Saturday, August 22, 2015

दीदार-ए-मुंबई



                               हमारा बीजेपी-कांग्रेस हो जाना


बहुत बाद में महसूस हुआ कि हम और वो बीजेपी और कांग्रेस बन गये हैं. यह कहना ज्यादा सही होगा कि हम बीजेपी के अध्यक्ष हो चुके हैं और वह कांग्रेस की अध्यक्ष हो चुकी हैं.

यानि कि अब हमारे कार्यकर्ता दल-बदल कर सकते हैं, लेकिन हमपर और उसपर इतना अधिक नैतिक दबाव होगा कि हम अब एक दूसरे की न तो कभी प्रशंसा या सराहना करेंगे और न ही आपस में एक दूसरे से अधिकारिक तौर पर सहमति जताएंगे.

ऑफिस पॉलिटिक्स में कई अध्याय होते हैं. हर अध्याय के सवालों को हल करने के सूत्र भी अलग-अलग होते हैं. किसी और अध्याय का सूत्र किसी दूसरे अध्याय में लागू करने से सवाल और भी जटिल और उलझ जाता है.

हमारा बीजेपी और कांग्रेस बनना एक लंबी प्रक्रिया के बाद हुआ.

इस प्रक्रिया की शुरुआत वैसे ही हुई जैसे अन्य किसी विवाद की होती है. एक मिसअंडरस्टैंडिंग.

अगर आप अपनी सही को अपनी गलती मानकर बात सामान्य करने की कोशिश करते हैं तो आप उस समय एक बड़ी गलती कर रहे होते हैं.

मजाक में कही गई एक बात उसे लग गई. माहौल को अप्रत्याशित होने में उतना ही समय लगा जितना पांचवे फ्लोर से चौथे फ्लोर तक सीढ़ी से आने में लगता है. बात रॉकेट की गति से उस ठोस को भेद गई जो बनते-बनते बनी थी.

जब आप मजबूत स्थित में होते हैं तो आपको कभी सुलह के लिए स्वयं आगे आने की जरूरत महसूस नहीं होती है. आप महसूस करते हैं कि चीजें सही है और ऐसी ही होनी चाहिए. चीजें ऐसी ही बनी रहे यह कामना होती है और आप एक तरह की मजबूती महसूस करते हैं.

एक दफ्तर में संख्यां बहुत मायने रखती है. यह संख्यां उतनी ही निर्णायक होती है जितना कि किसी पार्टी के शीर्ष नेता के लिए जनाधार. जनाधार की सर्वमान्य आवाज भले ही दिखती हो लेकिन जनाधार की परिधि के अंदर आम सहमति जैसी कोई चीज नहीं होती है.

जनाधार के खिलाफ चलते हुए कुछ महीने बीतने के बाद पूरा विषय इतना कठोर हो गया कि अब इसपर बस चोटकर के इसकी टंकार सुनी जा सकती थी, होना कुछ न था.

आखिरकार कार्यकर्ताओं को रिझाने का प्रयास शुरू हुआ जिसने यह तय कर दिया कि अब हम बीजेपी और कांग्रेस बनकर ही रह पाएंगे.

अब हम एक-दूसरे की प्रशंसा नहीं सुनना चाहते. एक-दूसरे को देखकर निर्जीव सा बर्ताव करते हैं. मौका ढ़ूंढ़ने लगे हैं अब हम दोनों. एक-दूसरे की खुशी भाती नहीं अब. चीजें हावी हो चुकी हैं बुरी तरह और इतना तय है कि इतना लिखते वक्त भी उसका असर कहीं न कहीं किसी पंक्ति में या किसी शब्द में जरूर हुआ होगा.


Thursday, August 6, 2015

पीपली लाइव II


                                   आवश्यकता है एक पीड़ित की
                                                                           

अजमेरा कुछ दिनों से मलाड वाले पुराने फ्लैट को छोड़कर दूसरे फ्लैट में आ गये हैं. पहले वाले फ्लैट में वह तीसरे मंजिल पर रहते थे, जहां ओबी वैन का केबल ले जाने में समय भी लगता था और ओबी को पार्किंग में भी दिक्कत होती थी. इस कारण एक चैनल के प्राइम टाइम में वह दिखते देखते रह गये.

नया वाला फ्लैट अच्छा है. ग्राउंड फ्लोर में एक कमरा है, जहां झूला लगा हुआ है. साठ मीटर के केबल के बजाय अब मुश्किल से तीन-चार हाथ केबल लगता है. खिड़की के इस पार ओबी वैन और खिड़की के उस पार से सोफे पर बैठकर किर्ती अजमेरा जी. बारी बारी से हर चैनल को बताते हैं कि उन्हें सरकार ने एक रुपया भी मुआवजा नहीं दिया.

दो से तीन रिंग में फोन उठता है. उधर एक महिला फोन लेती हैं. वह महिला अजमेरा जी की बेटी या बहु हैं. आठ से नौ. आठ से नौ तो आईबीएन को दिया है. देखिए न बस दस मिनट. ओके आप शुरू में लेने वाले हो या अंत में. बस हेडलाइन है यह समझ लीजिए. ओके आ जाइए.

फ्लैट के बाकी लोग ओबी को पास से देखते हैं. ऊपर छाता उठा हुआ है. जेनरेटर आवाज कर रहा है और अंदर लगे मोनीटर पर कुछ-कुछ दिख रहा है. श्रीहरिकोटा से पीएसएलवी लॉन्च होते वक्त बिहार के किसी गांव में दूरदर्शन पर लाइव देखने वाले चाचा की तरह ही इनके चेहरे पर भी कौतुकता है. रोमांच है. उत्सुकता है. उथल-पुथल है.

कुल मिलाकर 257 मृतकों की आवाज बनकर उभरे अजमेरा जी
सर राजदीप सरदेसाई लाइन पर हैं.
लेकिन टाइम तो आपने हमें दिया था.
अर्रर्रर्र...सर फोन मत लीजिए आपको फ्रेम में काटा हुआ है. इधर नहीं कैमरे की तरफ देखिए. हां ठीक है.

“नौ बजे वाले में पैनल पर और कौन कौन हैं”, घरेलू परिधान में पास बैठी नवविवाहित महिला का सवाल है.

चैनल वाले ने चालाकी दिखाते हुए बोला शायद प्रशांत भूषण हैं.

महिला के चेहरे पर घिरनी नाची, भाव छुपाया लेकिन छुपा नहीं. टाइम फाइनल हो गया. दूसरे चैनल का बंदा हाथ मलता रह गया. अगर उसने भी झूठ बोल दिया होता कि उसके पैनल में राम जेठमलानी हैं तो अजमेरा जी उसके चैनल पर होते अभी. पहला वाला अनुभवी निकला. बस एक बार फ्रेम में कट जाओ अजमेरा जी, फिर पता चलेगा पैनल पर रामखेलावन है या नटवरलाल!

शो शुरू.
“सो मिस्टर आजमेरा, डू यू....”
“देखिए ये तो...लेकिन अबतक एक रुपया भी नहीं मिला....लेकिन अब तक....लेकिन अब...”
परदा गिरता है.
“सीडी याद करके दे दीजिएगा” नेपथ्य से आवाज आती है.

परदा गिरता है!

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तमाम चीजों को सामने रखकर अगर विश्लेषण शुरू किया जाए तो यकीनन वह विश्लेषण अपने निष्कर्ष तक पहुंचने से चूक जाएगा.

जिस वक्त याकूब मेमन की पुनर्विचार याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय आना था, उसी वक्त नेस्ले और खाद्य नियामक के वकील बॉम्बे उच्च न्यायालय में अपनी दलील पेश कर रहे थे, ठीक उसी वक्त मनी लाउंड्रीरिंग के मामले में गैर जमानतीय वारंट के लिए प्रवर्तन निदेशालय बॉम्बे के एक विशेष अदालत का दरवाजा खटखटा रहा था और उसी वक्त सलमान खान हिट एंड रन मामले में सत्र न्यायालय में बतौर विशेष लोक अभियोजक प्रदीप घरत एक दिलचस्प खुलासा कर रहे थे.

सभी राष्ट्रीय समाचार चैनल के कम से कम एक और अधिक से अधिक तीन रिपोर्टर कोर्ट परिसर में मोर्चा संभाले हुए थे.

अफरातफरी मीडियावालों की नियमित जीवनशैली का एक हिस्सा बन जाता है. अगर वह मुंबई में किसी राष्ट्रीय चैनल का क्राइम रिपोर्टर हो तो फिर कहना ही क्या!

मुंबई की बारिश भी ब्रेकिंग न्यूज होती है.

इस बीच अगर रिपोर्टर को तत्काल 1993 के केिसी ब्लास्ट से अचानक इंटरव्यू करने के लिए कहा जाए तो वह सबसे पहले मार्केट में उपलब्ध प्रोडक्ट को पटाता है.

आजमाया हुआ प्रोडक्ट में जोखिम कम रहता है.

सबकुछ एक प्रोडक्ट है. कमोडिटी है. रेट है. डिमांड है. सप्लाई चेन है. मार्केटिंग है.

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और अंत में आपके लिए एक दिलचस्प फोन बातचीत छोड़ रहा हूं...आधे घंटे के पचास हजार...नीचे दिए लिंक पर क्लिक कीजिए

Money hai to byte hai...

Saturday, June 20, 2015

समय से संवाद



                                               रहें न रहें हम...


कामिनी को उसका पिता पुचकारते हुए समझाता है कि वह उसकी भलाई के लिए ही वैसा कह रहा है. वह आगे कहते हैं कि बादल अगर निकम्मा न होता तो वह उसको उसके गले बांध भी देता! 

यह मिलाजुला कर वैसे ही है जैसे फिल्म कयामत से कयामत तक में जब जूही चावला और आमिर खान भागकर एक पहाड़ की चोटी पर रहने लगते हैं तो मौका पाकर जूही चावला का पिता वहां जाकर जूही चावला को अकेले में बहला लेता है.

हालांकि ऐन वक्त पर आमिर खान के परिवार वाले के वहां आ जाने के कारण कहानी कुछ और हो जाती है लेकिन तबतक जूही चावला बहल चुकी होती है.


आरजू फिल्म का एक दृश्य
इऩ सब दृश्यों की चर्चा करते हुए ध्यान आता है कि तुम्हारे बड़े पापा ने तुमसे कहा था कि अगर मैं बैंक पीओ होता तो वह रिश्ते के लिए मान जाते!

लड़कों पर हमेशा लड़कियों को बहलाने के आरोप लगते रहे हैं लेकिन हिंदी फिल्मों में अबतक शायद ही ऐसी कोई कहानी बनी है जिसमें बहलाने की भूमिका में कोई हीरो रहता हो, अक्सर घरवाले ही रहते हैं. चाहे वह सुपरहिट रही फिल्म धड़कन हो या फिर ब्लैक एंड व्हाईट में दिलीप कुमार की आरजू या कयामत से कयामत तक.

बादल अपनी भाभी द्वारा दी गई खाने की थाली से जब एक निवाला मुंह तक लाता है तभी उसका जमीर उसे धिक्कारने लगता है और वह तीन सेकंड तक निवाला होठ के पास रखकर उसे वापस नीचे पटकने की शैली में रख देता है.

दर्द के कई रूप हैं. दर्द अथाह है. अनंत है. असीम है और असीमित है. लेकिन जो दर्द दो आत्माओं के एक दूसरे से अलग होने में है वह अवर्णित है. 

कोई पौधा अगर खिड़की के छड़ या किसी रस्सी के सहारे लंबा होता है तो उसकी कुछ रेशाएं उससे लिपटती जाती है. मसलन कद्दू, खीरा, तरबूज या फिर कोई भी लत्ती. ऐसे पौधों की लत्तियों को जब सहारे से हटाया जाता है तो वह टूट जाती है या फिर अलग होने पर भी अपना आकार नहीं छोड़ती है. इसे हटाने के लिए अतिरिक्त सावधानी की जरूरत होती है. 

प्यार ऐसा ही एक पौधा है जो परस्पर होता है.

इसके अलावे एक और चीज है जो दिखती है. प्यासा और आरजू में एक चीज कॉमन है कि हीरो के मर जाने का भ्रम अन्य किरदारों को होता है. प्यासा में इसे बहुत ही मार्मिक तरीके से चित्रित किया गया है. रेल के ट्रेक में पैर फंसे होने के कारण एक भिखारी ट्रेन से कट जाता है लेकिन सबको भ्रम होता है कि गुरूदत्त जो कि एक शायर है, वह कटकर मर गया है. 

उसकी शायरी के फिर चर्चे होते हैं और फिर वह उभर कर छा जाता है. इस तरह ताउम्र जिल्लत से जीने के बाद उसे राहत मिलती है लेकिन तबतक वह जिंदगी से पूरी तरह रूठ चुका होता है और एक कोठेवाली के नाम अपनी जिंदगी कर देता है.

समय एक बेहद बेवफा चीज है जो किसी का नहीं रहता. बादल की चिट्ठी उसकी कम्मो तक पहुंचने से पहले एक सिगरेट जलाने के काम आती है. यह सिगरेट और कोई नहीं बादल का भाई ही पी रहा होता है और पहले कश के बाद वह बादल के मर जाने का जिक्र करता है.

ठाकुर की कामिनी से शादी हो जाती है. बादल कामिनी और गांव वालों के लिए मर चुका है.

वह कामिनी जो बादल को एक दिन सूटबूट में देखने की बात उससे करती थी, वह एक समय बाद ठाकुर के नए सूट को सहलाती हुई उससे मधुर बातें कर रही होती है. 

यह सब हो रहा होता है और दर्शक इसे देखता है. इसी बीच कामिनी को अचानक एक दौरा सा आता है और वह ठाकुर को झटक देती है. फिर पलट कर भागने लगती है उसी घर में किसी ओर. शायद ठाकुर के सूट को सहलाते हुए उसे बादल के साथ की हुई बातें याद आ रहीं होंगी.

प्यासा फिल्म के एक दृश्य में गुरूदत्त
बिछड़े लगाव में एक दर्द स्थायी होता है. वह है जगह का दर्द. सबकुछ बीतने के बावजूद जगह स्थाई होता है. 

जैसे बेगूसराय स्थाई है. आर्या प्लाजा स्थाई है. स्थाई है ज्ञान गंगा जहां से मैंने नया कार्डबोर्ड लिया है और स्थाई है वह सड़कें, वह सुभाष चौक, वह आहार उत्सव, वह बेगूसराय का बस स्टैंड, वह प्रियंका जेनरल स्टोर जहां से कुछ चूड़ियां ली थी मैंने और स्थाई रहेगा वह पेट्रोल पंप भी जहां मैं वारिश से बचने के लिए इंतजार कर रहा था. 


कितनी डरावनी और घनघोर वारिश थी वह!

बादल जब वापस गांव आता है तो उसे भूत समझकर उसका साथी उससे डरकर बैलगाड़ी छोड़कर भाग जाता है. मुश्किल से उसे यकीन आता है कि बादल जिंदा है. बादल को पता चलता है कि कामिनी की शादी हो चुकी है ठाकुर से. 

वही ठाकुर जिसके खेत का फल एक दिन कामिनी उसके लिए लाई थी और उसका माथा ठनका था. बादल बदहवाश की तरह भागता है वैसे ही जैसे क्या यही प्यार है में राहुल अपने पिता के मौत का पोस्टर देखकर भागता है फिल्म के अंत में.

इधर कामिनी को बात पता चलती है तो वह कहती है, राम करे कि वह मुझे भूल ही जाए. लड़की को समझना यहीं पर जटिल होने लगता है और यहीं पर मनोविज्ञान की सारी थ्योरी धरी की धरी रह जाती है.

कामिनी को गोली लगती है और वह मर जाती है. अगर गोली कामिनी को नहीं लगती तो बादल को लगती क्योंकि ठाकुर बादल को ही मारने आया था. कामिनी बेवफा नहीं थी. एक भ्रम था जो सबकुछ लीलता गया और आखिर में जब कुछ नहीं बचा तो किसी एक की बलि की दरकार थी जो कामिनी ने पूरा कर दिया.

प्यार क्या हैप्यार एक संतुलन है. जहां संतुलन नहीं है वहां प्यार नहीं है.




Wednesday, June 10, 2015


                                                 
                                                रहें न रहें हम...


कई बार ऐसा लगता है कि अब वक्त हो चला है कि अंगड़ाई ली जाए! ठहराव जरूरी है. इसे महसूस करने के लिए तजुर्बा चाहिए बस. लगातार चलते रहने से तालमेल बिगड़ जाता है और एक तरह का एडिक्शन हो जाता है चलने से. और फिर मंजिल को छूते हुए हम आगे निकल जाते हैं इसकी परवाह किये बिना कि मंजिल तो पीछे ही छूट गया!

तुम्हारा साथ न मिलना अफसोसजनक रहा. मैं तुम्हें डिजर्व नहीं करता था या तुम मुझे, यह अंतहीन बहस है जो मैं खुद से कई बार करता हूं और थक कर फिर बीच बहस में ही हट जाता हूं.

जॉब महत्वपूर्ण है. जॉब से भी ज्यादा महत्वपूर्ण हैं बैंक पीओ होना और वह भी कुछ टर्म एंड कंडीशन के साथ.

जिंदगी इतनी जटिल क्यूं बनने देते हैं लोग कि कल उनकी ही पीढ़ी का कोई हिस्सा उसमें फंसकर घायल हो जाए.  निहत्थेपन में आदमी दार्शनिक होकर बहुत कुछ सोचता है. मैं भी. मंदिर में, लोकल में, सड़क पर, गाड़ी पर, कोर्ट रूम में बैठे हुए और हर उन जगहों पर जहां सिर्फ मैं होता हूं, सोचता हूं. यह कि क्या होता अगर हम कभी न मिले होते! क्या होता अगर मैं थोड़ा धैर्य रखता!

धैर्य जरूरी है.

ऐसे वक्त में जब शब्द खो गये हैं, वाक्यों का विन्यास नहीं बन पा रहा है. सोचने की क्षमता का लोप होता जा रहा है और आसपास की शांति पहले से ज्यादा डरावनी हो रही है. इस घने वियावान से लगने वाले निहत्थेपन में मैं तुम्हें सोचता हूं कभी-कभी.

मेरे साथ ही मेरा सोचा हुआ भी दफन हो जाएगा या जलकर खाक हो जाएगा एक दिन. सबकुछ खत्म हो जाएगा एक दिन. उस दिन के बाद न शाम होगी न रात.

तबतक सबकुछ चल रहा है.


मरीन ड्राइव, मुंबई.                                       साभार : विकी, कैमरामेन, दूरदर्शन

Saturday, May 23, 2015

In a vacuum


                               Is anyone there...!

Experiencing midlife crisis is not out of the blue for me at this stage.

I find myself in disappointing mode of one-third in my life and the rest part is less disappointing. This is my ultimate achievement that I can describe.

First break up jolted me. It was a major tremor on my heart and mind. My brain lost control and like a break fail vehicle I started running fast without any idea of the way I was on!

Sometimes, it was like a dog chasing car. I wouldn’t know what to do with one if I caught it.

Questions were inked on blank papers which I used to carry near my pillow and answers were always there. I recall a day when I purchased a new Cardboard for me as I gifted my old to her. I suggested her to write her problems there and she will automatically get all answers.

I have had so many experiences of counter with diversity of moments, mostly bad, worse, worst…

I can drive it but cannot avoid occasional accidents which regularly take place in Mumbai Local, Taxi, Office Meeting, News Room and even when I remain alone in my room and receiving a phone call or chatting on whatsapp with someone.

Mistakes and Blunders!

Tried so many times to organize everything in my life but this is possible only when you have complete space to accommodate things which are there. If things continue to come out of the blue you cannot accommodate after a certain period of time, isn’t it!

Being thrilled most of the times due to several counters at a time, I feel a hidden power with me!

I feel that most of the time I find myself in unfamiliar territory. I have changed many things in the last few years but I wish I could change it back, at least few of them.

I used to wake up lonely and prepare myself for the journey ahead whole day. Journey ends at late night when I’m pushed in a badly packed local by mob, heading towards Asangaon, Ambarnath, Kalyan, Karjat, Dombiwai, Titwala or Thane. My eyes seem to be senseless till three stations until and unless announcement made, ‘’Next Station is Kurla”, I take a breath and prepare move towards gate.

Doordarshan seems to be comfort zone but after Modi emergence and his extra focus on DD, now it turned into a “Maximum work, minimum workers” like factory. Step out from DD is need of the hour but all doors are closed until and unless one has contacts and well-placed sources, what I don’t have.

Where is my self-confidence? There’s nothing that destroys self-confidence more than succumbing to fear. I feel helpless most of the times due to having no people and resources around. From water to information, I have to depend on others. Zero savings! Zero people! Zero resources! The fact, the reason why I’m scared of confronting my fears.

Practically, we want approval of others despite feeling by heart. Abraham Lincoln said everyone wants a compliment! He was right.

Acknowledging enemies is the first step to their defeat. My News diary was stolen from my office immediate before hearing on Salman Khan Hit and Run Case, I was tracking from last one year. It was a major setback for me, not because I had not copied text anywhere else but just because it was indicating that someone hates me at this high level that he/she has Zero Mercy for me.

Sometimes waves knock me down and I remain silent like a patient in Coma. I witness but unable to react.

Writing is the medicine when I feel weak. I used to write in all bad times in my life. I remember my first hurting breakup which I sustained with my pen and paper. I translated all my emotions in words and put it before me on paper because I had no one around me to ask the solutions. I still love to write but most of the times now I feel unable to translate my feelings accurately. The reason is still missing!

What is the problem?

The problem is my existence and my anguish to exist in a society always as a man of difference, where existence requires sacrifices of all kinds. You can dedicatedly work with honesty; still you would need something for existence. That something may contain anything and that anything can confuse you and you don’t know the formula to solve that confusion, is a problem, in fact.