Saturday, July 16, 2011

                           पसमांदा को अपने अंबेडकर का इंतजार


छह दिसंबर 2007 को जब पूरे देश में मुसलमान संगठन बाबरी मस्जिद के विध्वंस की सोलहवीं वर्षगांठ पर शोक और आक्रोश व्यक्त कर रहे थे, बिहार के चम्पारण जिले के एक छोटे से गांव रामपुर बैरिया में उसी रात मुसलमानों को वर्चस्ववाली जाति अशरफ ने अपने ही मजहब की कमजोर जातियों के छह घरों को आग लगा दी। यह विवाद कुछ महीने पहले इबादत के हक को लेकर शुरू हुआ था। एक दिन गांव की मस्जिद में नमाज के दौरान कुछ सैयद और पठान तबके के लोगों ने कोहनी मार कर अंसारी (बुनकर, जुलाहे) और मंसूरी (धुनिया) जैसी कमजोर बिरादरियों के लोगों को पीछे की कतार में नमाज पढ़ने को कहा।
वैसे तो यह आम बात थी और मजबूत बिरादरियों का अल्लाह के घर में आगे की सफों में नमाज पढ़ने पर अलिखित आरक्षण रहा करता था, मगर उस दिन हवा का रूख कुछ और ही था। इन दबी कुचली बिरादरियों के कुछ नौजवान लोगों ने जब इसका विरोध किया तो उनको मस्जिद के बाहर जबरन खदेड़ दिया गया।
लिहाजा, गांव की इन जातियों ने इस मस्जिद का बहिष्कार कर अपने लिए छप्पर और घास फूस की अलग मस्जिद बना ली और वहां नमाज अदा करना शुरू किया। इस पर गांव की दबंग मुस्लिम जातियों के अहम को ठेस लगी और एक दिन चढ़ाई कर दी उन्होंने जुलाहों और धुनियों की इस मस्जिद पर। अगड़े अशरफ तबके मस्जिद फूंक कर बगावत की इसी दास्तान को वह दफनाना चाहते थे। वे हमेशा ऐसा करते आए थे लेकिन अब समय करवट ले रहा था। जम्हूरियत की ताजा हवा रामजुर बैरिया में भी दस्तक देने लगी थी। पसमांदा संगठनों ने इस विषय को जोरशोर तरीके से उठाया और अखवारों में इस खबर को जगह भी मिली। गांधी के नाम से जुड़े चम्पारण के इस गांव में पसमांदा मुसलमानों के लिए आजादी 1947 में नहीं बल्कि थोड़ी देर से 2007 में पहुंची।

जाति सिर्फ हिन्दुओं की बीमारी नहीं
यह अकेला उदाहरण नहीं है अकलियतों मे जातीय अंतर्विराध का। पसमांदा आख्यान इस तरह के प्रसंगो से भरे पड़े हैं। जाति सिर्फ हिन्दुओं की बीमारी नहीं बल्कि भारत में सामाजिक संस्तरण का मूल तत्व और प्रधान अंतर्विरोध है। इस कारण यह यहां के सारे अल्पसंख्यक समाजों में भी नजर आता है। जहां मुसलमान अशरफ, अजलाफ और अरजाल समूहों में बंटे हुए हैं, वहीं सिख समाज जाट खत्री और मजहबी समूहों में ईसाई सिरियन सारस्वत और दलित ईसाइयों में विभाजित है। गौर से देखा जाए तो धर्म की राजनीति, चाहे वह बहुसंख्यकों की हो या अल्पसंख्यकों की, उच्च जातियों की राजनीति है। सारे धार्मिक गुरू नेता और प्रतिष्ठानों इदारों में उच्च जातियों का ही वर्चस्व पाएंगे।
जहां हिन्दू धार्मिक राजनीति पर सवर्णों का नियंत्रण है, वहीं मुसलमानों में अशरफ तबके का वर्चस्व है। सत्त की गलियों में भी मुख्यत सारे धर्मों की उच्च जातियां ही पहुंच पाती है। इसके अतिरिक्त, जाति मुसलमानों में रोटी बेटी के रिश्तों में कमजोर जातियों का उपहास उड़ाना, विभिन्न जातियों के अलग कब्रिस्तान होना, कुछ मस्जिदों में नमाज के दौरान कमजोर जातियों की मस्जिदों को जलाने इत्यादि में नजर आता है। जहां तक धार्मिक वैधता का प्रश्न है मसूद फलाही की उर्दू में लिखित किताब हिंदुस्तान में जात पात और मुसलमान यहां के प्रमुख उलेमा और मौलवियों के जातिवादी चरित्र को साफ तौर पर नुमाया करती है।

पसमांदा सियासत की जमीन
यही ठोस पृष्ठभूमि है पसमांदा राजनीति और विमर्श के आगाज का। पसमांदा, जो कि एक फारसी शब्द है, का अर्थ होता है ‘वह जो पीछे छूट गया‘। बिहार में 1998 में अली अनवर के नेतृत्व में ‘ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज‘ के गठन के बाद और उनकी लिखित किताब ‘मसावात की जंग (2001)‘ के चलते यह शब्द काफी लोकप्रिय हुआ। इस किताब ने पसमांदा मुसलमानों की दयनीय स्थिति के बारे में जोरदार बहस और पसमांदा राजनीति की जमीन तैयार की। बेशक मुस्लिम समाज में कमजोर जातियों के आंदोलनों का इतिहास पुराना है। आजादी के पहले से ऑल इंडिया मोमिन कान्फ्रेंस के हस्तक्षेप, खास तौर पर जिन्ना के दो देशों के सिद्धांत का सीधा विरोध, काबिलेतारीफ है। मगर अली अनवर के हस्तक्षेप के बाद इस आंदोलन ने एक गुणात्मक छलांग लगाई है, इस पर दो मत नहीं हो सकते हैं।

अशराफिया सियासत को चुनौती

अगर जनसंख्या के हिसाब से देखें तो अजलाफ (पिछड़े) और अरजाल (दलित) मुसलमान भारतीय मुसलमानों की कुल आबादी का कम से कम 85 फीसद होते हैं। पसमांदा आंदोलन, बहुजन आंदोलन की तरह, मुसलमानों के पिछड़े और दलित तबकों की नुमाइंदगी करता है और उनके विषयों को उठाता है। यह भारत की मुख्यधारा के मुसलमानों की अकलियती सियासत को अशराफिया राजनीति मानता है और उसे चुनौती देता है। आखिर क्या है अशराफिया राजनीति ? यह मुसलमानों के अभिजात्य उच्च जातियों को राजनीति है जो कि सिर्फ कुछ सांकेतिक और जज्बाती विषयों को जैसे कि बाबरी मस्जिद, उर्दू, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, पर्सनल लॉ इत्यादि को उठाती रहती है। इन विषयों पर गोलबंदी करके और अपने पीछे मुसलमानों का हुजूम दिखा के मुसलमानों के अशरफ तबके और उनके संगठन, जमीअत ए उलेमा ए हिंद, जमात ए इस्लामी, ऑल इंडिया पर्सनल लॉ बोर्ड, मुस्लिम मजलिस ए मसावरात, पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया इत्यादि अपना हित साधते रहे हैं और सत्त में अपनी जगह पक्की करते हैं। इनका पूरा तर्जे अमल गैर जम्हूरी है और इस तरह के जज्बाती विषयों के जरिये यह अपना प्रतिनिधित्व तो कर लेते हैं मगर पसमांदाओं की बलि चढ़ा कर।

अल्पसंख्यक सियासत से फायदा किसे


टूटी मुसलमानों की एकांगी तस्वीर

प्समांदा विमर्श की एक बड़ी कामयाबी यह रही है कि उसने मुसलमानों की एकांगी तस्वीर को तोड़ दिया है, उसी तरह जिस तरह दलित बहुजन आंदोलन ने हिन्दुओं की एकांगी जहचान में सेंध लगाई थी। इससे धर्म की पहचान कमजोर पड़ रही है और समुदाय की वैकल्पिक व्याख्याओं को जगह मिली है। अली अनवर ने कुछ साल पहले कहा था- हम शुद्दर हैं...शुद्दर। भारत के मूलनिवासी हैं, बाद में मुसलमान हैं!‘ एक तरफ तो इस सूत्रीकरण से उन्होंने पसमांदा तबकों का उन अशराफ मुसलमानों से, जो अपने आप को अरब या ईरान से जोड़ते हैं, फर्क बताया, वहीं दूसरी ओर धर्म की एकता की जगह सारे धर्मों की कमजोर जातियों की बहुजन एकता की संभावनाओं की ओर भी इशारा किया। उत्तर प्रदेश और बिहार में आजकल ‘दलित पिछड़ा एक समान, हिंदू हो या मुसलमान‘ का नारा चल निकला है। जाहिर है, सारे धर्मों की कमजोर जातियों की एकता प्रतस्पर्द्धात्मक साम्प्रदायिकता और सेकुलरिज्म के विमर्श को कमजोर बनाएगा और भारत में एक नई राजनीति का आगाज करेगा। अगर जाति हिन्दुस्तान की बुनियादी पहचान है तो किसी जाति की इतनी संख्या नहीं है कि वह अपने आप को बहुसंख्यक कह सके। जब कोई बहुसंख्यक ही नही ंतो फिर अल्पसंख्यक का कोई मायने नहीं रह जाता।

राजनीतिक आंदोलन से हल होगा जाति का सवाल

कुल मिलाकर कहा जाये तो पसमांदा विमर्श ने जम्हूरियत के सवाल को मुस्लिम राजनीति का केन्द्रीय प्रश्न बना दिया है और अंबेडकर की तर्ज पर यह ऐलान कर दिया है कि मुसलमानों के अंदर जाति का सवाल केवल सामाजिक सुधर के सहारे नहीं बल्कि राजनीतिक आंदोलन के जरिये ही हल होगा। अभी हाल में फारबिसगंज में पसमांदा मुसलमानों के संहार के बाद पसमांदा तबके से आए नेताओं जैसे अली अनवर, डॉ एजाज अली, सलीम परवेज, डॉ अयूब, शब्बीर अंसारी की खमोशी अत्यंत हैरान करने वाली है। इतिहार में जाकर देखें तो दलितों में बाबा साहेब अंबेडकर के रेडिकल एजेंडे को कुंद करने के लिए कांग्रेस ने बाबू जगजीवन राम को आगे बढ़ाया था। दलित राजनीति में अंबेडकर पहले आए और बाद में जगजीवन राम। पसमांदा तबका का अलमिया यह है कि उन्हें बाबू जगजीवन राम जैसे नेता पहले मिले लेकिन बाबासाहब अंबेडकर जैसा लीडर आंखो स ेअब भी ओझल है। पसमांदा तबकों को अब इंतजार है अपने अंबेडकर का जो उनके रेडिकल एजेंडे को जमीनी हकीकत बना सके।



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