Wednesday, July 27, 2011

ब्रेक के बाद


एक मूर्ति जो बिना आवाज किए टूट गई


काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से विधि की पढ़ाई कर रहे एक मित्र की सलाह पर यह पोस्ट कानूनी दृष्टिकोण से किए गए संपादन के बाद आपके सामने है। आप इस पर प्रतिक्रिया या शिकायतें दर्ज कराने के लिए स्वतंत्र हैं। अगर आपके साथ ऐसी कोई घटना हुई है या आप भी लंबे समय से किसी मिसअंडरस्टैंडिंग या किसी के नितांत व्यक्तिगत लालच के कारण मोहरे बना दिए गए हों और मानसिक प्रताड़ना से ग्रसित हों तो मै आपसे सहानुभूति रखते हुए आग्रह करता हूं कि अपने मददगारों की सूची में मुझे भी शामिल करें। मत भूलिए कि राजा को नंगा कहने के लिए बच्चे जैसा निश्छल होना जरूरी है। 
झारखंड के एक साथी ने संपादित होने से पहले इस लेख में उपयोग में लाए गए कच्चे माल को पढ़ा तो मुझे रात फोन करके अपनी पूरी आपबीती सुनाई। उसकी कहानी हालांकि इससे मेल नहीं खाती थी लेकिन पता नहीं उसने मुझे ही क्यों सुनाया! जयपुर में राजस्थान पत्रिका से जुड़े एक मित्र भी इस लेख से काफी उत्साहित थे। हद तो तब हो गई जब नागपुर की एक महिला मित्र और मुम्बई में बैंक अधिकारी के पद पर कार्यरत बिहार की ही एक और महिला मित्र ने मुझसे इस टिप्पणी को लेकर कई सवाल दाग दिए। उसके कुछ सवाल असहज करने वाले थे लेकिन तथ्यों के बल पर मैने उन्हें जब प्रमाण के रूप में कुछ दस्तावेज और तकनीकी सामग्री मेल की तब जाकर उन्हें लगा कि किस तरह अकेला चना भार नहीं फोड़ता के जमाने में अकेली मछली पूरे तालाब को गंदा करती है। खैर पाठकों की मांग पर मै ये सामग्री प्रकाशित कर रहा हूं।

‘‘सबसे खतरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना‘‘
-पाश

एक नई कहावत है कि अगर आप बलात्कार को रोक नहीं सकते तो उसका मजा लेना शुरू कर दीजिए। वह बलात्कार नहीं था लेकिन था कुछ वैसा ही जो सरेआम हुआ था। मुहल्ले वालों के बीच, एकतरफा और कुछ अर्थों में सामूहिक और सुनियोजित। उसकी नींव ठोक बजा कर रखी गई थी। कानाफूसी अभियान को चरम पर पहुंचा दिया गया था। आज के शब्दों में कहें तो ‘‘ऑनर कीलिंग‘‘। एक इज्जतदार इलीट के घर की बड़ी बेटी की गलतियों को छुपाने के लिए एक परिवार के द्वारा दूसरे परिवार पर की गई यह एक नृशंस कार्रवाई थी। 
  ‘‘रेशमा(काल्पनिक नाम) भाग गई‘‘ उधर से अभिनव(काल्पनिक नाम)  लाइन पर था। मुझे एक पल के लिए लगा कि लंबे समय से लंबित किसी मुकदमे की सुनवाई मेरे पक्ष में हो गई है। बहार सी आ गई। इस एक पल के सुकून के अंदर मुकदमे के दौरान बिताए गए मातम से कई साल और डरावनी रातें ढ़क गयी। वो रातें भी जब मैने कोई उम्मीदें न देखकर सिरहाने में एयर गन रखना शुरू किया था। एक रात मां ने कहा कि दरवाजे पर कोई है। मुझे अब भी ठीक ठीक याद है कि मेरे उकसाने पर दरवाजे पर जमे कुछ लोगों ने खिसकना शुरू किया था तो मैने उनपर दबाव बनाने के लिए हवाई फाइरिंग की थी जिसमें एक बिल्ली मारी गई थी। डर अंदर तक समाया था। मैने तपाक से कहा ‘‘खबर पक्की हुई तो सायोनारा में ऐसी पार्टी दूंगा जैसी तुमने सोची भी न होगी, लेकिन झूठ हुई तो कभी बात नहीं करूंगा‘‘। अभिनव का घर मेरी गली में है। उसकी भूमिका गली में दलित जैसी थी एक वक्त। आटा, सैम्पू या रिक्शा लाना हो गली का वो इलीट वर्ग सीधे अभिनव या उसके परिवार में ही किसी कोे आदेश देता था। हालांकि गली में उसके अलावे और भी लड़के थे उस उम्र के। अलबत्ता अभिनव के घर के अंदरूनी मामलों में इस इलीट वर्ग की इतनी रूची होती थी कि उसके घर जाकर समझा बुझा देता था। एक अघोषित अभिभावक बनकर अभिनव के घर को एक उपनिवेश की तरह पाला पोसा गया। लेकिन समय ने कुछ यूं पलटा मारा कि उसी इलीट परिवार की एक जवान बेटी को इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बाद जॉब के लिए उसी अभिनव से संपर्क करना पड़ा। यहां तक कि इसके पूर्व प्रकाशित टिप्पणी को वापस लेने का मुझपर दबाव बनाने के लिए भी उसे अभिनव और उसके भाईयों के ही हाथ पांव पड़ने परे। अच्छा लगा यह सब जानकर कि अभिनव और उसके परिवार के सामने गली के इलीट लोग दंडवत कर रहे हैं।  
  अभिनव ने पूरी जानकारी दी कि रेशमा कैसे भागी, किसके साथ भागी और मास्टरमाइंड कौन है। फोन रखने के बाद मैने उस इलीट घर के एक विभीषण को फोन किया तो उसने खबर पर मुहर लगा दी। आनन फानन में रेशमा जिसके साथ भागी उसकी कुंडली खंगालने के लिए मैने कुछ लोगों को लगाया तो लड़के की पारिवारिक पृष्ठभूमि वगैरह भी पता चल गई। कुछ और भी बातें पता चलीं जिसका जिक्र खुलासा किसी और मौके पर किया जाएगा। हालांकि मैने अपने स्तर से अभी इसमें कुछ खास नहीं किया इसलिए खबर की प्रमाणिकता पर संदेह बना है। किसी पर विश्वास करने का जमाना नहीं रहा। रेशमा के परिवार वालों ने जब से गली में अभिनव के परिवार के खिलाफ माहौल बनाया था तभी से मै व्यक्तिगत रूप से उस परिवार के दूषित विचारों से चिढ़ा हुआ था। अभिनव के परिवार का अंदरूनी ढ़ांचा जो हो लेकिन यह सौ फीसदी सच है कि गली में अगर किसी के परिवार के लिए कोई संकटमोचन की तरह हमेशा खड़ा रहता था तो वो अभिनव का परिवार था। मेरे घर के उपर उसके परिवार का इतना एहसान है कि मै लिखना चाहूं तो शुरूआत कहां से करना है यही सोेचता रह जाउंगा। 
रेशमा के पिता उतने होशियार नहीं थे जितना समझदार। ये असंतुलन उन्हें आज न कल भारी पड़ना ही था। रेशमा जब दिल्ली में पढ़ाई कर रही थी तो मैं जे एन यू कैम्पस में था। उसके हॉस्टल के वार्डन और कुछ दोस्तों से मुझे उसकी गतिविधियों की जानकारी मिलती रहती थी। अब भी वो मेरे टच में हैं। अलग बात है कि उसकी गतिविधियों को जानने के लिए मैने जितने लोग उसके अगल बगल लगाए थे उन्हें उसकी कीमत देने के चक्कर में मै गरीब हो गया लेकिन पत्रकारिता में हमें सबसे पहले सूत्रों की विश्वसनीयता की कीमत ही बताई जाती है। वार्डन, सुरक्षा गार्ड और उसके दोस्तों की दी गई जानकारी को मै अन्य माध्यमों से पुष्ट करा लेता था लेकिन किसी के साथ साझा नहीं करता था। क्योंकि इसकी कोई जरूरत नहीं थी। वो भागेगी और मामला घरवाले ही दबाएंगे ये मुझे पता था। लेकिन किसी को बताने का कोई फायदा नहीं था। सब मिले थे। वैसे भी आज न कल परदा उठना ही था।
अब सबसे बड़ा सवाल कि मै रेशमा की गतिविधियों में इतनी रूची क्यों ले रहा था। क्या ये मेरा व्यक्तिगत स्वार्थ था या फिर किसी दुराग्रह से ग्रसित होकर मै यह अनैतिक काम कर रहा था? इसका जवाब मैं सपाट रूप में नहीं दे सकता क्योंकि अगर मै इसे फास्टफूड की शैली में दूं तो अनपच होने का खतरा अधिक है। सार यही है कि रेशमा के चरित्र का प्रमाणपत्र बनवाने के लिए उसके परिवार ने जो जो कदम उठाए उन कदमों से कुछ परिवार कुचलते चले गए। जिसका एहसास रेशमा के परिवार वालों को कभी नहीं हुआ। अलबत्ता जब खुद रेशमा की मां ने दिनदहाड़े यह बयान जारी किया कि उसके पिता वैसे लड़के से उसकी शादी कराने में असक्षम थे जिससे रेशमा ने भागकर शादी की तो एक बदबू सी आई। यह लेख उस बदबू को न झेल पाने के कारण की गई उल्टी है। 
रेशमा के भाग जाने से समाज के एक खास बहुमत ने मेरे परिवार के साथ जो अन्याय किया था उसका पटाक्षेप हो गया। साथ ही तथाकथित आदर्श समाज ने मेरी गली के जिन युवकों को ‘‘असामाजिक, आवारा, लोफर‘‘ के आरोप में अभियुक्त बनाया था, रेशमा के वास्तविक चरित्र के सार्वजनिक होते ही वे सब लड़के समाज के उन आरोंपों से बाइज्जत बरी हो गए। सब लड़कों की बमबम हो गई। अलग बात है कि इस लंबे समय तक उन्होंने जो खोया उस पर अंतिम फैसला आना अब भी बाकी है। कुल मिलाकर कहें तो पिक्चर अभी बाकी है। कम से कम तब तक जबतक कि अभिनव की अगली पीढ़ी रेशमा के बेटे से उसी गली में उसी नुक्कड़ पर वही सब काम करने को न कहे जो उस परिवार ने अभिनव से कहा था।
रेशमा के घर का नाम रीमा(काल्पनिक नाम) था। नुक्कड़ पर जब वो साइकिल से गुजरती थी तो लड़के चुटकियां लेते थे। मुहल्ले के कुछ लड़के जो उसके साथ ट्यूशन पढ़ते थे उन्होंने उसका नाम ‘‘आर‘‘ रखा था। आर यानी रीमा। रीमा अपने घर में सबसे बड़ी थी और उससे छोटा और इकलौता भाई पिंटु उर्फ महेश(काल्पनिक नाम) एक मेधावी छात्र था। खुशी उर्फ अमृता(काल्पनिक नाम) पिंटु से बड़ी थी और रीमा से कई मामलों में अनुशासित और समझदार। मेरे घर और रीमा के घर के बीच कोई दीवार तक नहीं थी। मुझे अब भी याद है कि बचपन में मैं और पिंटु अंग्रजी में अंतराक्षी खेला करते थे। कभी मै उसके घर जाता था तो कभी वो हमारे घर आ जाता था। हम दोनो परिवारों के बीच इतना जुड़ाव था कि गली के बाकी लोग अपनी जगह हमारे बीच तलाशने में जुटे रहते थे। हम दोनो के पिता सरकारी नौकरी में थे और दोनो परिवार का माहौल बिल्कुल शांत और शैक्षणिक था। 
रीमा को अपने बारे में कुछ गलत फहमी थी जो अक्सर किशोर अवस्था में होती है। ये सच था कि मुहल्ले के कुछ लड़के इश्कवाजी के कारण लड़कियों का जीना हराम कर रखे थे लेकिन गांवो और उनसे सटे शहरों का मध्यवर्ग अब भी पूरी तरह से बेशर्म नहीं हुआ है और समाज को बहुत हद तक वैचारिक प्रदूषण से बचाए हुए है। माहौल और लड़कों की नजरों ने रीमा के मन में ये बातें बैठा दी थी कि वो आम लड़की नहीं है। मेरा अपना अनुभव कहता है कि जब तक किसी को खुद की कीमत पता न हो उसे कोई अपने सम्मोहन में नहीं ला सकता है लेकिन जब किसी को अपनी कीमत और हैसियत का अंदाजा हो जाए तो उसके बाद का सफर तलवार की धार पर चलने जैसा होता है। 
चिंकुु हर परीक्षा में अव्वल आता था और इसी बहाने मुझे भी मिठाई नसीब हो जाती थी। अच्छे थे वो दिन जब वह दरवाजे पर दस्तक देता था और खोलने पर मम्मी से कहता कि अंटी मै फर्स्ट किया हूं और फिर मिठाई थमा जाता। बेगूसराय जैसे शहर में आज से दस साल पहले ये परंपरा सी थी कि किसी का परीक्षा परिणाम आए तो वह उसे अरोस पड़ोस को भी बताता था। हालांकि इसके पीछे परिवार की प्रतिष्ठा और दिखावापन भी जुड़ा होता था। मेरे या मेरे भैया ने कभी गली वालों को ऐसा मिठाई खाने का मौका नसीब होने नहीं दिया। 
हमारे घर के पीछे वाली गली में एक बड़ी बिल्डिंग थी जो एक सरकारी नौकर की थी। उस इमारत में रहने या उसमें रहने वालों से रिश्ता जोड़ने की हसरत मुहल्ले के कई लोगों ने पाल रखी थी। लेकिन उनमें वो बात नहीं थी शायद जो रीमा में थी। रीमा जवान थी और अपने घर की बड़ी बेटी थी जो घर गली में मिठाई बंटवाने की प्रथा निभाने वाला इकलौता घर था। इसके उलट मुहल्ले के अन्य अभ्यर्थियों में वो बात नहीं थी। रीमा और उस बिल्डिंग में रह रहे एक लड़के में आपसी सहमति से नजदीकी बढ़नी शुरू हुई तो बेचारा लड़का एक दिन पीट गया। हुआ यूं कि जो लड़़के रीमा से रोज मिलते थे उसे वह रईस लड़का विलेन के रूप में पसंद नहीं आया सो उनलोगों ने ये समझकर कि वह लड़का रीमा को परेशान कर रहा है उसे धो डाला। हिंदी फिल्मों में लाख झूठ के बाद कुछ बातें सही दिखाई जाती हैं मसलन अगर कोई लड़का किसी लड़की के चक्कर में पीट जाता है तो वह उस लड़की की पहली पसंद बन जाता है। ऐसा ही उस रईस लड़के के साथ भी हुआ और बिना खर्चा पानी किए उसे रीमा से वो सब मिलने लगा जिसकी उस उम्र में दरकार थी। 
दुर्भाग्य से जिन लड़कों ने रीमा की अचानक बेरूखी से रितेश को धोया था उनमें से कुछ मेरे भाई के साथ क्रिकेट खेलते थे। यहां से एक नई मिसअंडरस्टैंडिंग शुरू हुई या ऐसे कहें कि योजनाबद्ध तरीके से शुरू की गई। रीमा ने एक दिन मुझसे सड़क पर चलते चलते कहा कि उसे एक लव लेटर मिला है जो शायद मेरे भाई ने दिया है। उसके अनुसार उसे वह लव लेटर सुबह झाड़ू देने के दौरान मिला। 
मेरा परिवार रीमा के परिवार जितना भाग्यशाली नहीं था क्योंकि हम तीनो भाईयों में बड़े भैया को छोड़कर दोनो पढ़ने में भोथ थे। हालांकि मंझले भैया को इंटरमीडिएट में दीदी से बेहतर अंक आए थे लेकिन हमारे भैया और पापा कभी हमारे दोस्त नहीं बन पाए और न ही हमें समझा। हम उन्हें समझने के लायक जब तक बने तबतक बहुत देर हो गई। आज मंझले भैया जेल मंें हैं और मै जवाहर लाल विश्वविद्यालय परिसर में समाजिक न्याय पर समाज को समझने में लगा हूं। खैर अपनी बात फिर कभी।
शाम में हम हम दोनो भाई बहन लैंप में मां के पास बैठ कर पढ़ रहे थे इसी बीच मैने मंझले भैया जिन्हें प्यार से मैं छोटेभैया जी कहता था, को कहा कि सुबह रीमा कह रही थी कि उसे आपने लव लेटर दिया है। जैसा कि मै पहले बता चुका हूं कि हमारा पढ़ने में बिल्कुल मन नहीं लगता था और पापाजी और भैया के डर से ही पढ़ने बैठते थे। मेरा बस चलता तो मै दिनभर प्रेमचंद की कहानी और उपन्यास पढ़ता और छोटेभैयाजी का बस चलता तो वह दिनभर क्रिकेट खेलते और रात में जम कर सोते। छोटेभैया जी बिस्तर से उतरे और मुझे कहा चलो। घर में कोई नहीं था और मां की चलती नहीं थी। जाहिर है कि जब भैया और पापाजी में कोई दोस्त न दिखे तो मां का प्यार ही आखिरी विकल्प होता था और मां के प्यार का नाजायद फायदा उठाते हुए हम दोनो ने मां की बात न मानकर बाहर चल दिए। कॉल वेल छोटेभैया जी ने बजाया। अंदर से खुशी आई। उसने शालीन अंदाज में देखा कुछ औरचारिकता निभाती इससे पहले ही छोटेभैयाजी ने पूछा ‘‘रीमा है‘‘? रीमा ने अंदर जाकर अपने पिता अमर प्रताप चौधरी को बताया कि बाहर कमलकांत आया है। अमर बाबू बाहर आए और औपचारिक तरीके से पूछा ‘‘क्या बात है‘‘? छोटेभैयाजी सिर्फ बड़े भैया जी से डरते थे। उन्होंने कहा कि रीमा ने लक्की को कहा है कि मैने उसे लवलेटर दिया है! लवलेटर का नाम सुनते ही अमर बाबू आपा खो बैठे। उन्हें रीमा ने कुछ बताया ही नहीं था। पूरे नाटक के स्क्रिप्ट में अपने बाप को ही कोई भूमिका नहीं दिया था रीमा ने। जाने किसका आइडिया था शायद उस रईस लड़के का रहा होगा! अमर बाबू ने रीमा को आवाज दी जो शायद सो चुकी थी। होश संभालकर दरवाजे पर आई तो मुझे और छोटेभैयाजी को देखकर सन्न रह गई। अमर बाबू ने हमारे सामने ही उससे पूछताछ शुरू कर दी। गली में हंगामा मच गया। मिठाई बांटने वाले परिवार की बड़ी बेटी पर रात के दस बजे सवाल उठ रहे थे। अमर बाबू की बीबी ने हस्तक्षेप किया तो अमर बाबू को भी इज्जत का एहसास हुआ और उन्होंने रंग बदलते हुए कहा कि ‘‘लल्लू बाबू या निलेश क्यों नहीं आया जो तुम आए हो‘‘। मामूजी अपने लेवल से बात मेनेज करने में भलाई समझ रहे थे। इसलिए पापा या भैया के बुलाने पर जोर दे रहे थे। खैर काफी खटपट के बाद मामला शांत हुआ। इस बीच मैने जो बातें गौर नहीं की वह अमर बाबू की पत्नि की संदेहास्पद भूमिका थी। 
चूंकि छोटेभैयाजी की मित्रमंडली में पढ़ाई में रूची रखने वाले दोस्त कम थे और मटरगस्ती वाले ज्यादा ऐसे में साफ था कि छोटेभैयाजी ने इस बात को अपने से चिपका लिया और रीमा के भाई को धो डाला। गुस्सा कहीं न कहीं उतरना ही था। उन्होंने रात में उसके घर घुसकर उसका बल्ला ले लिया और बाद में उसके बोलने पर उसकी फिर से पिटाई की। अब वह बात जो परदे के पीछे थी लेकिन थी बड़ी दिलचस्प और मजेदार।
दरअसल पिछले दिनों मुझे पता चला कि रीमा के भागने की पुष्टि उसके घरवालों ने कर दी है तो मै चौंका नहीं। मुहल्ले में चर्चा आम है कि रीमा पहले भी कई लड़कों और अपने शिक्षकों के साथ भाग चुकी है। इस बार अंतर इतना ही था कि उसके घर वालों से इसकी पुष्टि कर दी। मुझे आश्चर्य तब भी नहीं हुआ जब पता चला कि रीमा को भगाने में उसकी मां का हाथ है और वही पूरी खेल की मास्टरमाइंड है। उसकी मां कई जगह यह भी स्वीकार चुकी है कि रीमा के पापा उसकी शादी उतने अच्छे लड़के से नहीं करा पाते जिसके साथ अभी रीमा रह रही है। इधर ताजा खबर मिली है कि खुशी, जो कि भाजपा शासित एक राज्य में इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रही थी उसका भी अतुल नाम के किसी लड़के से चक्कर चल रहा है। फेसबुक और ऑरकुट पर ये दोनो ‘‘मुचुअल फ्रैंड‘‘ भी हैं। मै दोनो को शुभकामना देता हूं बशर्ते अतुल के साथ खुशी के साथ वो न करे जो रीमा ने मेरे भाई के साथ किया जो अभी मर्डर केस में जेल में बंद है। साथ ही खुशी को यह भी सलाह है कि अपने पिता को उसकी धोखेवाज पत्नी से बचाकर रखे।


        दुश्मनी करो लेकिन इसकी गुंजाइश रहने दो कि जब दोस्ती हो तो हमें पछताना न पड़े
बशीर बद्र

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