Wednesday, July 27, 2011



एक संकटमोचन जिसका मै आभारी हूं

        रघुनाथ सर से उम्मीद बची थी कुल मिलाकर। मीडिया घरानों के खिलाफ पहले ही हल्ला बोल चुका था और भारतीय जनसंचार संस्थान के एचओडी से वैचारिक मतभेद कक्षा के दिनों में ही परवान चढ़ गये थे। दिल्ली में कोई जान पहचान भी नहीं थी और मीडिया के अलावे कोई कैरिअर ऑप्शन भी न था। लॉ करना चाहता था लेकिन ऐसा संभव नहीं था। जवाबदेही रोजाना बढ़ रही थी ऐसे में तीन साल और दिल्ली या बनारस में बिना कमाई के रहना आत्मसम्मान का गला घोंटने जैसा था।
        रघुनाथ सर से जान पहचान बरखा प्रकरण के बाद भड़ास फॉर मीडिया के संपादक यशवंत जी के मार्फत हुई और ट्वीटर का अ ब स उन्हीं ने सिखाया। बरखा प्रकरण के बाद जब जॉब नही मिल रही थी तो जिन लोगों से मैने संपर्क स्थापित करने शुरू किए उनमें तहलका के एक पूर्व पत्रकार , अतहर हुसैन और एस रघुनाथ सबसे प्रमुख थे। तहलका के पत्रकार से पहली मुलाकात जेएनयू के गंगा ढ़ावा में हुई थी। उन्होंने मीडिया में भ्रष्टाचार विषय पर बहुत आकर्षक भाषण दिया था जिसे हमलोगों ने रात करीब बारह बजे तक सुना था। जिस मुलाकात में मैने उनसे जॉब दिलवाने में मदद की बात की थी वो गांधी शांति प्रतिष्ठान में पीयूसीएल की थी। मीटिंग में विनायक सेन भी आए हुए थे। राज्यसभा चैनल के एक पत्रकार  ने मुझे उनसे मिलवाया था और फिर हमलोग कुछ अन्य जगहों पर गए थे। कुछ दिनों बाद तहलका के पत्रकार से उनके आवास पर मुलाकात हुई। वहीं अमेरिका से लौटी एक और पत्रकार से भी भेंट हुई जो मेरे बारे मे जानती थी। उन्होंने  बिजनेस भास्कर के विशेष संवाददाता से बात की और मुझे उनसे मिलने को कहा। बिना देर किए मै ग्रेटर कैलाश से झंडेवालान स्थित बिजनेस भास्कर के ऑफिस में पहुंचा। जाते वक्त तहलका के पत्रकार ने सौ रूपये भी दिए। पैसे की जरूरत होने के कारण मैने ले लिया। मुलाकात ठीक ठाक रही और उन्होंने सीवी मेल करने कहा। उसी शाम मैने सीवी मेल कर दिए। दो तीन सप्ताह तक आज कल करते हुए आखिरकार उन्होंने हाथ खड़े कर दिए। मै पहले से ही उदास था इसलिए उनके जवाब का कुछ खास असर नहीं हुआ हालांकि उन्होंने आश्वासन और संात्वना भी फोन पर दे दी और लगे हाथ यह मजबूरी भी बता दी कि उन्होंने जिनसे मेरे बारे में बात की उन्हें अनुभवी आदमी चाहिए।

         अतहर सर से भी कई बार सतही बातें हुई इस दौर में। लेकिन उनके व्यवहार से यह लग रहा था कि वह चाह कर भी कुछ नहीं कर पा रहे हैं। मुस्लिम होने के कारण मेरी अतिरिक्त सहानुभूति उनकी ओर थी। उन्होंने क्वार्क एक्सप्रेस घर पर बैठा कर सिखाया और हर मदद के लिए तत्पर दिखे। बिहारी होने के कारण एक विशेष जुड़ाव हमारे उनके बीच हो गया था। लेकिन जॉब नहीं मिली फिर भी।

रघुनाथ सर शायद आरएसएस से जुड़े थे। ऐसा मुझे इसलिए लग रहा था कि ट्वीटर पर उनके अधिकतर ट्वीट्स पर प्रतिक्रिया आरएसएस से प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर जुड़े लोगों की आती थी। साथ ही कई बार ‘‘जय श्री राम‘‘ जैसे ट्वीट मुझे नियमित आने लगे। हालांकि मैने कभी इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी लेकिन ट्वीटर पर मेरे नब्बे फीसदी अनुसरणकर्ता आरएसएस के घोषित स्वयंसेवक थे। अमेरिका से मुझे अनुसरण कर रहे एक फोलोअर ने मुझसे सीधे कहा था कि वह मेरी मदद इसलिए कर रहे है क्योंकि मैं दक्षिणपंथी हूं। मै कुछ बोलने की स्थिति में नहीं था। हालांकि एनडीटीवी और आरएसएस के रिश्ते के बारे में मैने जब जानकारी जुटानी शुरू कि तो काफी दिलचस्प जानकारियां मिली मसलन एनडीटीवी अकेला ऐसा चैनल है जो पाकिस्तान में दिखाया जाता है और भी बहुत कुछ जो आरएसएस या हिंदुत्ववादी संगठनों को ये पर्याप्त कारण देता है कि वे एनडीटीवी के प्रति जहरीला विचार रखें। यद्यपि रघुनाथ सर के व्यवहार से मैं कभी असहज नहीं हुआ और उनमें एक अभिभावक को देखने लगा, मै उनसे सहमा रहता था। वो मेरे लिए उम्मीद की आखरी किरण तो थे ही साथ ही उनमें एक अभिभावक की शक्ल दिख रही थी मुझे। कभी डांटना कभी मजाक करने की उनकी शैली ने मुझमें और उनमें एक मजबूत रिश्ता बना दिया था।
अगर आज मेरा ट्वीटर पे एकाउंट है और तीन सौ से ज्यादा लोग मुझे नियमित अनुसरण कर रहे हैं तो इसके पीछे रघुनाथ सर का आशीर्वाद है. हालांकि उन्होंने कभी इसका एहसास होने नही दिया है
इसी दौरान एक दिन रघुनाथ सर ने नोएडा में एक जगह मिलने के लिए बुलाया। उसी दिन एक हिंदी दैनिक के मालिक से मेरी मुलाकात उन्होंने कराई और 7000 पर मेरी नौकरी लग गई। रघुनाथ सर ने इसके अलावे भी मुझे कुछ पैसे देने की पेशकश की और हाथ पिछली जेब में डालने वाले ही थे कि मैने विनम्रता से उन्हें ऐसा करने से रोक दिया। अब मुझे पहली सेलरी मिल गई है और रघुनाथ सर से टच में हूं। बेशक रघुनाथ सर ने अगर साथ न दिया होता तो मै कहीं का न रहता। मै आजीवन उनका आभारी रहूंगा। एक और  बात रघुनाथ सर को मेरी गर्लफ्रैंड के बारे में फेसबुक के माध्यम से पता चल गया है और हां उन्होंने मुझे एक दिन अपने घर पर बहुत स्वादिष्ट व्यंजन खिलाया जो उनकी पत्नि ने बनाया था। एक अंतिम बात कि वो मुझे बहुत मानते हैं।
उनकी उंगली पकड़ कर चल रहा हूं बाद में अगर उनके एहसानों को भूल न जाउं इसलिए ये सब अपने ब्लॉग पर लिख रहा हूं। संभव है कि कल उनसे मेरा रिश्ता आज जैसा नहीं रहे।

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