Thursday, August 19, 2010

                                 दूसरी हरित क्रांति से किसका फायदा




योगेश कुमार 'शीतल'


           छन के खबर आई है कि भारत सरकार जल्द ही हरित क्रांति का ''रीमिक्स वर्जन ''यानि की दूसरी हरित क्रांति की तयारी में है.खबर का एक "फोलोअप" भी आया है कि सरकार जल्द ही खुदरा बाजार  में प्रत्यक्ष विदेशी  पूंजी निवेश को अनुमति देने पे विचार कर रही है. 2004-05 में कृषि क्षेत्र में ऍफ़ .डी आई  174.08 करोर,2005-06 में 182.94 करोर,2006-07 में 441 करोर,2007-08 में 632 करोर और 2008-09 में 462 करोर था.सरकार इस ग्राफ को मजबूत तर्क के रूप में मानती है और निजीकरण को अमादा सरकारी सलाहकारों ने देश को दूसरी हरित क्रांति के सपने दिखाने शुरू कर दिए है.  इधर विश्व में गेहू का तीसरा सबसे बड़ा निर्यातक  देश रूस के खाद्यान्य संघ ने कहा है कि वह इस बार अंतरास्ट्रीय बाजार में गेहू के निर्यात में भारी कटौती करने जा रहा है.संघ के अनुसार रूस ने पिछले साल 21.4 मिलियन टन गेहू का  निर्यात किया था जो कि इस साल घाट कर १५ मिलियन टन हो सकता है.संघ ने इसका कारन भारी वारिस और सुखा को बताया है.गेहू विश्व में तीस फीसदी लोगो का मुख्य भोजन है .भारत में  गेहू मुख्य खाद्यान्य है.इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि २००७-०८ के दौरान उत्तर प्रदेश में २५.६८ मिलियन टन गेहू ,पंजाब ने १५.७२ मिलियन टन गेहू और हरियाणा ने १०.२४ मिलीअन टन गेहू का उत्पादन किया था.
                    रुसी खाद्यान्य संघ के बयान के बाद भारत सरकार ने भी गेहू के निर्यात को न करने का अंतरिम फैसला लिया है.२००७ में अनाज के दाम बढ़ने पे सरकार ने गेहू के निर्यात पे रोक लगाई थी और ये दो वर्सो तक रही.ऐसे  में ये स्पस्ट हो चूका है कि भारत अनाज के मामले में दरिद्र होता जा रहा है.बावजूद इसके सरकार दूसरी हरित क्रांति कि बात कर रही है. 
                     यह शुद्ध भ्रम है कि साठ के दशक में हुई हरित क्रांति का देश में लम्बे समय तक अच्छा प्रभाव रहा.सच और केवल सच यही है कि हरित क्रांति से खेती में अंधाधुंध उर्वरको के उपयोग से जल स्तर में गिरावट के साथ मृदा कि उर्वरता भी प्रभावित हुई और एक समय के बाद खाद्यान्य उत्पादन न केवल स्थिर हो गया  बल्कि प्रदूसन में खतरनाक बढ़ोत्तरी हुई.गाय को रोज  भोर में सुई देकर दुहने वाले इसे बेहतर समझेगे.हरित क्रांति ने किसानो का रुख जैविक खाद से रासायनिक खाद कि तरफ मोर दिया. रासायनिक खाद,बीज व कित्नाशाको के प्रयोग से उत्पादन में खूब उछाल आया लेकिन एक सीमा  के बाद उस पे बढती लागत से किसानो पर आर्थिक दबाव बढ़ने लगे.दबाव और चुनौतियों से प्रतिस्पर्धा में साग रोटी खाने वाले किसान धीरे धीरे सूखते गए और आत्महत्या का विकल्प चुन लिया.जो बचे उन्हें सरकार ने क्रांति के नाम पे खूब चूसा.संकर बीज किस्मे,रासायनिक उर्वरको,नै तकनीक और मशीनों ,रासायनिक उर्वरको जैसे यूरिया,डी.ए.पी,कितानिनाशक,खरपतवार नाशक से जमीन को पाट दिया गया.देहात में किसान बर्बाद होते रहे आखिर में उनके मनोभाव वही हो गए कि बलात्कार को रोक नहीं सको तो उसका मजा लेना शुरू कर दो.जल्दी ही किसानो का यह वर्ग मुनाफा बना कर दूरदर्शी नजरिये से अपना भविष्य  देखा और कृषि  क्षेत्र  को ''बाई-बाई'' कर दिया.जो किसान बचे है उनकी जान किस्तों में जा रही है.
                     वैसे कान में कहने वाली बात ये है कि सरकार सबकुछ कब का जान चुकी थी.तभी तो 1979 में सरकार ने ''खाद्यान्य बचाओ कार्यक्रम'' शुरू किया था,जिसके तहत किसानो में जागरूकता पैदा करने एवं उन्हें सस्ते दामो पर भण्डारण के लिए टंकिया उपलब्ध करने का लक्ष्य था.साथ ही कार्यक्रम के तहत देश भर में 50 क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक स्थापित   करने कि बात कही गई थी.लेकिन अब तक इन बैंको कि स्थापना संसाधनों कि कथित कमी के कारन नहीं हो पाई  है. दिलचस्प है कि 1990-2010 के बीच पंजाब सरकार ने मंडियों में सरकारी खरीद के कमीशन के तौर पर 6800 करोर रूपये चुकाए है.उसी पंजाब में समय से उठाव न होने के कारण 2 से 8 साल तक  गेहू सरता रहता है.जितने पैसे पंजाब ने दिए उतने में छत हो जाती.
                     सरकारों  ने तो असंगठित किसानो को जम के दुहा ही,बाजार को दुहने को छोर दिया.
मसलन,1990 के दशक  में कृषी ऋण का समीकरण ऐसे बदला कि कृषि क्षेत्र गिर कर तेजी से लुढ़कने लगा .जिसके बाद 1990 के अंत में या यु कहे 2000 के शुरुआत में ''सुक्खी  लाला'' टाइप  के जमींदारो ने किसानो को बैशाखी दी.बैशाखी के सहारे कोई खरा भले ही हो जाये दौर नहीं सकता .''ओल इंडिया डेब्ट एंड इन्वेस्टमेंट'' के अनुसार 1992 में कृषि क्षेत्र में सरकारी ऋण 64 फीसदी थी  जो 2003 में घटकर 57 फीसदी रह  गई .इधर सुक्खिलालाओ के कर्ज की राशी 10.5 फीसदी से बढ़कर 19.6 यानि कि दुगुनी हो गई,हलाकि वाणिज्यिक बैंको और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंको ने कुछ हद तक किसानो को आकर्षित करने का सफल प्रयास किया .2000 में जहा ये बैंक कुल ऋण का 30.1 प्रतिशत कृषी क्षेत्र को दिए थे ,वह 2007 में बढ़कर 52 प्रतिशत हो गया .
                             यही वो समय था जब सरकार की  नीतियों ने किसानो के लिए नई  चुनौतिया को जन्म दिया.भारतीय रिजर्व   बैंक के पूर्व गवर्नर वाई.एस.रेड्डी के अनुसार बीते समय में क़र्ज़ का तरीका बदला है.मसलन,पहले किसानो को सीधे क़र्ज़ दिया जाता था अब उसे अप्रत्यक्ष भी बनाया गया .कृषि से जुरे उत्पाद   ,कृषि क्षेत्र में काम करने वाली कंपनियों,सप्लायर्स आदि को सरकार ने कम व्याज पे कर्ज देना शुरू किया.नतीजा यह हुआ कि महानगरीय बैंक जो कृषि ऋण पे पीछे थे,उछल पूछल के तेज दौर लगाई .1995 से 2005 के बीच जहा शहरी बैंको ने 16.3 फीसदी ऋण  दिया वही महानगरीय बैंको ने 30.7 फीसदी दिया.बैंको कि महानगरीय शाखाओ ने 1995 में जहा 7.3 फीसदी भागीदारी दी थी,2005 में बढ़कर 19 फीसदी हो गई.हलाकि 2006 और 2008 मंदी का दौर रहा फिर भी कृषि क्षेत्र का एक तिहाई क़र्ज़ 2008 में बांको की महानगरीय शाखाओ ने दिया .दूसरी ओर ग्रामीण क्षेत्र के बांको ने 1995 में 83.7 फीसदी के आंकरे  से 2005 में 69.3 फीसदी के अन्करे पे पहुच गए.सवाल उठाया जा सकता है की पैसा बरा बैंक दे या छोटा क्या फर्क परता है ?परता है.हम बारह रूपये में एक किलो मकई खरीदते है अपने गाँव में और अपने ही मकई का बना ''बिंगो'' और कुरकुरे चुन्नू-मुन्नू के लिए लेते है 15 रूपये में 100 ग्राम ,माफ़ कीजियेगा,100 ग्राम में 25 परसेंट मुफ्त.दरअसल कृषि उत्पाद के नाम पर फायदा उठाने वाले लोग उतने ही देर के लिए किसान है जितने देर के लिए बाराबंकी ज़मीन मामले में अमिताभ बच्चन किसान थे.ये तो पूंजीवादी है,कट्टर पूजीवादी,आवारा पूंजीवादी,अश्लील पूंजीवादी .इन्हें विदर्व में मरने वाले सच्चे और इमानदार किसानो से कोई लेना देना नहीं है.इन्हें तो बस दूसरी हरित क्रांति का इंतजार है जो सरकार लाने वाली है.यह भी बता दे की जिस खेती का सकल घरेलु उत्पाद में कभी 50 फीसदी से ज्यादा योगदान हुआ करता था,वह पहले घट कर 30 फीसदी हुआ और अब वह गिरकर 20 फीसदी से भी निचे चला गया है.ऐसे में दूसरी तथाकथित हरित क्रांति से किसका फायदा होगा आराम से समझा जा सकता है.

3 comments:

  1. nice attept yaar. ithink u get throgh a detail study on d subject ni m completely agree with u. as a student of bio i can say ur r making a sense

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  2. acha likha hai aur bhartiya krishi vaastav me pichad rhi hai aur iske liye ek bahut gambheerta se aage karyon ki aavshyakta hai

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  3. aapne hamari krishi vyavastha ki kafi barkai se padhai ki hai aapne jo likha use padhkar mera nazariya aur gyan aur bhi vyapak hua hai dhanyawad

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