Monday, May 2, 2011

आई आई एम सी


स्कूल है आई आई एम सी

  पीठ पर बस्ता टांग कर नजरें झुका कर सड़क पर पड़े किसी डब्बे को लात मारते हुए और चलते चलते अचानक दौर जाना, सड़क से सटे दुकान में रखे चॉकलेट के डब्बे को ललचाई नजरों से देखते हुए आगे बढ़ जाना और रास्ते में मिलने वाले दोस्तों से होमवर्क के बारे में उत्सुकता से पूछते रहना ये दुनियादारी से बेखबर किसी स्कूल के छात्र का दिनचर्या होता है। आई आई एम सी कहने को एशिया का सर्वोत्तम हिन्दी पत्रकारिता संस्थान हो लेकिन हिन्दी पत्रकारिता के ज्यादातर देशी विद्यार्थियों खासकर उत्तर भारतीयों के लिए आई आई एम सी एक स्कूल की तरह है जहां कोई बच्चा कक्षा में सर जी से शिकायत करता है कि उसे बेंच के पीछे से किसी ने चिकोटी काट ली है, कोई कहता है कि सर ये मुझे राखी सावंत कह कर चिढ़ाता है। देश के सभी कोने से समाज के प्रति अपना अलग नजरिया रखनेवाले गर्म युवक यहां आपस में एक दूसरे से नाराज होने पर न तो बेल्ट, फाइटर, हॉकी, चेन या विकेट से किसी सहपाठी की पिटाई करते हैं और न ही भाड़े पर लठैतों को बुलवाकर अपना कलेजा ढंढा करते हैं। आई आई एम सी में अगर कोई किसी से नाराज है या नाराजगी की चरम अवस्था में पहुंच चुका है तो वह कट्टिस हो जाता है और अगले ही कुछ दिन में फिर से वो दोनो कैंटीन में साथ साथ बैठ कर खाते देखे जाते हैं। 
दिलीप मंडल की कक्षा में साद 
हिंदी पत्रकारिता में दाखिले लेने के कुछ ही महीने के बाद सत्र 2010-11 के छात्र साद बिन उमर को कॉलेज आने के क्रम में किसी गाड़ी ने ठोक दिया। अंग्रेजी पत्रकारिता की पढ़ाई कर रही वाटिका, जो कि साद के पीछे चल रही थी, ने गाड़ी का रंग और नंबर नोट किया। आधे घंटे के अंदर समूची हिन्दी पत्रकारिता जिसमें संकाय सदस्य डॉ आनन्द प्रधान, दिलीप मंडल, भूपेन सिंह, मानुषि मैम सहित देश के कोने कोने से आए छात्र शामिल थे, एम्स ट्रामा सेंटर पहुंच गए। ड्राइवर ने ही साद को हॉस्पीटल पहुंचाया था। मधेपुरा के आशीष भारद्वाज इतने गुस्से में थे कि निखिल, कुलदीप, सागर, स्वपनल, आशीष मिश्रा सहित अन्य दोस्तों ने बीचबचाव नहीं किया होता तो ड्राइवर का भी ट्रामा में भर्ती होना तय था। जामिया मीलिया इस्लामिया, जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय सहित अन्य विश्वविद्यालयों के जो छात्र जहां थे, जिस हालत में थे, वैसे ही एम्स पहुंच गए। आनन्द सर और दिलीप सर एक साथ कई भूमिका में थे जिसमें एक भूमिका सरकारी राहतकोष की थी। सर के पैसे से हमलोगों ने सैंडवीच भी खाया। सभी छात्र को सर में अपने पिता की मूरत दिखाई देती थी ऐसे में सर के पैसे से पेट भरने में हमें सुखद अनुभूति ही हो रही थी। शिक्षकों के व्यवहार के कारण हमलोगों के मन में कभी कोई जहर जगह बना ही नहीं सका जो हमें यह सोचने को बाध्य करे कि इन पैसों का हिसाब देते वक्त सर हमपर शक करेंगे। स्नेह, सहानुभूति, आशीर्वाद और अपनापन की इतनी उम्मीद आप भारतीय जनसंचार संस्थान में ही कर सकते हैं। अगर हमलोगों ने अपने मां बाप के कंधे पर बैठकर दुनिया देखा था तो आई आई एम सी ने हमें ऐसे पितातुल्य शिक्षकों के दर्शन करवाए जिनके गोद में अगर खेलते हुए अगर हमने उनके कपड़े गंदे भी किए तो उन्होंने गुस्से में भले ही देखा हो लेकिन गोद से उतारा नहीं और ना ही उतारने की धमकी दी। 
न भुला सकने वाली कक्षाएं 
दिलीप मंडल या आनन्द प्रधान के बारे में मैं कुछ लिखूं इतनी मेरी औकात नहीं है लेकिन फिर भी बालहठ करते हुए इतना जरूर लिख सकता हूं कि अगर मै इन शिक्षकों से मिले बिना ही मर जाता तो कभी सोच नहीं पाता कि ऐसे लोग भी होते हैं।
इंदौर के अमित पाठे के रूप में मुझे एक ऐसा दोस्त मिला जिसने न केवल मुझे गलत रास्ते पर जाने से रोका बल्कि अंधेरे में भी मेरा हाथ थामे रहा। कैंपस प्लेसमेंट को लेकर एक न्यूज पोर्टल में छपी मेरी टिप्पणी पर प्रधान सर बेहद नाराज थे। मैं उस दिन क्लास नहीं गया था। अमित पाठे का फोन आया कि प्रधान सर मुझे बुला रहे हैं। मैं तब कमरे पर खाना बना रहा था। जैसे तैसे ऑटो से कॉलेज पहुंचा। प्रधान सर ने कोई कसर नहीं छोड़ा और मेरी ऐसी क्लास ली कि शायद ही कभी किसी की ली होगी। इसके तुरंत बाद एक सहपाठी के एसएमएस ने मेरा सब्र तोड़ दिया। अगर अमित पाठे बीच में नहीं आया होता तो मारपीट पक्की थी। ये आई आई एम सी का मेरा सबसे कड़वा अनुभव था। इस अनुभव के आधार पर मै इतना तो कह ही सकता हूं कि अन्य संस्थानों में जहां छात्र आपस में लॉबिंग करके एक दूसरे को उकसाते हैं आई आई एम सी में ऐसा नहीं है। यहां का माहौल अगर जहरीला नहीं हो पाया है तो इसका श्रेय इंद्रजीत यादव, स्वपनल सोनल, तारा चंद मीणा, अंकित फ्रांसिस, रूपेश पाठक, रविकांत शर्मा, आशीष भारद्वाज, अखिल रंजन जैसे उन सहपाठियों को जाता है जिन्होंने कई बार अपने गुस्से को घोंट कर चीजों को नजरअंदाज कर दिया।
चावला बाबु नहीं चावला सर 
आम तौर पर कॉलेज में क्लर्कों को बाबू कह कर पुकारा जाता है मसलन फलां बाबू लेकिन आई आई एम सी में चावला सर एक ऐसे मिसाल हैं जो सरकारी बाबुओं में अपवादस्वरूप भी बामुश्किल ही मिल पाता होगा। आई आई एम सी के लिए जब मै पटना से राजधानी एक्सप्रेस में चढ़ने वाला था तभी चावला सर का फोन मेरे मोबाइल पर आया। उन्होने कहा कि मैने जो डी डी डाक से भेजा है उसमें गलती से भुगतान की जगह मैने दिल्ली न देकर बेगूसराय दे दिया है। मुझे बैंक में जाकर इसे ठीक कराकर पुनः भेजना होगा। मेरे लिए यह असंभव था क्योंकि गाड़ी प्लेटफॉर्म पर लग चुकी थी। मैने चावला सर से कहा कि मै दिल्ली के लिए चलने वाला हूं और वापस बेगूसराय जाकर डीडी ठीक करवाना मुश्किल है। चावला सर ने बड़े ही स्नेह से कहा कि कोई बात नहीं बेटा तुम आ जाओ मै देख लूंगा। आई आई एम सी आकर मै चावला सर से मिला मन में था कि सौ पचास लेंगे लेकिन उन्होंने बगैर किसी लेनदेन या कोई उम्मीद किए मेरा डीडी एक्सेप्ट कर लिया और मुझे कोई परेशानी नहीं होने दी। हिंदी पत्रकारिता में कई ऐसे छात्र हैं जिनकी उपस्थिति रिकार्ड बेहद खराब है और उन्हें परीक्षा में शामिल नहीं होने देने का पर्याप्त कारण संस्थान प्रशासन के पास मौजूद है, बावजूद अगर ये विद्यार्थी परीक्षा में बैठ पाते हैं तो इसके पीछे चावला सर का सहयोग है। चावला सर को लेकर छात्रों में इतना सम्मान है कि पाठ्यक्रम निदेशक भी चावला सर की व्यवहारकुशलता का लोहा मानते हैं। 
अर्चना मेम
आई आई एम सी की फाइनल परीक्षा के दौरान जब अर्चना मैडम ने मुझे डांटते हुए कहा कि मै दवा क्यूं नहीं लेता तो मुझे एकबारगी ऐसा लगा कि कोई यहां है जो मां की भूमिका में है। ना भूलने वाला अनुभव था यह। दरअसल मेरी तबियत खराब थी और मै किसी तरह उंघते हुए परीक्षा दे रहा था। मैडम मेरी गतिविधियों पर गौर कर रहीं थी और जैसे ही मैने कॉपी जमा की उन्होंने प्यारी सी डांट लगाई कि तुम्हारी इतनी तबियत खराब है तो आराम क्यूं नहीं करते। दवा क्यूं नहीं लेते! ऐसा स्कूलों में ही होता है। बाद में मैंने अर्चना मैम के साथ फोटो खिंचवाया।
तनुश्री मैम हिंदी पत्रकारिता से परहेज करती हैं तो इसका श्रेय विधायक जी को खासतौर पर जाता है बाकी ‘जी नमस्ते नेटवर्क‘ सहित अंतिम सीट पर बैठने वाले तमाम मामलों के विशेषज्ञ को समान रूप से इसका श्रेय जाता है। तनुश्री मैम को याद रखने की एक खास वजह है। दरअसल फाइनल परीक्षा के अंतिम दिन मै बीच परीक्षा में पानी पीने के लिए बाहर निकला तो एक सर के केविन में जाकर कुछ पूछताछ कर ली। सर ने जब जवाब बता दिया तब उन्हें पता चला कि वो सवाल परीक्षा में पूछा गया है और परीक्षा जारी है। सर का गुस्सा देखनेलायक था। विश्वास टूटने के सारे समीकरण बन चुके थे। मैने क्षमायाचना की लेकिन फायदा नहीं हुआ। मैने निर्णय लिया कि इस सवाल को टच नहीं करूंगा और सर का विश्वास बना रहे इसलिए मैने कॉपी पर अपना नाम यह सोचकर लिख दिया कि अगर सर मेरी कॉपी जांचेगे तो उन्हें पता लग जाएगा कि मैने उनके द्वारा बताए जवाब को नहीं लिखा। सर से बाद में माफी तो मिल गई और विश्वास भी बना रहा लेकिन दूसरी आफत आ गई। तनुश्री मैम ने एक सहपाठी को कहकर बुलावा भेजा। मै डरते डरते पहुंचा तो जम कर डांट पिलाईं। कहा कि योगेश तुम हो...कितनी बार परीक्षा में बैठै हो... एन्सर सीट पर नाम लिखा जाता है...तुम्हारी कॉपी ओ एस डी के पास जाएगी...। मेरी हालत खराब थी ये दूसरा झटका था। मैम वैसे हिंदी पत्रकारिता के छात्रों से परहेज करती थी इसलिए चमचागिरी भी बेकार थी। मै धर्मसंकट में था नाम क्यूं लिखा यह बता नहीं सकता था और बिना बताए रहम की उम्मीद भी नहीं थी। लेकिन मेम ने मेरे परेशान चेहरे को देखकर हंसते हुए कहा कि उन्होंने मेरा नाम काट दिया है। मै मन ही मन नतमस्तक हो चुका था। तनुश्री मैम के क्लास में हमलोगों ने जितनी बदमाशी की आज वो सब याद आ रहा है। 
कलिका मेम
पूरे सत्र के दौरान कालिका मैम का एक ही क्लास हो पाया लेकिन उनके व्यक्तित्व ने ऐसा प्रभाव जमाया कि हिंदी पत्रकारिता का कोई भी छात्र उस एक क्लास को अपने डायरी के पन्नों में संभालकर रखेगा। मानुषी मैम का दिखावटी गुस्सा और एटेंडेंस काटने की खोखली धमकी हमेशा याद रहेंगी साथ ही शाश्वती मैम का सामुदायिक रेडियो में लिया गया साक्षात्कार और उनकी गंभीर व्यक्तित्व मेरे साथ साथ पूरा हिंदी पत्रकारिता याद रखेगा।
हिंदी पत्रकारिता के सत्र समाप्ति पर हुए '' लोग आउट'' कार्यक्रम में जब अंग्रजी पत्रकारिता के एक छात्र ने अपने विचार रखे तो सब चकित रह गए. उक्त छात्र ने कहा कि उसने कहने को आई आई एम् सी में अंग्रेजी पत्रकारिता की पढाई की है लेकिन उसकी दोस्ती हिंदी पत्रकारिता के छात्रों से ही हो पाई. वो मानते हैं कि हिन्दी पत्रकारिता के छात्रों में एक विशेष आकर्षण है. आई आई एम सी का गोसाईं घर है हिंदी पत्रकारिता विभाग. अगले अंक में प्रधान सर और दिलीप सर के साथ अपने व्यक्तिगत अनुभव साझा करूँगा.
क्रमशः







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3 comments:

  1. अपने अनुभवों का साझा किया तुमने वाकई में अच्छा काम किया यह अनुभव जिंदगी भर साथ रहेगा....

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  2. your allegation that i am averse to hindi journalism is absolutely baseless...i dont remember that i ever differentiated between any of the department or its students.

    I am shocked that you wrote like this.

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  3. @ Tanu: Mam, we respect you. It's not my allegation it's only an opinion or understanding... anyone can disagree at my opinion. Again saying We have no word for your contribution to Hindi Journalism.

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