Monday, August 30, 2010

                                    दूसरी हरित क्रांति से पहले दूसरा मेक्सिको का खतरा .



योगेश कुमार शीतल
रसायन व उर्वरक राज्य मंत्री श्रीकांत कुमार जेना ने राज्यसभा में एक सवाल के लिखित जवाब में माना है कि उर्वरको पर दी जा रही अप्रत्यक्ष सब्सिडी का कृषि उत्पादकता पर कोई खास प्रभाव नहीं पर  रहा है.2001-02 की तुलना में 2009-10 में उर्वरक सब्सिडी लगभग चार गुनी बढाई गई लेकिन खाद्यान्न में केवल 64 किलो  प्रति हेक्टेयर की बढ़ोत्तरी  ही  हो पाई.2001-02 में उर्वरक सब्सिडी 12695.02 थी तब उत्पादन 1734 किलो प्रति हेक्टेयर हुआ था वही 2009-10 में उर्वरक सब्सिडी 64034.29 करोर कर दी गई लेकिन उत्पादन 1798 किलो प्रति हेक्टेयर ही हो पाया.ध्यान रहे कि देश  में आज कल दूसरी हरित क्रांति लाने की बात निकल कर दूर तलक जा चुकी है और संभावना ये व्यक्त  की जा रही है की सरकार जल्द ही उर्वरको पे दी जा रही सरकारी सहायता समाप्त कर सकती है.बाद में कचरा न हो इसीलिए सरकार ''सेल्फ डिफेंस '' का जुगार बैठा रही है,मंत्री जी का बयान भी इसी सोच से प्रेरित है.
                भारत सरकार के इस कदम का दूरगामी प्रभाव जानने के लिए मेक्सिको का उदाहरण सटीक रहेगा क्योंकि मेक्सिको ने 1980 के दशक में ठीक यही किया था जो भारत करने को उतावला हुआ जा रहा है.मेक्सिको के आहार में मक्के से तैयार होने वाली रोटी या तारतिला का महत्वपूर्ण स्थान  है.वहा के किसान परंपरागत रूप से मक्का उगते रहते है.1980 के दशक में मेक्सिको का विदेशी कर्ज बढ़ गया तो अंतररास्ट्रीय वित्तीय संस्थानों ने सहायता देने के लिए शर्त लगाई की मेक्सिको की सरकार मक्का उत्पादक किसानो को सरकारी सहायता देना बंद करे.सरकार ने इस शर्त को स्वीकार कर लिया .इससे किसानो कि कठिनाइया  बढ़ी  1994 में उत्तरी अमेरिका मुक्त व्यापार समझौता (नाफ्टा) लागू हुआ.अब अमेरिका में सरकारी सब्सिडी के कारण सस्ते मक्के बड़ी मात्र में मेक्सिको के बाजार में झोक दिए गए.धीरे धीरे मेक्सिको के बाजार में अमेरिकी मक्का छा गया,जिससे स्थानीय किसान गंभीर आर्थिक संकट में फस गए .मक्के कि सरकारी बिक्री बंद हो गई और यह काम बहुरास्ट्रीय कंपनिया करने लगी.कंपनियों का लाभ तेजी से बढ़ने लगा जबकि लाखो किसान खेती छोड़कर  मजदूर बन गए.चूकि
तारतीला उत्पादन पर बहुरास्ट्रीय कंपनियों का एकाधिकार हो गया था इसलिए उसके दाम बढ़ने शुरू हुए.2007 में जब कच्चे तेल की कीमते बढ़नी शुरू हुई तो अमेरिका में मक्के का उपयोग जैव इंधन के लिए किया जाने लगा.  इससे खाद्यान्न के रूप में मक्के कि कीमत तेजी से बढ़ी जिसका भरपूर फायदा बहुरास्ट्रीय कंपनियों ने उठाया.आत्मनिर्भर मेक्सिको धीरे धीरे अमेरिका पर निर्भर हो गया और वहा के निवासी आयातित मक्के से बने महगे तारतीला खरीदने को मजबूर हो गए.जिन लोगो में महगा तारतीला खरीदने कि सामर्थ्य नहीं थी वे भुखमरी के शिकार हो गए.
             यह अब मानी हुई बात हो चूकि है कि मनमोहन काल में ''आम पीपल'' बकरी कि पूंछ बन चुके है जो न इज्जत ढक पा रही है और न ही मख्खी भगा पा रही है .तब नाफ्टा था अब साफ्टा है.कथित सब्सिडी कहिये या मांग जनित  मुद्रास्फीति की रफ़्तार लेकिन सच यह हे कि चेन्नई के लिए पंजाब के गेहू से कही सस्ता विदेश का गेहू है.विदेश में गेहू कि कीमत 170 से 200 डॉलर के आस पास है.भारत की धरती तक आने में विदेशी गेहू 10-11  रूपये प्रति किलो हो जाता है जबकि पंजाब से चेन्नई भेजे जाने पर गेहू की ढुलाई ही 13-14 रूपये प्रति किलोग्राम पड़ती है .नतीजा ये होता है कि दक्षिण भारत की आटा मिले  पंजाब या हरियाणा से गेहू मांगने के बजाय आयात करना बेहतर समझती है और उनके हिस्से का आटा सड़ता है.जब दुर्गन्ध से परेशान हो कर उच्चतम नयायालय उन खाद्यान्नो को गरीबो में मुफ्त बांटने को कहती है तो कृषि मंत्री भभक जाते है.
            कुल मिलाकर मै यह मानता हूँ  कि सरकार का विदेशी पूंजी निवेश को कृषि क्षेत्र में अनुमति देने का विचार और उर्वरको पर अप्रत्यक्ष सब्सिडी हटाने कि घुपचुप रणनीति विकास दर को कितना फायदा पहुचायेगी पता नहीं लेकिन किसान तड़प तड़प के मरेंगे और आत्महत्या का जो अधिकार आज झारखण्ड का एक वर्ग मांग रहा है वही कल  चम्पावती और कलावातियो का 'कमानेवाला' मांगेगा.राहुल गाँधी को अभिनय की कला का बेहतरीन नमूना तो तब दिखेगा!     
              

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