Wednesday, April 13, 2011

बेकाबू प्रतिक्रिया

एक खुलासा उस बेकाबू प्रतिक्रिया पर 

फेसबुक और ट्वीटर पर कई लोगों ने ये आशंका व्यक्त की है कि भारतीय जनसंचार संस्थान बरखा प्रकरण को लेकर मुझपर दबाव बना रहा है। भड़ास पर छपी एक टिप्पणी से इस आशंका को बल मिला है। मै यह स्पष्ट करना चाहता हूं कि हिन्दी पत्रकारिता के पाठ्यक्रम निदेशक डॉ आनन्द प्रधान ने मुझपर किसी भी तरह का कोई दबाव बनाने की कोशिश नहीं की है और उनके खिलाफ लगाए जा रहे आरोप में कोई सच्चाई नहीं है। प्रधान सर का मै पूरा सम्मान करता हूं। 
संभव है कि प्रधान सर को चर्चा में लाने के पीछे कोई षडयंत्र या अन्य उद्येश्य हो। जिस तरह बर्खा दत्त  रुबी धिनग्रा को आगे कर खुद को छिपाने का असफल प्रयास कर चुकी हैं उसी तरह अब प्रधान सर को बहस के केन्द्र मे लाकर बहस को गन्तब्य से भटकाने का प्रयास कर सकती हैं. प्रधान सर इस पूरे मामले पर तटस्थ हैं और एक शिक्षक की भूमिका में है। प्रधान सर ने जो स्पष्टीकरण 20अप्रैल तक मुझसे लिखित मांगा है उसके पीछे एन डी टी वी द्वारा मुझपर दबाव बनाने की संभावना से मै इनकार नहीं कर रहा हूं लेकिन प्रधान सर पर की जा रही आपत्तिजनक टिप्पणी से मै आहत हूं और मुझे संस्थान में अपने सहपाठियों को सफाई देनी पड़ रही है।
बरखा दत्त प्रकरण को लेकर भी कुछ अफवाहें तैर रही हैं जिसे मै स्पष्ट कर देना चाहता हूं। बरखा का विरोध मेरा व्यक्तिगत नहीं था। यह एक संस्थागत विरोध था। मै पत्रकारिता में बरखा की दक्षता और निपुणता का आदर करता हूं। मैं पत्रकारिता का छात्र हूं और बिहार में अपराध रिपोर्टिंग के लगभग हर पहलु से अवगत हूं। इस आधार पर मै यह कह सकता हूं कि बरखा आज जिस बुलंदी पर हैं इसके पीछे उनकी विशेषता और समर्पण है। मेरे जैसे कई लड़के जो पत्रकारिता में आना चाहते हैं वो देश के विभिन्न संस्थानों में खुद को पका कर और समर्पण का भाव लिए आते हैं। कौन नहीं जानता कि बिहार में आज भी सरकारी नौकरी की ही पूछ है। प्राइवेट नौकरी करने वालों के घर बरतुहारी भी मुश्किल से होती है। सीएनबीसी के एक पत्रकार जो भारतीय जनसंचार संस्थान में बतौर गेस्ट फेकल्टी कक्षाएं लेते हैं उनसे इस दर्द को बेहतर समझा जा सकता है। कुछ मायने में मैं इन्हें आदर्श मानता हूं। ऐसे करोड़ों छात्र जो अबतक इस सम्मोहन में जी रहे थे कि पत्रकारिता में आगे बढ़ने के लिए त्याग और समर्पण चाहिए उनमें से एक मै भी था। टू जी घोटाले में बरखा का नाम आने के बाद मेरा सम्मोहन टूट गया और नीरा राडिया - बरखा की टेप सुनकर मै असहज होता गया। इंडियागेट प्रकरण इस असहजता की चरम अवस्था थी। मेरे कई मित्र बिहार के अलग अलग जिलों में एस एस सी, रेलवे, बैंकिंग और सिविल आदि की तैयारी कर रहे हैं। आज जब मै उन्हें फोन पर यह बताता हूं कि सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार व्याप्त है और उस तंत्र में रहकर मै समाज से जुड़ नहीं सकता तो वह मुझसे पत्रकारिता के मौजूदा चरित्र को लेकर सवाल करते हैं। मुझे लगता है बरखा को इंडिया गेट से भागने पर मजबूर करके मेरा समर्थन कर रहे लोगों ने पूरे देश को यह संदेश दे दिया है कि बरखा अब ना तो पत्रकारिता की रोल मॉडल हैं और ना ही देश के युवाओं में उनको लेकर पहले जैसा सम्मोहन है।
संभव है कि कुछ लोगों को यह लगे कि मैने ये सब पब्लिसिटी के लिए किया है। मै दावे के साथ कह सकता हूं कि ऐसा वही लोग सोच सकते हैं जो घटनास्थल पर नहीं थे और अपने कमरे में किसी दूसरे टीवी चैनल पर लाइव रिपोर्टिंग देख रहे थे। क्योंकि लगभग हमेशा यही होता है कि लोग टीवी देखकर अपनी सोच और समझ बनाते हैं और मीडिया एजेंडा सेट करता है। पत्रकारिता की भाषा में इसे ‘‘ एजेंडा सेटिंग थ्योरी‘‘ कहते हैं। देश में मलेरिया से हर साल लाखों लोग मरते हैं लेकिन मीडिया एड्स की रिपोर्टिंग करता है। विदर्भ में कपास के किसान मरते हैं तो मीडिया सोयाबीन की रिपोर्टिंग करता है। जेएनयू में एससी एसटी सीट पर हो रही राजनीति के बारे में मीडिया ना बताकर ये बताता है कि हॉस्टल में पॉर्न वीडियो बनाया जा रहा है। ऐसी मीडिया के प्रभाव में आकर मुझपर सस्ती पब्लिसिटी का आरोप लगाने से पहले अपने विवेक  से काम लें। पब्लिसिटी करनी होती तो मै लाइव प्रोग्राम में चप्पल फेंक कर या कैमरे के सामने आकर नारेवाजी करके कर लेता। बेकार में मैने अपनी डायरी, कलम और पैसे भी खो दिए और अब सफाई भी देनी पड़ रही है।
     

5 comments:

  1. शीतल जी,

    सबसे पहले तो मैं आपको बधाई देना चाहूँगा क्यूंकि आपने बड़ी निपुणता से अपनी बात यहाँ रखी है ! आपके विचार बड़े ही भावुक और विचारात्मक हैं ! आपने जो प्रतिक्रिया यहाँ दी है हमें उसका सम्मान करना चाहिए ! आशा है आप सच्चाई के रास्ते पे अडिग रहेंगे और भविष्य में आनेवाली पीढ़ी का मार्गदर्शन करेंगे ! जय हिंद !

    रोहित कुमार शर्मा

    ReplyDelete
  2. भाई साहब, आप हिंदी के पत्रकार बनना चाहते हैं. कम से कम हिंदी तो सही लिखिए. मात्रा की कितनी अशुद्धियाँ हैं आपके इस लेख में. उन्हें ठीक करिए.

    आप पिछले तीन-चार दिनों से खूब हाफा पीट रहे हैं. हाफा समझते हैं न? आपके सामने जो परिस्थितियां आई हैं, उनका मुकाबला शांति से कीजिये. याद रखिये, तुरंत ट्विटर अकाउंट बना लेना, हर बात पर ट्वीट करना, मामले की हरपल जानकारी देना, डॉक्टर आनंद प्रधान की चिट्ठी को कानूनी नोटिस बताना, लीगल असिस्टेंस की गुहार लगाना.....इन सारी बातें को सिलसिलेवार अगर कोई भी देखेगा तो वह आपके ऊपर शक करेगा. मेरा आपसे अनुरोध है कि ठन्डे दिमाग से परिस्थितियों का सामना कीजिये. खुद को शहीद का दर्जा दिलवाने की लालसा से उबरिये.

    आप पत्रकारिता से भ्रष्टाचार मिटाना चाहते हैं, इससे अच्छी बात नहीं हो सकती. पत्रकार बनकर जो लोग़ सत्ता की दलाली में लगे हुए हैं, आपकी कोशिशों से अगर वे पत्रकारिता से हट गए तो यकीन जानिये कि देशवासियों के लिए उससे बढ़कर और कुछ नहीं होगा. लेकिन एक बार अपने तरीके पर ज़रूर विचार करें. जहाँ पूरे देश की मीडिया जमी हो, वहाँ चार नारे लगाकर कोई भी खुद को महान प्रोजेक्ट कर सकता है. लेकिन वह सचमुच महान है कि नहीं उसका निर्धारण इस बात से होगा कि वह संघर्ष करके ऊपर उठता है या नहीं.

    ReplyDelete
  3. शिव साहब,

    हिन्दी तो आपनेभी सही नहीं लिखी है| हिन्दीमें पूर्ण विराम एक सीधी लकीर खींच कर बनाया जाता है|

    आपका कहना है "जहाँ पूरे देश की मीडिया जमी हो, वहाँ चार नारे लगाकर कोई भी खुद को महान प्रोजेक्ट कर सकता है."

    अगर यह इतनी आसान बात है तो पिछले २० सालों में ऐसे भ्रष्टाचारियों का सरे आम विरोध क्यूँ नहीं हुआ? शायद आप को श्री चैतन्य कुंते (मुंबई के युवा ब्लोगर)को बरखा दत्त के खिलाफ एक लेख लिखने क्या नतीजा भुगतना पड़ा था जान लेना चाहिए | तब क्यूँ कोई चैतन्यजी को बचाने के लिए आगे नहीं आया था?

    कहेने का तात्पर्य सिर्फ इतना है की शीतल जी या अन्य आम आदमी के तोर-तरीके/खामियों/क्षतियों को छोडिए, आइए हाथ मिलाए और इन हरामखोर देश-द्रोहियों का सफाया करे|

    deshdaaz.blogspot.com

    ReplyDelete
  4. शुभागमन...!
    कामना है कि आप ब्लागलेखन के इस क्षेत्र में अधिकतम उंचाईयां हासिल कर सकें । अपने इस प्रयास में सफलता के लिये आप हिन्दी के दूसरे ब्लाग्स भी देखें और अच्छा लगने पर उन्हें फालो भी करें । आप जितने अधिक ब्लाग्स को फालो करेंगे आपके ब्लाग्स पर भी फालोअर्स की संख्या उसी अनुपात में बढ सकेगी । प्राथमिक तौर पर मैं आपको 'नजरिया' ब्लाग की लिंक नीचे दे रहा हूँ, किसी भी नये हिन्दीभाषी ब्लागर्स के लिये इस ब्लाग पर आपको जितनी अधिक व प्रमाणिक जानकारी इसके अब तक के लेखों में एक ही स्थान पर मिल सकती है उतनी अन्यत्र शायद नहीं । प्रमाण के लिये आप नीचे की लिंक पर मौजूद इस ब्लाग के दि. 18-2-2011 को प्रकाशित आलेख "नये ब्लाग लेखकों के लिये उपयोगी सुझाव" का माउस क्लिक द्वारा चटका लगाकर अवलोकन अवश्य करें, इसपर अपनी टिप्पणीरुपी राय भी दें और आगे भी स्वयं के ब्लाग के लिये उपयोगी अन्य जानकारियों के लिये इसे फालो भी करें । आपको निश्चय ही अच्छे परिणाम मिलेंगे । पुनः शुभकामनाओं सहित...

    नये ब्लाग लेखकों के लिये उपयोगी सुझाव.

    बचाव : छुपे हुए महारोग- मधुमेह (शुगर / डायबिटिज) से.

    ReplyDelete
  5. bahut badhiyan shital jee...
    aapka lekh mere dil ko andar tak chhu gaya or tippani dene ko majboor hona pada..
    yu hi sangharsh karte rahiye...
    ham aapke sath hain.
    jai hind!

    ReplyDelete