Friday, October 1, 2010

                                                इस मोड़ से जाते हैं कुछ सुस्त कदम रस्ते

"ये आदतें भी बड़ी अजीब होती हैं । ये भूलना भी तो एक आदत है और हाँ याद रखना भी एक आदत । खासकर जब आप याद रखना चाहो तो भूल जाते हो" कॉफी के नन्हे नन्हे घूँट लेता हुआ मैं मुस्कुराते हुए बोला ।
वो मेरी आँखों में निहारते हुए बोली "अच्छा वो कैसे ?" कॉफी के कप को उस लॉन की दीवार पर रखते हुए मैं बोला "ह्म्म्म्म्...जैसे मैं याद रखने की कोशिश करता हूँ कि तुम्हारी आँखें मुझे कुछ याद दिलाना चाहती हैं लेकिन मैं भूल जाता हूँ ।"
-अच्छा उठो यहाँ आओ देखो....
-"क्यों?" वो लॉन में कुर्सी पर बैठी हुई बोली
-अरे आओ ना
-अच्छा ठीक है, लो आ गयी

-मैं हाथ से इशारा करते हुए बोलता हूँ "वो देखो दूर पहाडी के मोड़ को देख रही हो"
-हाँ देख रही हूँ
-कितनी खूबसूरत जगह है ना
-हाँ तो
-लेकिन
-लेकिन क्या ? अरे बुद्धू उस मोड़ का इस बात से क्या मतलब ?
-मतलब तो है । देखो मैं वहाँ बैठे हुए हर आने जाने वाले जोड़े को देख रहा हूँ और याद रखने की कोशिश कर रहा हूँ कि इनमें से पिछली साल भी हमें कौन कौन यहाँ मिला था ।

-अच्छा तो कुछ याद आया
-ह्म्म्म्म्म...हाँ मैं क्या सोच रहा था कि
-"क्या ? क्या सोच रहे थे आप" वो मुस्कुराती है । मेरी आँखों में शरारत देखती है । हाँ-हाँ बोलिए क्या सोच रहे थे आप ?
-ये मोड़ बड़ा प्यारा है ना । ये बारिश की हल्की फुहार ।ये रोमांटिक मौसम । ये प्रेमी, ये प्यार करने वाले,ये चाहने वाले । उस मोड़ पर कितनी बार बैठते हैं ।
-ह्म्म्म्म्म....सो तो है ।
-मैं उसके गले में बाहें डाल कर बोलता हूँ "अच्छा तुम्हें नहीं लगता कि वहाँ अपना एक छोटा सा नन्हा मुन्हा सा रेस्टोरेंट हो । जहाँ प्यारी-प्यारी कॉफी मिले । उन्हें वहीँ खुले में नन्ही-मुन्ही पड़ती हुई फुहारों के नीचे बैठे हुए, आसमान के नीचे, उस रूमानियत को महसूस करते हुए वो कॉफी के घूँट भरे और हाँ फूलों की दूकान भी ।
-वो क्यों ?
-अरे वो इस लिए कि गुलाब लेने के लिए कहीं और नहीं जाना पड़ेगा न ।


-तुम भी ना पता नहीं क्या क्या सोचते रहते हो
-नहीं सच्ची मुच्ची । काश कि ऐसा हो । हम यहाँ इन पहाडों की इस पड़ती हुई बारिश के बीच, ठंडी-ठंडी चलती हुई हवा, उफ्फ...हूहूहू...कपकपाने वाली सर्दी और दो प्रेमी लोग बाँहों में बाहें डाले घूमते हुए, एक दूसरे से इजहारे मोहब्बत करते हुए । शादी के 2 साल बाद, 5 साल बाद, 50 साल बाद भी
-वो हंसने लगती है "अच्छा मिस्टर रोमियो, खयाली बातें बनाना छोडो ।

-सच में ऐसा हो तो क्या हो ।
-अच्छा तो हमारे बच्चे क्या करेंगे
-क्या करेंगे क्या ? पढेंगे लिखेंगे और क्या
-रहने दो तुम्हारे होते हुए तो पढ़ लिए
-क्यों मेरे होते हुए क्यों नहीं पढेंगे
-और नहीं तो क्या, तुम बस ऐसी ही बातें करते रहोगे ।
-अरे नहीं में बिलकुल सख्त डैडी बनूँगा ।
-जाओ जाओ बन गए सख्त डैडी
-अच्छा कोई नहीं, तुम हो ना तुम तो ठीक से पढाओगी उन्हें ।
-हाँ बस सब में ही करुँगी ना । तुम खुद कुछ मत करना ।
-अरे मैं करूँगा ना, तुम्हें ढेर सारा प्यार और हाँ कॉफी बनाकर भी पिलाऊंगा, और हम उस मोड़ पर भी जाया करेंगे....

और हम उस मोड़ पर खुद भी उस बारिश, वो हल्की-हल्की रूमानियत भरी ठंडी ठंडी हवा, उस खुले आसमान के तले रोजाना बैठा करेंगे, कॉफी पियेंगे ।
-जाओ जाओ रहने दो, मिस्टर रोमांटिक
-अच्छा सुनो
-ह्म्म्म्म बोलो
-मुझे कुछ याद आया
-क्या ?

             
मैं उसके कानों में रूमानियत भरे अंदाज़ में कहता हूँ "आई लव यू" । वो खुश हो जाती है । उसके गले में बाहें डाले हुए बोलता हूँ "अच्छा चले उस मोड़ पर कुछ देर बैठ कर आयें "
-नहीं बारिश हो रही है । अभी अभी तो वापस आये थे ।
-अरे एक बार और
-नहीं
-अरे हाँ
-ह्म्म्म्म
-अरे हाँ हाँ

वो हंसने लगती है । फिर हम उस मोड़ पर ठंडी ठंडी हवा और पड़ती हुई बारिश की फुहारों के तले बैठे हुए हैं.....

                                                                                                      साभार : अनिल कान्त

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