Wednesday, June 1, 2011


                                             स्कूल है आई आई एम सी 

           मनोवैज्ञानिक बाधाओं के लिए व्यक्ति छात्र जीवन में ही तैयार होता है। छात्र जीवन में ही परिस्थितियां और चुनौतियां वह जमीन तैयार करती हैं जिसपर एक छात्र के अंदर प्रतिस्पर्धा की शक्ति का अंकुरण होता है। ऐसे कई उदाहरण हमारे समाज में मौजूद हैं जब पर्याप्त खाद पानी के अभाव में किसी व्यक्ति के अंदर इस शक्ति का अंकुरण नहीं हो पाया और मनोवैज्ञानिक स्तर पर वह टूटता चला गया। मै उन व्यक्तियों में एक था लेकिन आज आई आई एम सी से निकल कर मुझे लग रहा है कि मुझमें इस शक्ति का अंकुरण हो चुका है। इसका श्रेय आई आई एम सी के हिन्दी पत्रकारिता के शिक्षकों को जाता है। 
‘‘ अक्सर छात्रों को लगता है कि शिक्षक कक्षा में ज्ञान देने आता है लेकिन छात्र ये नहीं जानते कि शिक्षक कक्षा में छात्रों से ज्ञान लेता है और कक्षा में ज्ञान का प्रवाह दोनो तरफ से होता है ‘‘ दिलीप मंडल के ये शब्द अपने आप में उनके व्यक्तित्व को समझने में काफी मदद करते हैं। मीडिया के लगभग हर घाट का पानी पी चुके दिलीप मंडल को पाठ्यक्रम विशेषज्ञ से लेकर सामाजिक न्याय से जुड़े क्रांतिकारी के रूप में देखा जाता है। दिलीप मंडल न तो ब्लॉग पर हांकने में भरोसा करते हैं और न ही अंधवामपंथी बन कर ठसाठस शब्दों में बहस दर बहस करने में। गंगा ढ़ावा पर पश्चिम बंगाल के जातीय समीकरण पर जब दिलीप मंडल ने बोलना शुरू किया तो वस्तुनिष्ठता की ऐसी झलक मिली कि एकबारगी लगा ही नहीं कि यह छात्र जीवन से वामपंथी संगठन से जुड़ा कोई व्यक्ति है!
दिलीप मंडल भारतीय जनसंचार संस्थान के अन्य शिक्षकों से काफी अलग हैं इसका एहसास मुझे पहली बार तब हुआ जब खाद्यान्न संकट पर मेरे एक लेख पर उन्होंने टिप्पणी दी। मेरे स्मरण में एक साल के दौरान आई आई एम सी में किसी छात्र के ब्लॉग पर कमेंट देने का समय निकालने वाले कोई अन्य शिक्षक के दर्शन मुझे नहीं हो पाए। दिलीप सर छात्रों से खुद को इस तरह जोड़ते हैं कि गांठ तक नहीं दिखती और शायद यही कारण है कि फेसबुक पर दिलीप मंडल तक संस्थान का हर छात्र बिना किसी मानसिक अवरोध के पहुंच पाया है। रक्षा बंधन के दिन पूरे क्लास को मिठाई खिलाने की बात हो या लिटी पार्टी में सबका मुह मीठा करने का न भुलाने वाला मौका मंडल सर में एक अलग व्यक्तित्व दीखता है।
प्रधान सर के बारे में फिर कभी।

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