Wednesday, June 1, 2011

डीयू में ओबीसी सीटों का फिर से होगा अतिक्रमण!



                      डीयू में ओबीसी सीटों का फिर से होगा अतिक्रमण!


   दिल्ली विश्वविद्यालय में आरक्षण प्रक्रिया में धांधली का सवाल फिर से उठना शुरू हो गया है। ‘यूथ फॉर सोशल जस्टिस‘ के अध्यक्ष सुरेन्द्र सिंह ने संदेह जताया है कि इस बार भी विश्वविद्यालय प्रशासन की नीतियों के कारण अन्य पिछड़ा वर्ग के कई विद्यार्थियों को डीयू नसीब नहीं होगा। गौरतलब है कि लगातार आरक्षण को लेकर हुई बहस के बाद डीयू ने पिछले साल सत्ताईस प्रतिशत सीटें अन्य पिछड़ा वर्ग से आने वाले छात्रों के लिए आरक्षित कर दिया था। हालांकि कभी भी इन सीटों पर ओबीसी का एकाधिकार नहीं हो पाया।
ओबीसी विरोधी चरित्र रखने का आरोप झेल रहे विश्वविद्यालय प्रशासन का ही प्रभाव है कि विश्वविद्यालय के नॉर्थ कैम्पस में जगह जगह ओबीसी व दलित छात्रों के संगठन सक्रिय दिख रहे हैं। डीयू के पूर्व कुलसचिव ए. के. दूबे ने आरक्षण को अठारह प्रतिशत से बढ़ा कर सत्ताइस प्रतिशत कर देने पर सख्त एतराज जताया था। दूबे का कहना था कि ऐसा करने से पहले डीयू की कुल सीटों को भी बढ़ाना होगा। कैम्पस में सक्रिय छात्र संगठनों से जुड़े सुत्रों का कहना है कि डीयू में ओबीसी की सीटें कभी पूरी नहीं भर पाई हैं। इसके पीछे इलीट मानसिकता काम करती है। एक रणनीति के तहत ओबीसी के छात्रों को नॉर्थ कैम्पस के प्रतिष्ठित कॉलेजों में दाखिले से रोका जाता है और ऐसा ही विषय चयन को लेकर भी होता है। मसलन विज्ञान की तुलना में ओबीसी की कम सीटें ही कला में रिक्त रहती हैं।
गौरतलब है कि पिछले साल जब डीयू में ओबीसी आरक्षण को अठारह प्रतिशत से बढ़ाकर सत्ताइस प्रतिशत किया गया था तो देश के गरीब राज्यों विशेषकर बिहार और झारखंड के पिछड़े वर्ग के छात्रों ने डीयू का सपना देखा था। लेकिन डीयू प्रशासन ने इलीट समर्थित मानसिकता का परिचय देते हुए एक विशेष रणनीति के तहत ज्यादातर ओबीसी सीटों को जेनरल में परिवर्तित कर दिया। नतीजा यह हुआ कि दिल्ली विश्वविद्यालय के नामी हंसराज कॉलेज में कुल ओबीसी सीट का पैंसठ फीसदी ही भरा जा सका। वहीं कमला नेहरू कॉलेज में मात्र चालीस फीसदी और लेडी श्रीराम कॉलेज में मात्र पचपन फीसदी ओबीसी सीटें ही भरी जा सकीं। बाकी की सीटों को जनरल श्रेणी के छात्रों को थमा दिया गया।
दिल्ली विश्वविद्यालय के अंतर्गत लगभग उन्यासी कॉलेज आते हैं जिनमें देश के लगभग एक लाख छात्र हर साल पढ़ाई करने आते हैं। जाहिर है यहां की गुणवत्ता छात्रों को यहां खींच लाती है लेकिन इसकी गुणवत्ता का अह्म डीयू के बारे में सोचने को मजबूर कर रहा है। ज्ञात हो सिविल सेवा परीक्षा के पाठ्यक्रम में बदलाव कर जब इसे अंग्रेजी आधारित रूप दिया गया था तो बिहार झारखंड जैसे पिछड़े राज्यों के छात्रों पर इसके प्रभाव के बारे में डीयू के एक प्रोफेसर ने कहा था कि ऐसे राज्यों के लिए तो सरकारें कई योजनाएं चला रही हैं! ऐसे बयान से सामाजिक न्याय को लेकर डीयू की गंभीरता तो झलकती ही है साथ ही साथ डीयू में नामांकन में ओबीसी को पीछे ढ़केलने की वजह भी स्पष्ट हो जाती है।
रामदास कॉलेज के वार्डन सह राजनीति विज्ञान के वार्डन तनवीर एजाज का कहना है कि ऐसी स्थिति में जब डीयू ओबीसी के नाम पर सरकार से फंड लेती है तो ये उसकी जवाबदेही बनती है कि इसका लाभ ओबीसी के छात्रों को मिले लेकिन ऐसा न हो पाना सामाजिक न्याय के लिए खतरनाक है।

साक्षात्कारः


डीयू में पिछड़े वर्ग के छात्रों के नामांकन के लिए संघर्ष कर रहे संगठन ‘‘ यूथ फॉर सोशल जस्टिस ‘‘ के अध्यक्ष सुरेन्द्र ने आरक्षण को लेकर विश्वद्यिालय की अंदरूनी राजनीति और नीतियों के बारे में मुझसे बात की। 

प्रस्तुत है बातचीत का अंशः

ओबीसी छात्रों की सीट पर जनरल के अतिक्रमण पर क्या कहेंगे?


इसके लिए सीधी तौर पर विश्वविद्यालय प्रशासन दोषी है। डीयू प्रशासन की धारणा शुरू से ही यही रही है कि बड़े शहरों के उच्च मध्यवर्ग का नामांकन में प्राथमिकता दी जाए। ऐसी मानसिकता वाले प्रशासन से आप सामाजिक न्याय की उम्मीद करेंगे तो निराश होंगे। दिल्ली विश्वविद्यालय की पूरी कोशिश रहती है कि पिछड़े या दबे कुचले वर्ग के छात्रों को अच्छे कॉलेजों में दाखिला न मिल पाए। विश्वविद्यालय इस संकीर्ण मानसिकता से ग्रस्त है कि बिहार, झारखंड जैसे राज्यों के पिछड़ों के आने से विश्वविद्यालय की गुणवत्ता प्रभावित होगी। जबकि सच यह नहीं है।

डीयू ओबीसी सीटों को जनरल में बदलने के लिए बदनाम रहा है। डीयू की रणनीति के बारे में बताएं।

न्यायालय ने स्पष्ट कहा है कि जनरल श्रेणी और ओबीसी श्रेणी के कट ऑफ में का अंतर दस फीसदी हो। जबकि नार्थ कैम्पस के लगभग सभी नामी कॉलेजों में विश्वविद्यालय इस अंतर को महज दो से तीन फीसदी रखता है। ऐसी स्थिति में परिणाम वही होता है जो डीयू चाहता है। हजारों ओबीसी छात्रों को आरक्षण का लाभ नहीं मिल पाता है और उनकी सीटों पर जनरल श्रेणी के छात्र कब्जा जमा लेते हैं। ये पूरा खेल डीयू प्रशासन के अप्रत्यक्ष सहमति से ही संपन्न होता है।

मीडिया का क्या रूख है?

आज के दौर में मीडिया सामाजिक न्याय की बात करेगा ऐसा भोले भाले लोग ही सोचते हैं। मीडिया का एक बड़ा भाग डीयू में आरक्षण को लेकर अफरा तफरी का माहौल बना कर विषय भटकाने का काम करता है। ओबीसी या पिछड़े छात्रों के साथ हो रहे अन्याय पर सब चुप हैं। उदाहरण के लिए पिछले सत्र में जनरल कटेगरी की छात्रा दीपशिखा के दाखिले के लिए एक इलेक्ट्रानिक मीडिया ने एड़ी चोटी एक कर दिया और बड़ी ही चतुराई से यह भी बता गया कि ओबीसी के आरक्षण के कारण किस तरह बारहवीं में उन्यासी प्रतिशत अंक लाने के बावजूद दीपशिखा का दाखिले में दिक्कतें हुई। इसके विपरीत मुख्यधारा की मीडिया में अपवादस्वरूप ही ओबीसी या एससी एसटी श्रेणी के छात्रों के साथ हुई परेशानी और घोर अन्याय को दिखाया गया।


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