Sunday, April 8, 2018

वाइल्ड एट हार्ट


                                                    लव मी टेंडर!

वाइल्ड एट हार्ट चलती फिरती फिल्म है। चलती फिरती फिल्म अच्छी होती है। न कोई मारपीट और न किसी तरह का अतिरेक। सस्पेंस की थोड़ी सी मात्रा में फिल्म बेहतरीन मनोरंजन के साथ मन को भर देती है।

लव मी टेंडर यह उस लड़की के लिए सिर्फ एक गाना नहीं बल्कि एक प्रमाण होता है जो वह हासिल करना चाहती है। उस लड़के के साथ हर तरह के पल बिताते हुए वह हरदम उसे खुला छोड़ती है। डिस्को में लड़का हीरो की तरह लड़की से दुर्व्यवहार करने वाले एक लड़के की पिटाई करता है। लड़की अंदर से एकदम खुश हो जाती है वैसे ही जैसे बाहुबली-2 में भरी सभा में बाहुबली द्वारा उस सेनानी का गरदन उड़ा देने पर बाहुबली की माशुका खुश हो जाती है।

खैर...!

लड़का यानि सेलर उस लड़की जिसका नाम लूला है, को बहुत दूर ले आता है। लड़का पैरोल पर बाहर है और लूला की मां उस लड़के को पसंद नहीं करती है। लूला के साथ बचपन में उसका चाचा बलात्कार करता है। बाद में चाचा की मौत एक सड़क दुर्घटना में हो जाती है। लूला और सेलर की पहली मुलाकात कब और कैसे होती है इसपर फिल्म खामोश रहती है।

बहरहाल, दूर कहीं लूला को मालूम चलता है कि वह गर्भवती है। सेलर को वह यह बात बताती है। फिल्म इस घटना को बॉलीवुड फिल्म की तरह ज्यादा नहीं खिंचता है। नॉर्मल सी बात होती है लेकिन लूला की परेशानी उसके चेहरे से साफ दिखती है।

लूला जितना दे सकती है उतना प्यार सेलर को देती है। सेलर भी उसकी जरूरतों को पूरा करने के लिए तैयार दिखता है।

सेलर नीचे गाड़ी का तेल बदलने गया हुआ है इस बीच वह आदमी ट्वाइलेट करने के लिए लूला की इजाजत से उसके कमरे में आता है। लूला अपना विवेक शायद खो चुकी होती है क्योंकि वह आभास नहीं कर पाती है कि वह बहुत सुंदर दिख रही है और वह कमरे में अकेली है।
भरे मसूढों वाला आदमी लूला को जकड़ता है और उससे कहलवाता है फक मी”!

लूला बुरी तरह सहमी सी पड़ी रहती है। सेलर के आने पर वह उसके किस का उस जोशीले अंदाज में रिप्लाई नहीं करती है जैसे पूरे फिल्म के दौरान वह करती आई है।

करवट दूसरी तरफ करते हुए वह कहती है आई विश, यू वुड सिंग मी लव मी टेंडर। लूला की आंखों में आंसू है।

सेलर उसे डिस्को में कह चुका था कि लव मी टेंडर बस वह अपनी पत्नी के लिए ही गाएगा।
दोनों बिस्तर पर एक दूसरे की तरफ पीठ करके रोते हैं। यह रोना ही उनके रिश्ते की हकीकत है।
फिल्म आगे बढ़ती है। सेलर ज्यादा रुपये कमाने के चक्कर में जेल जाता है। इधर लूला उसके जेल जाने के बाद भी वफादारी निभाती है और उसके बच्चे को जन्म देती है। लूला अपनी मां के खिलाफ जाकर ऐसा करती है।

सेलर जेल से लौटता है। लूला और अपने बेटे से मिलता है। थोड़ी दूर तक गाड़ी पर साथ चलने के बाद सेलर एक जगह उतर जाता है और फिर लूला और सेलर बिछड़ जाते हैं। सेलर वापस अपराध की दुनिया में जाता है लेकिन लूला का प्यार अब उसे पूरी ताकत से अपनी ओर खींचता है और आखिरकार सेलर सबकुछ छोड़कर वापस लूला के पास आ जाता है और उससे लिपट जाता है।
छह साल का बेटा अपने मॉम और डेड को इस तरह लिपटते देखता है तो हंसने लगता है।
फिल्म के आखिरी दृश्य में आखिरकार वह होता है जिसका इंतजार था। सेलर लव मी टेंडर लूला को गले लगाकर गाता है।

Wednesday, March 21, 2018

SC take on SC/ST act

                   
                     My first encounter with The Dalit Atrocities Act

Two reports secured a significant place in the mainstream media on Tuesday. The first was a Supreme Court observation in which the apex court expressed its anxiety over the misuse of The Scheduled Castes and Scheduled Tribes (Prevention and Atrocities) Act and the second was a statement of Union Minister of State for Social Justice Ramdas Athawale in which he expressed anxiety over politicizing atrocities against Dalits.

My first encounter with The Scheduled Caste and Scheduled Tribes Act was staged near Mahad in Raigad district where two state transport buses and some other vehicles fell into the swollen Savitri river after the bridge collapsed on the night of August 2, ’16.

I left headquarter for Raigadh immediately along with my team. By the time, we reached NDRF, Navy, Coast Guard and other agencies were carrying out search operation on war footing. With the help of local administration, we deployed our OB Van and started hot switches directly from the spot. Everything was going on the track until I noticed that the cameraperson didn’t off the camera even after the hot switches got over. I reminded him and he immediately switched it off.

In the duration of one hour, that was the third time I reminded him that he had missed to switch off his camera.

It was very irritating and also surprising because, we had only four batteries and I was instructed by Delhi Headquarter that hot switched would be carried out in the morning bulletins next day. The area was located in remote place and I was not confident that we would get logistic supports so I didn't want to take any risk.

With the support of locals, I managed accommodation for my camera person, assistant and driver for one night and asked them to be prepare for the hot switches for the next day as search operation for missing bodies was expected to be continued.

DD News broadcasts first morning bulletin at 7-8 AM and subsequently news bulletins are carried whole day in language and subject based sequence.

What surprised me, was the camera, which was left switched on even after hot switch got over. This time, I directly asked my camera person why he wanted to drain the batteries! He maintained that he didn’t notice.

In the next bulletin, I was told that battery is about to drain so entire day hot switches were not possible. I informed Delhi Headquarter and they asked me to remain present on the spot and try to find an alternative. My camera person refused to stay and started arguments,  he argued that he had no business on the spot without a camera. After a short argument, he left alone by public transport as I didn’t let him take the official vehicle, which was supposed to be moved only by my instruction. As, I had to manage hot switches at any cost, I hired a private cameraperson and completed the assignment till combine operation announced to be over.

In Mumbai office, I submitted my ordeal to the competent authority as I was asked to do. I was expecting an official memo to be served to the camera person for his misconduct and reluctance to perform duty.

When, after few days, I wanted to know the status of the complaint, I learnt that the camera person had filed a complaint in the minority commission and also threatened Grade I officer to falsely implicate them in Dalit Atrocities Act if they tried to escalate the issue.

I left stunned. I had heard about the misuse of SC/ST atrocities act but that was the first time I was directly involved in the episode.

The most interesting thing is, I had been under the impression that the camera-person belong to Christian community until this episode jolted me.

We must observe fresh Supreme Court observation in the light of equality. As the division bench of Justices A K Goel and U U Lalit has rightly said that steps should be aken to achieve the constitutional  goal of a caste-less society and prevent misuse of law resuling in spreading hatred on caste lines.



We must not forget Kopardi gang rape case in which accused had threatened the victim’s family not to file a case against them otherwise they’ll file a false case against the family, who belonged to Maratha community, under SC/ST Act.

We must welcome Supreme Court for coming out with a clear stand on this burning issue.

Tuesday, March 20, 2018

मुंबई दूरदर्शन


                                           एक स्वर्णिम दौर का बीतना                                   

बहुत पहले हेमंत आनंद ने कहा था कि अगर तुम कुछ करने के लिए आगे बढ़ोगे तो तुम्हें कहीं न कहीं से मदद जरूर मिल जायेगी। हेमंत आनंद उस अखबार के मालिक के बेटे थे जहां मैंने दो साल इंटर्नशिप किया था।

दिल्ली से मुंबई आने के बाद जिंदगी का एक नया अध्याय शुरू हुआ था।

"तुम्हारी हिंदी बहुत अच्छी है", यह उनकी पहली टिप्पणी थी जो उन्होंने दूरदर्शन के वरली दफ्तर के पांचवे मंजिले पर धीरे से दी थी। वह यह बोलते हुए पास से गुजर गये और मैं पक्के तौर पर नहीं कह सकता हूं कि उन्होंने जवाब में मेरा शुक्रिया सुना या नहीं। लिखित परीक्षा मैंने हिंदी में दी थी क्योंकि मैं हिंदी में ज्यादा सहज था।

जब परीक्षा का तीनों चरण समाप्त हो गया और मुझे एक स्टाफ से अनौपचारिक तौर पर पता चला कि मेरा चयन हो गया है तो मेरे पैर कुछ समय के लिए जमीन छोड़ चुके थे।

खैर, उसके बाद हुई शिष्टाचार भेंट में मुझे वह आदमी फिर दिखे। उसके बाद अंतिम रूप से अपना काम संभाल लेने तक मैंने उन्हें और उन्होंने मुझे कई बार देखा लेकिन मैं उनके बारे में अनभिज्ञ बना रहा और यह सिलसिला तबतक चला जबतक कि मैंने उनके केबिन के बाहर बोर्ड पर उनका नाम और पदनाम नहीं देख लिया।

अगर मुंबई में चार साल चार दिन की तरह खुशगवार बीते तो इसका पूरा श्रेय जिस एक आदमी को जाता है वह सुदर्शन सीताराम पंतोडे ही हैं, जो तब समाचार निदेशक थे और अब अपर महानिदेशक के पद पर प्रोन्नति देकर उन्हें दिल्ली में प्रकाशन विभाग में तबादला दिया जा रहा है।

तुम जब चाहो मुझसे बात कर सकते हो

मुंबई काफी तेज गति से भागने वाला शहर है। ऐसा कई बार हुआ कि मुंबई की गति के साथ तालमेल न बिठा पाने के कारण मैं अकेला पर गया। बैचलर जिंदगी हालांकि मैंने दिल्ली में लंबी बिताई थी लेकिन मुंबई की बैचलर जिंदगी के अपने कायदे-कानून थे।

घनघोर चुनौती का सामना हमेशा मैं सोकर करता था। जब चीजें पूरी तरीके से उलझ जाती और मैं उसे सुलझाने की कोशिश करते हुए थक जाता तो मैं सो जाता था। मुंबई दूरदर्शन में मेरे साथ काम करनेवाले सभी कर्मचारियों को यह बात जल्दी ही मालूम हो गई। शुरू में लड़कियों ने सोते हुए मेरे कुछ फोटो खींचे और वीडियो बनाए ताकि मैं सतर्क रहूं लेकिन जल्द ही उन्हें मालूम चल गया कि मैं एक बेपरवाह इंसान हूं।

इस बीच अकेलेपन के कारण मैंने कई बार ऐसी बातें आपस में की जिससे मेरे अंदर दबी हुई चीख लोगों को सुनाई दी और फिर अचानक एक दिन पंतोडे सर ने अपने केबिन में बुला लिया।

करीब पांच मिनट तक हम बैठे रहे।

तुम्हें कोई दिक्कत है?
मुझे घर जाना है।
छुट्टी ले लो, घर चले जाओ।

बहुत संक्षिप्त बात बहुत लंबे समय तक हुई और करीब आधे घंटे हम दोनों उनके केबिन में रहे। मैं वहां से निकला तो इस एहसास के साथ निकला को मुंबई में मैं अकेला नहीं हूं। इस एहसास की बदौलत आने वाले साल आसान हो गए।

लेकिन, कुछ समय के बाद ही वापस परिस्थियों के आगे बेबस सा होता गया और वापस गहरे में चला गया। इस बार उन्होंने वापस मुझे बुलाया और फिर वही सवाल दुहराया।

कुछ बात करके उन्हें लग गया कि मेरा तालमेल सहकर्मियों के साथ नहीं बन रहा है और दोस्ती या करीबी में मेरी जरा भी दिलचस्पी नहीं है। वह कई चीजों को समझ गये और उन्होंने सीधे कहा कि जब भी चाहो मुझे फोन करके मुझसे बात कर लो।






Monday, March 19, 2018



                                               SOMETHING THE LORD MADE

यह पता चलने पर कि जो फिल्म देखने को आप तैयार हैं वह वास्तविक घटना से प्रेरित है, एक अजीब सा रोमांच महसूस होता है।

"समथिंग द लोर्ड मेड" एक स्तरीय फिल्म है जो एक बच्ची के दिल की सर्जरी पर बनी हुई अपनी तरह की शायद पहली हॉलीवुड फिल्म है। फिल्म नस्लवाद जैसे संवेदनशील मुद्दों को भी समानान्तर लेकर चलती है, जो प्रशंसनीय है।

विवियन थॉमस पहले दृश्य में एक डॉक्टर के अस्पताल में पोछा लगाते हुए दिखते हैं। इसी क्रम में वह वहां रखी एक किताब के पन्ने पलटने लगते हैं, जिसपर डॉ अल्फ्रेड ब्लेलॉक की नजर पड़ती है।  ब्लेलॉक जौहरी की तरह हैं और उन्हें थाॉमस के अंदर के हीरे की पहचान हो जाती है। वह थॉमस को डॉक्टर का ड्रेस अपनी महिला नर्स से भिजवाता है, जिसे भावहीन मुद्र में थॉमस स्वीकारते हैं।

थॉमस का अभिनय गजब का है। वह बहुत कम मुस्कुराहट के साथ कई दृश्यों से होकर गुजर जाते हैं।





WIKI COURTESY :

Plot summary
Something the Lord Made tells the story of the 34-year partnership that begins in Depression Era Nashville in 1930 when Blalock (Alan Rickman) hires Thomas (Mos Def) as an assistant in his Vanderbilt University lab, expecting him to perform janitorial work. But Thomas' remarkable manual dexterity and intellectual acumen confound Blalock's expectations, and Thomas rapidly becomes indispensable as a research partner to Blalock in his forays into heart surgery.
The film traces the two men's work when they move in 1943 from Vanderbilt to Johns Hopkins, an institution where the only black employees are janitors and where Thomas must enter by the back door. Together, they attack the congenital heart defect of Tetralogy of Fallot, also known as Blue Baby Syndrome, and in so doing they open the field of heart surgery.
Helen Taussig (Mary Stuart Masterson), the pediatrician/cardiologist at Johns Hopkins, challenges Blalock to come up with a surgical solution for her Blue Babies. She needs a new ductus for them to oxygenate their blood.
The duo is seen experimenting on stray dogs they got from the local dog pound, deliberately giving the dogs the heart defect and trying to solve it. The outcome looks good and they are excited to operate on a baby with the defect, but in a dream, Thomas sees the baby grown up and crying because she's dying. Thomas asks why she's dying in the dream and she says it's because she has a baby heart. Blalock interprets it as the fact that their sewing technique didn't work because the sutures didn't grow with the heart, and worked on a new version that would work.
The film dramatizes Blalock's and Thomas' fight to save the dying Blue Babies. Blalock praises Thomas' surgical skill as being "like something the Lord made", and insists that Thomas coach him through the first Blue Baby surgery over the protests of Hopkins administrators. Yet outside the lab, they are separated by the prevailing racism of the time. Blalock makes a mistake once by accidentally cutting an artery at the wrong place, but eventually, alongside with Thomas, succeeds. Thomas attends Blalock's parties as a bartender, moonlighting for extra income, and when Blalock is honored for the Blue Baby work at the segregated Belvedere Hotel, Thomas is not among the invited guests. Instead, he watches from behind a potted palm at the rear of the ballroom. From there, he listens to Blalock give credit to the other doctors who assisted in the work but make no mention of Thomas or his contributions. The next day, Thomas reveals that he saw the ceremony, and quits from his lab. However his heart is so with his work the work he left behind that he finds himself unhappy in other endeavors and decides to swallow his pride and return to Blalock.
One day before Blalock dies, he sees Thomas, now a professional surgeon and trainer in the open heart surgery wing. After Blalock's death, Thomas continued his work at Johns Hopkins training surgeons. At the end of the film, in a formal ceremony, Hopkins recognized Thomas' work and awarded him an honorary doctorate. A portrait of Thomas was placed on the walls of Johns Hopkins next to Blalock's portrait, which had been hung there years earlier.

Thursday, March 15, 2018

मेरी डायरी

 
                                      तुमसे मिलते ही वो कुछ बेबाक हो जाना मेरा...

तुम्हें जरूर याद होगा कि कड़कड़ाती ठंढ वाली उस रात मैं तुम्हें अपने सिरहाने में रखकर किस तरह सोया था!

तुमसे मिलने के लिए तब कोई लुकाछिपी नहीं करनी होती थी। जब तुम्हें चाहता था तुमसे मिल लेता था और फिर तुम मेरे सामने पूरी तरह से खुलकर तभी बंद होती थी जब मैं खुद अपने हाथों से तुम्हें छूकर बंद करता था। तुम्हारी वह छुअन अभी भी ख्यालों में आने पर देर तक असर छोड़ती है।

तुम प्रत्यक्षदर्शी थी मेरे हर उस फैसले का जो मेरा इकलौता था और तुम इकलौती गवाह रहोगी इस बात का कि अपने हरेक फैसले के अच्छे और बुरे परिणाम के लिए न तो मैंने किसी को श्रेय दिया और न ही किसी तरह की उलाहना!

जिस रोज से मैंने अपनी गाड़ी की ड्राइविंग सीट संभाली, किसी को स्टियरिंग को हाथ लगाने नहीं दिया और न ही किसी के कहने पर रास्ते बदले। तुम दोगी न गवाही इस बात की!

2016 की वो दोपहर याद है तुम्हें जब अंटॉप हिल का वह सरकारी क्वार्टर खाली था औऱ एक कमरे में हम और तुम एक दूसरे से लिपटे हुए थे। तुमसे मैंने तब कितनी सारी बातें की थी। कितना तर्क-वितर्क हुआ था उस दिन तुम्हारे साथ! हम दोनों के बीच जब भी तर्क-वितर्क होता कोई न कोई नया रास्ता जरूर निकलता हुआ दिखता था। तुम्हारे पास मेरी हर प्रॉब्लम का सॉल्यूशन था।

तुम्हारी कमी की भरपाई कई बार इन पन्नों ने की     साभार: दिल्ली डायरी

मुझे मालूम है कि तुम मुझसे अब भी उतना ही प्यार करती हो जितना कि 2012 के अंतिम कुछ महीनों में करती थी। हम-तुम कई जगह साथ-साथ घूमे। महानन्दा एक्सप्रेस से दिल्ली से बेगूसराय की उस यात्रा में मैं तुम्हें अपने साथ ले गया था जो यात्रा बेगूसराय तक के लिए एक आखिरी यात्रा जैसी थी! दिल्ली से बेगूसराय की कोई यात्रा याद करना चाहता हूं तो सबसे पहले वही यात्रा याद आता है।

इस संसार में मेरे और तुम्हारे बीच के रिश्ते से पवित्र कोई रिश्ता नहीं हो सकता है।

मैं अपना अंधकारमय बचपन और दुविधाग्रस्त यौवन भूल भी जाऊं लेकिन तुम्हें भूल पाना मेरे बस में नहीं है। तुम्हार धैर्य, तुम्हारा समर्पण, तुम्हारी पवित्रता और इन सब से अलग हर दिन और हर शाम नयापन लिए तुम्हारी वही खुश्बू मुझसे तो नहीं भूली जा रही।

2016 एक अकस्मात था।

अकस्मात एक शब्द भर नहीं है। अकस्मात एक अवस्था है। ऐसी अवस्था जो किसी को चेतनाशून्य कर सकती है। किसी को स्तब्ध कर सकती है या फिर किसी को इस हद तक पागल बना सकती है कि वह कुछ देर के लिए सबकुछ भूल कर बहते बयार में खुद को बहने के लिए छोड़ दे।

2016 ने मुझे तुमसे दूर कर दिया। इस बात को कहने का इससे सीधा तरीका यही है।

तुम अब भी मेरे पास हो और शायद हरदम रहोगी। हमतुम अब भी मिलते हैं, कभी छिपकर तो कभी छिपाकर! तुम्हारे प्रति जिस जवाबदेही का वादा मैंने कभी किया था उसे अबतक मैं निभा रहा हूं और आजीवन निभाने की कोशिश करूंगा लेकिन अब हमारे और तुम्हारे बीच परिवार, समाज, दुनियादारी, स्ट्रगल और आत्मीय बातें आगे होंगी ऐसा लगता नहीं है।

तुम्हें इस तरह पास रखकर भी तुमसे दूरी को महसूस करके दुखी रहता हूं। बेबसी शायद इसे ही कहते हैं! तुम आज भी दशक भर पहले की तरह टेबल पर रखी रहती हो और मैं नजरें छिपाकर तुम्हें देखते रहता हूं लेकिन मैं तुम्हें चाहकर भी वह नहीं बता पाता जो पहले बताया करता था।

मुझे इतनी फुर्सत भी नहीं मिल पाई कि मैं तुम्हारे उपकारों के लिए तुम्हारा आभार जता सकूं, आभार जता सकूं तुम्हारा 2012 की उस ट्रेन यात्रा में मेरे साथ रहने के लिए, 2015 में परीक्षा के दिनों अचानक घटी घटनाओं के बीच से मुझे सुरक्षित निकाल लाने के लिए और 2016 की सुनामी में मेरे साथ डटकर खड़ा रहने और मुझे सही सलामत 30 नवंबर तक पहुंचा देने के लिए।

कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि मुझे 30 नवंबर, 2016 तक सही-सलामत पहुंचाने के लिए ही तुम मेरी दोस्त बनी थी।