Friday, January 14, 2011

                                     वो पेन किलर नहीं कोई और थी



          ‘‘एक समय संतुष्ठ बहुत था                                              
          पा   मैं    थोडी     सी   हाल;
         
                     भोला-सा  था  मेरा  साकी
                     छोटा    सा    मेरा प्याला;
         छोटे से इस जग को मेरे
        स्वर्ग बलाएं लेता था,
                    विस्तृत जग में,हाय गई खो
                    मेरी     नन्हीं      मधुशाला!
                                   साभार-मधुशाला


                      उस दिन पता नहीं क्या मन में आया कि उसे ’पेन किलर’ कह दिया।तब क्या पता था कि इस गलती की सजा लंबे समय तक किस्तों में चुकानी पडेगी।उसकी आवाज मुझे तब्बू जैसी लगती थी तब।बेगूसराय में एक प्रखंड है बखरी।उस दिन मैं पढाई के कारण अखवार के कार्यालय पूरे दिन नहीं गया था और सोचा था कि शाम में कोई अच्छी सी रिपोर्ट ले कर जाउंगा।बखरी खबर के लिहाज से बहुत उर्वरा जगह थी और वहां का रिपोर्टर भी एक्टिव रहता था।पिछले दिनों ही पीपल के पेड को काटने को लेकर दो समुदायों में झडप हुई थी।फॉलोअप के लिए प्र्र्र्रशांत जी को कॉल किया और अपडेट लिया।एक घायल के मरने की खबर थी।डी एस पी से पुष्टी के लिए फोन लगाने ही वाला था कि एक शरारत सूझी और प्रशांत जी के नंबर में एक डिजिट बदल के कॉल लगा दिया।कॉल किसी लडकी ने लिया।चुंकी लैंडलाइन से कर रहा था सो शराफत से ’’सॉरी,रांग नम्बर’’ कहकर फोन रख दिया।दूसरे दिन,रात को बी.बी.सी. सुनने के बाद उस नम्बर पे फिर से कॉल किया।उसकी आवाज ने मुझे निशब्द कर दिया था।आत्मविश्वास से भरी आवाज थी।शायद पढ रही थी। मैं ’हेलो’ ही बोल पाया क्योंकि कोई खास तजुर्बा था नहीं।इस बार शरीफ बनने की बारी उसकी थी।आमतौर पर लडकियां उतनी भोली होती नहीं है जितनी दिखती है। उसने मातृभाषा में कहा कि ’’फोन रखिए,दिमाग मत खराब किजिए...किसी और का दिमाग खाइए’’।


                          22 अप्रैल 2004 को मेरे घर में जो कुछ हुआ था उसका असर अगली दो-तीन पीढी तक पडना तय है। कुछ लोग कहते हैं कि दुनिया का सबसे बडा बोझ बाप के कंधे पे बेटे की अर्थी है ठीक इतना ही नहीं तो इससे कम भी नहीं है जवान बेटा का जिन्दा रहते हुए अचानक से मरे जैसा हो जाना। बेटे का मरना और बेटे को मरा हुआ समझना दोनो दो चीज है।एक दर्दनाक इतिहास है जबकि दूसरा एक दर्दनाक इतिहास को घसीटते हुए वर्तमान तक लाना और वर्तमान का लगातार पल पल आगे खिसकते रहना। पारे की तरह पकड में न आना।पापाजी ‘बाइ पास‘ सर्जरी करवाकर लौट आए थे।लम्बे समय तक भगवान पर भरोसा कर उसे खुश करने के चक्कर में मां का स्वास्थ्य बिगडता गया और घर मेडिकल स्टोर बन गया था। ठीक इसी समय मेरा एक राष्ट्रीय प्रतियोगिता परीक्षा में अंतिम चयन होते होते रह गया था।मुसीबत एक साथ आती है ये मुझे तब ही पता चला था।सिरहाने में दो डायरी,मधुशाला,रेडियो और मोबाइल मेरे लिए नींद की गोली की तरह थी।अकेलापन का वो दौर बहुतडरावना और रोमांचकारी था।

                               मुझे पेन किलर की जरूरत थी सो मैंने उसे ‘पेन किलर‘ कह दिया था। क्या जाने किस वेश में नारायण मिल जाए! उसने कहा कि वह झाझा की रहने वाली है और पटना में पढाई कर रही है,गर्ल्स हॉस्टल में।लम्बे समय के बाद आखिरकार उसने मेरा आग्रह मानकर मेरी पूरी बात सुनी।शब्द दर शब्द। मेरा बेलेंस खत्म हो जाने पर उसने ‘कॉल बेक‘ किया और मुझे बोलने और बात खत्म करने का पूरा मौका दिया।ये बातें आधी रात को हुई थी और बातचीत के बाद जो नींद आई वैसी कई महीनो बाद तक नहीं आई थी। आपसी समझ से लक्ष्मण रेखा भी तय हो चुकी थी। हम दोनो एक दूसरे को आप कहते थे।वो अंतिम लडकी थी जिसे मैने आप कहा था। इसी बीच 10 दिसम्बर 2008 को मानवाधिकार दिवस पर मै एक कार्यक्रम में भाषण देने गया।मै उसे पल पल की खबर देता था।इससे मुझे खुशी मिलती थी। ये अलग बात है कि उसे सुनने के लिए हर बार मनाना पडता था। जब वह चिढ कर कहती कि उफ आप दिमाग क्यों खराब करते हैं ऐसा लगता था कि जिंदगी की तसल्ली मिल गई।गजब का पागलपन था। गांव में नेटवर्क डिस्टर्ब था और मेरा मुड खराब हो रहा था।मैने आयोजकों से अनुमती ली और नेटवर्क की तलाश में खूब दूर निकल गया।भुट्टे का खेत खत्म हो जाने के बाद नेटवर्क आया। संक्षिप्त बातचीत में इसबार उसने अपना दूसरा नम्बर भी दिया।वो किसी बात पर काफी खुश थी उस दिन शायद। हालांकि बात अब भी पहले की तरह होती थी।एक दिन उसने फोन पर कहा कि दैनिक जागरण का कोई पत्रकार उसे परेशान कर रहा है। लडकियां लडकों को टेस्ट करती है ये मुझे उन दोस्तों से पता चला था जिनके साथ मैं उन दिनों क्रिकेट खेलता था।सब के सब लव गुरू थे और शाम में लौटते वक्त एक दूसरे की उलझन सुलझाते थे।‘‘लडकी का बाप न माने तो उल्टा दहेज भिजवा कर उसे(लडकी)उठा लो‘‘ का डॉयलोग मैंने उन्हीं लोगों से सीखा था।खैर,मैने उसे फिलहाल बिहार राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष लेसी सिंह,पटना के सीनियर एस.पी,जागरण के बिहार ब्यूरो और टाइम्स ऑफ इण्डिया के अरूण कुमार,जो पी.यू.सी.एल. से भी जुडे थे,का नम्बर दे दिया और थोडा ’हवा-पानी’ भी दे दिया। लेकिन दवा रिएक्शन कर गया और शायद उस दिन के बाद से मुझे लेकर उसकी पहले वाली सोच नहीं रही मेरी सोच शायद गलत थी। कुछ बातें सच जानते हुए भी हम उसे सुनना नहीं चाहते और ना ही बरदाश्त कर पाते हैं।ऐसा ही एक सच यह भी था कि उसने मेरे गिडगिडाने (हां,गिडगिडाने) और मुझसे कई बार परेशान होकर उब जाने के बाद मुझसे छुटकारा पाने की उम्मीद में मुझसे उस रात बात की थी।


                      अगर आपके बेहद बुरे वक्त में पुरी दूनिया आपको अकेला मरने छोड दे और आप पसीने से लथपथ रो रोकर अपनी लडाई नास्तिक बनकर लड रहे हों और इसी बीच कोई आपसे सहानुभूति के दो शब्द बोल दे तब आपका उसके साथ जो रिश्ता बनेगा वही रिश्ता था मेरा उनके साथ।यही वो हद थी और मेरा उनके प्रति सम्मान था कि उनके बार-बार मना करने और धमकी देने-दिलवाने के बाद भी मै उन्हें कॉल और एस.एम.एस. करता रहा।वो कब पेन किलर से ड्रग्स बन गई पता ही नहीं चला।




              किस्मत में था खाली खप्पर,
              खोज       रहा था  मैं प्याला;
                         ढूंढ      रहा था    मैं मृगनयनी
                         किस्मत     में    थी मृगछाला;
             किसने अपना भाग्य समझने
             में    मुझ-सा    धोखा    खाया;
                         किस्मत में था अवघट मरघट,
                         ढूंढ     रहा     था      मधुशाला
                                                                 साभार-मधुशाला




                       किस्मत को न जाने किसने मेरे घर की सुपारी दे दी थी।किस्मत जब अपने पे आ जाती है तो क्रूरता नृशंसता और निर्दयता की सारी सीमा तोड डालती है।भैया एक बार अयोध्या में एक बाबाजी पर हाथ चलाने में इसलिए असफल हो गए थे क्योंकि पापाजी बीच में आ गए थे।बाबाजी का कसूर यही था कि भैया से बिना पूछे उसने लाल तागा बांधने के लिए उनका हाथ छू लिया था। ऐसा नास्तिक भी किस्मत के आगे ंझुक गया था और मंगलवार को हनुमान चालीसा पढना शुरू कर दिया था उस दौर में।बावजूद किस्मत ने उन्हें नहीं बख्शा था। ... बहुत बुरा वक्त था।सचमुच!


                        पेन किलर को भूलना आसान नहीं था लेकिन बेहद जरूरी था क्योंकि उन्होंने अब फोन लेना बंद कर दिया था और मेरी डोर कमजोर होती जा रही थी। जिस डोर का एक छोड वो पकडी थीं और मै जिसके सहारे अतीत के उस भूतहा कुंए से बाहर आ रहा था वह अब मुझसे छूटने लगा था। मेरे बस में कुछ नहीं था।जो कुछ था वो किस्मत और पेन किलर के बस में था। हम तीनों एक सीध में थे और वो मेरे और किस्मत के बीच में थी।उसे इसका आभास नहीं था।उसने आभास दिलाने का मौका भी नहीं दिया।हमारे बीच जो चीजें होती थीं उसमें फोन पर मेरा मधुशाला सुनाना,उसकी सहेलियों का मेरा मजाक बनाना यादगार रहेगा।उसे परेशान न करूं इसलिए डाकघर से छह सौ रूपया निकालकर एक आई पॉड लिया और शाम के समय खेत के चौड में अकेला सुनता।पूरा चीप जगजीत सिंह और चित्रा सिंह की गजलों से भरा था।महीने भर भी नहीं चल पाया था वो आई पॉड और मुझे फिर से नया लेना पडा था।ये सब कीमत उसे भूलाने की थी।


                   दिल्ली आने से पहले के इतिहास को बिहार में ही छोडने के दृढ निश्चय के साथ पटना-दिल्ली राजधानी पे चढा।मन भारी था क्योंकि एक लडकी को परेशान करने का अपराधबोध से चाहकर भी छुप नहीं पा रहा था। बेगूसराय से पटना तक में उससे बात करने का भरसक प्रयास किया लेकिन उसने न फोन लिया और न ही मेसेज का रिप्लाय किया पहले की तरह।


                           दिल्ली आकर काफी बिजी रहने लगा।लेकिन घर का टेंशन झोंके की तरह रह-रह कर आ ही जाता था। इसी तरह एक दिन एक झोंके ने मुझे उसकी याद दिला दी।रात के कोई बारह बज रहे होंगे।एफ एम पे कुर्बान मूवी का वही गाना आया जो पेन किलर का कॉलर ट्रयून तब था जब उनसे बात होती थी।जिस मोबाइल से एफ एम सुन रहा था उससे ही कॉल लगा दिया उसे।जैसी अपेक्षा थी वैसी ही बात हुई।राम सलाम। उसने कहने का मौका फिर नहीं दिया।कभी देगी भी नहीं शायद!


              कितने मर्म जता जाती है
              बार-बार     आकर    हाला,
                                  कितने भेद बता जाता है
                                  बार-बार   आकर   प्याला,
             कितने अर्थों को संकेतों
             से बतला  जाता   साकी
                               फिर भी     पीनेवालों को है
                               एक        पहेली    मधुशाला.
                                                                  साभार-मधुशाला.






































































No comments:

Post a Comment