद्ध करता है.
घ) जांच के दौरान ये भी पता चला है कि आई आई एम सी के पूर्व निदेशक के बेटी सहित कई शिक्षकों के रिश्तेदारों का यहां दाखिला कम अंकों के कारण नही हो पाया है, ये आई आई एम सी में दाखिला प्रक्रिया की पारदर्शिता को साबित करता है.

                                                   जांच से जुड़े कुछ और पहलू व स्पष्टीकरण जल्द ही सार्वजनिक किये जायेंगे.

नोट: जांच सच जानने के लिए किया गया है, और जांच में कोई त्रुटी पाए जाने पर योगेश कुमार शीतल इसके जवाबदेह होंगे, जांच के सम्बन्ध में किसी तरह की जानकारी उनसे ली जा सकती है. जांच के दौरान सभी मददगार और सूत्रों के नाम गोपनीय रखे गए हैं.

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