Monday, April 21, 2014



                                          बच्चा खो गया है


पहली बार जब मंच से किसी बच्चे के गुम होने की सूचना दी गई तो मैंने भी अपने आसपास देखा. फिर थोड़ी देर बाद किसी बच्चे के गुम होने की सूचना खचाखच भरे मैदान के सभी साउंडबाक्स में सुनाई दी तो फिर मैंने प्रेस दीर्घा में इधर उधर देखा लेकिन जब तीसरी बार नाम मेरे कान से टकराया तब मैं अचानक पत्रकार हो गया. नाम मुस्लिम था.

क्या ये महज संयोग है कि राहुल गांधी की रैली में कई बच्चे खोते हैं और उनमें मुस्लिम शामिल होते हैं. मंच से माइक पर बार-बार उनका नाम पुकारा जाता है. क्या संदेश दिया जा रहा है और किसको संदेश दिया जा रहा है?

यह मानी हुई बात है कि मुद्दाविहीन राष्ट्र और दिशाहीन राजनीति के बीच कई समुदाय बुरी तरह फंस चुके हैं. राहुल गांधी जब बोलते हैं कि "मैं ब्रह्मण हूं" और मुलायम जब बोलते हैं कि वह सत्ता में आने के बाद मुस्लिमों को आरक्षण दिलावाने के लिए संविधान संशोधन करेंगे तो तमाम चीजें लेजर किरणों की तरह सत्ता की राजनीति के तह को भेद देती है.

तर्क के सहारे अपनी बात रखने की नींव जिस संसद ने रखी थी जब उसी से विश्वास डिग जाए तो देश का नागरिक कहां जाये?

धर्म और आध्यात्म पर किताब लिख चुके एक बिजनेस मैन से पिछले दिनों कलकत्ते में मुलाकात हुई. बात शुरू हुई तो कई ठहराव होते हुए समकालीन राजनीति तक पहुंची. उत्सुकतावश उनसे मोदी को लेकर उनकी राय पूछ ली. उन्होंने जो कहा उसे उसी तरह यहां लिख रहा हूं, "कोई एक आदमी बताइए जो मुस्लिमों को मन से चाहता हो. सब उपर उपर चाहते हैं लेकिन मन से कोई उनको नहीं चाहता." जैसा कि हर कोई कहता है वैसा ही उन्होंने भी अंतिम में कहा कि उनके कई मुस्लिम दोस्त भी हैं.

शाहबानो प्रकरण से लेकर सरमान रूश्दी प्रकरण तक कांग्रेस ने मुस्लिम तुष्टिकरण की एक से बढ़कर एक मिसाल कायम की है. आगे भी ऐसा होता रहेगा इसमें अगर किसीको शक है तो वह राहुल गांधी के भाषणों को सुनकर उसे दूर कर सकता है.

मुसलमान जाएं अपनी बला से और हिन्दु जाएं अपनी बला से लेकिन देश में कई लोग ऐसे हैं जो बिना इन शब्दों को सुने अपनी जिंदगी जीना चाहते हैं. ऐसे लोगों के लिए कांग्रेस से बड़ा खतरा कोई नहीं है. क्योंकि हिंदू साम्प्रदायिकता का जड़ मुस्लिम तुष्टिकरण में छिपा हुआ है जो कांग्रेस की देन है.

Saturday, April 12, 2014



                                                   डिंपल से आगे

बेगूसराय से मुंबई भाया दिल्ली के सफर में मिली अनगिनत महिलाओं के बारे में कभी-कभी सोचने लगता हूं. यूं तो सोचने के लिए चीजों की कमी नहीं है लेकिन मुलायम सिंह यादव के बयान के बाद अजीब सी बेचैनी घर कर गई है.

जब से राहुल गांधी ने "महिला सशक्तिकरण" को 2014 लोकसभा चुनाव के मुद्दों के केन्द्र में रखा तभी से लग रहा था कि "सेक्युलरवाद" की तरह महिलाओं पर भी खूब कीचड़ उछलेगा और आखिरकार जिसका डर था वही हुआ.

मुलायम सिंह यादव की प्रोब्लम शायद यह है कि उन्हें सारी लड़कियां या महिलाएं अपनी बहू डिंपल यादव की तरह ही नजर आती हैं. डिंपल यादव जहां हैं वहां मुलायम के राजनीतिक कद के कारण ही हैं. उन्हीं के कद के कारण जब उपचुनाव में डिंपल को कन्नौज से सपा द्वारा प्रत्याशी घोषित किया गया तो कांग्रेस और भाजपा सहित किसी भी पार्टी ने उनके खिलाफ कोई उम्मीदवार खड़े नहीं किये.

मुलायम सिंह की बहु डिंपल यादव
ऐसे में जब देश की पहली महिला आईपीएस किरण वेदी कहती हैं कि मुलायम के बयान का प्रतिरोध डिंपल यादव को करना चाहिए तो लगता है किरण वेदी कई सालों के विदेश यात्रा से अभी-अभी लौट कर आईं हैं.

पिछली बार जब 20 मार्च को दिल्ली-मुंबई राजधानी से मुंबई लौट रहा था तो आरएसी में एक महिला के साथ सीट साझा करना था. बात चली तो चलने लगी. उनके समसामयिक ज्ञान ने स्तब्ध कर दिया. सुबह मुंबई सेन्ट्रल पहुंचकर जब हमने साथ में कॉफी पी तब पता चला कि उनके पति का देहांत काफी पहले हो गया है और अनुकंपा की नौकरी ठुकराकर उन्होंने अपना बिजनेस शुरू किया था.

मुंबई में फिल्म अभिनेत्री नंदा की पूरी जिंदगी ही एक मिसाल है. नंदा ने यह साबित किया कि कैसे कोई लड़की अपने शर्त पर जिंदगी जी सकती है. नंदा की जिससे शादी होने वाली थी उसकी आकस्मिक मौत हो गई लेकिन नंदा बढ़ती रही और बिना किसी जीवनसाथी के ही उसने मरने से पहले एक लंबी लकीर खींच दी.

मुंबई शक्ति मिल सामूहिक दुष्कर्म मामले को कवर करने वाले पत्रकारों को ज्यादातर लड़कियां थीं. प्रिंसिपल सेशन जज भी संयोग से महिला ही थी.

रेप पर फांसी हो या न हो यह कानूनी बहस का विषय है लेकिन मुलायम सिंह यादव को कम से कम बोलने से पहले यह समझ लेना चाहिए कि डिंपल यादव के अलावे और भी कई तरह की महिलाएं हमारे देश में हैं.

Monday, April 7, 2014

समय से संवाद



दूसरी किस्त

                                     पल दो पल- सवाल दर सवाल

पूरी जिंदगी जीनी क्यूं जरूरी है? अगर तजुर्बे उम्र से बड़े हो जाएं तो बाकी जिंदगी किस काम की!

अगर जवाब नहीं आए तो कोई परीक्षार्थी तीन घंटा क्यूं बैठेगा परीक्षा हॉल में? बेकार! अच्छा होता है कि एक घंटे की अनिवार्य उपस्थिति के बाद उसे निकलने की छूट होती है. फिर जिंदगी के साथ ऐसा क्यूं नहीं है?

एक जुआ जिसमें तमाम शर्तें और कायदे हैं. जीतने वाले को बीच में खेल छोड़ कर जाना नियम के खिलाफ है. उसे तबतक खेलना होगा जबतक हारने वाले के पास हारने के लिए कुछ भी बचा हुआ हो.

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आईआईएमसी के इंटरव्यू में पहली बार सफल नहीं हो पाना पहली बड़ी हार थी. एक साल खपाने के बाद जिंदगी को पटखनी दी और एंट्रेस के साथ-साथ इंटरव्यू भी क्रेक कर दिया.

दांव बड़े होते चले गये और फिर समय के साथ रेस शुरू हुआ. कई लड़ाइयां हुईं. खेल और दिलचस्प होता चला गया और धीरे-धीरे पता ही नहीं चला कि कब क्या दांव पर लग गया.

रिश्ते, चैन, करियर, प्रतिष्ठा, नाम-बदनाम और न जाने क्या-क्या दांव पर लग गया.

इतना समझ आने लगा कि जिंदगी एसएससी, बैंक पीओ या रेलवे की परीक्षा नहीं है. परीक्षा में अगर आपको सवाल नहीं आते तो आप कॉपी जमा करके लौट सकते हैं लेकिन जिंदगी!? जिंदगी के साथ ऐसा कहां! पूरी जिंदगी बितानी पड़ती है और सवालों का सिलसिला हमेशा जारी रहता है. आप क्विट नहीं कर सकते तबतक जबतक आपके पास खोने के लिए आपकी आखिरी सांस हो!

इसलिए जिंदगी परीक्षा नहीं जुआ है!

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सम्मान, नाम, प्रतिष्ठा, इज्जत, विश्वास, भरोसा वगैरह वगैरह. यही वे चीज हैं जो आदमी को न चैन से जीने देते न मरने देते. हर समाज में इसके अपने-अपने मापदंड हैं. जैसे बिहार में सरकारी नौकरी ही मोक्ष है तो दिल्ली में सैलरी मेटर करती है और इन सब से अलग मुंबई में नाम मायने रखता है.

दिल्ली लोग रुपये कमाने आते हैं और मुंबई लोग नाम कमाने के लिए.

लिखते-लिखते सोचने लगता हूं कि क्या लिखूं और कहां से शुरू करूं क्यूंकि सबकुछ गड्डमड्ड हो गया है. जो जहां था वहीं पड़ा है और सबकुछ छोड़छाड़ कर मैं तेज गति से भाग रहा हूं.

भागना क्यूं जरूरी है?

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अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि ।
ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि ॥ 33 ॥

अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेsव्ययाम्
सम्भावितस्य चाकीर्ति - मर्रणादतिरिच्यते  ॥ 34 ॥
                                                                   (गीता अध्याय - 2)

यदि तू इस धर्मयुक्त युद्ध को नहीं करेगा तो स्वधर्म और कृति को खोकर पाप को प्राप्त होगा. 
तथा सब लोग तेरी बहुत काल तक रहने वाली अपकीर्ति का भी कथन करेंगे और माननीय 
पुरूष के लिए अपकृति मरण से भी बढ़कर है.


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Friday, April 4, 2014

समय से संवाद

पहली किस्त
                                       
                                            पल दो पल- शब्द दर शब्द


कागज पर कलम से लिखना और स्क्रीन पर की बोर्ड सा लिखना एक जैसा नहीं है फिर भी कोशिश करता हूं कि जितनी बेबाकी से डायरी लिखता हूं उतनी ही बेबाकी से आज कुछ लिखूं.

जिस एक बात को मैं मान चुका हूं वह है, "आप जितनी गलतियां करेंगे आप उतना ही दूर तक जाएंगे बशर्ते आपको अपनी गलतियां पता हो."

मेरे बारे में जो बात मुझे सबसे अधिक सुननी पड़ी है वह नीचे लिख रहा हूं:

"योगेश तुम बहुत कन्फ्यूज हो तुम्हें खुद ही नहीं पता है कि तुम्हें क्या करना है"

यह एकमात्र ऐसी बात है जो मैंने अनगिनत बार अनगिनत लोगों से सुना है. लेकिन यह अजीब विडंबना है कि मेरे पास अब भी इस बात का कोई ठोस जवाब नहीं है.
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मुझे नहीं पता कि वह क्या था लेकिन कुछ ऐसा जरूर था जिसने मुझे कहीं का नहीं छोड़ा था. जब उसकी शादी की खबर मुझे दूसरे के माध्यम से मिली थी तब उस अल्टीमेटम को बीते कई महीने हो चुके थे. छह महीने का अल्टिमेटम था मेरे पास "बीमा प्रोडक्ट" बनने के लिए. उन छह महीनों में मैंने जितने लोगों को फोन, ई-मेल, ट्विट या पर्सनली मिलकर जॉब के लिए रिक्वेस्ट किया था उन लोगों की एक सूची मैंने एक जगह बनाई है.

तनावग्रस्त दौर बीता. उसके परिवार ने उसका "बीमा" कर दिया. जब उसका बीमा हो रहा था उसके कुछ दिनों बाद ही मैं कलकत्ते के रविन्द्र नाथ टैगोर इंटरनैशनल इंस्टीट्यूट ऑफ कॉर्डिएक साइंस में अपने पिता जी के दिल के दौरे का इलाज कराने गया हुआ था. 

जैसे हर दौर बीत जाता है वैसे वह दौर भी बीता.

लेकिन उस दौर में हुई वारदात के कुछ चिथड़े मेरे दिलो दिमाग पर प्रिंट हो गये. जो एक बात मेरे मन में घर कर गई वह थी "सरकारी नौकरी". इतना समझ में आ गया कि "सरकारी नौकरी" ही वह "बीमा प्रोडक्ट" है जो बिहार में हर लड़की के परिवार वाले अपनी बेटी के लिए सुरक्षित मानते हैं.

अच्छा यह हुआ कि उन डेढ-दो सालों में हम बामुश्किल सात बार ही मिले थे वह भी बहुत कम समय के लिए.

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बैंक पीओ!

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भूलना ईश्वर का सबसे बड़ा उपहार है लेकिन ईश्वर सबको यह उपहार कहां देता है!

कुछ घटनाएं दिमाग में बार-बार रिवाइंड होती रहती हैं. ऐसी ही एक घटना घटी थी उस मुहल्ले में जहां मेरा जन्म हुआ. उस घटना के केन्द्र में जो लड़का था वह दुर्भाग्य से मेरा सगा भाई था.

दिन बीता, समय बीता, दौर बीता, युग बीता लेकिन जो नहीं बीता वह था वह सदमा जिसने पूरे परिवार को हिला कर रख दिया था.

जो चीजें अपने आप नहीं होती उसे करना पड़ता है.

अगर आप किसी रंग को मिटा नहीं सकते तो उसके ऊपर दूसरा रंग पोत दीजिए.
अघोषित रूप से एक बड़ी जवाबदेही मेरे ऊपर आ चुकी थी. यह जवाबदेही पुराने रंग पर नये रंग को पोतने की थी.

एक ताजी हवा चाहिए उस घर को जो अब तक सरकारी नौकरी और दुनियादारी तक में सीमित रहा है. जिस स्तर की सजा उस घर को मुकर्रर की गई थी उसी स्तर की बख्शीश भी चाहिए उसे.

कुछ अलग कुछ नया कुछ ऐसा जो अप्रत्याशित हो!

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बैंक पीओ, सिविल सेवा, रेलवे, एसएससी आदि!! नाम, ख्याति, प्रतिष्ठा वगैरह वगैरह!!

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जब रात का खाना खाकर तुम सो रही होगी तब मैं मुंबई के मझगांव डॉक्यार्ड से सीधे ऑन एयर तुम्हारे टीवी स्क्रीन पर आऊंगा यह बताने के लिए कि मैं पुनर्जन्म लेकर फिर से चलना सीख गया हूं.


अपने इर्दगिर्द लोगों को देखकर बहलने लगा हूं और दिल्ली मट्रो की सीढियों से लेकर मुंबई बीच पर अठखेलियां कर रहे जोड़े मुझपर पहले जैसा असर नहीं दिखा पा रहे हैं.

 तब सजीव होकर भी निर्जीव था और अब निर्जीव होकर भी सजीव हूं. मैं चल रहा हूं और खुद को चलता हुआ महसूस भी कर रहा हूं. तुम हो न!!


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"शायद कोई ख्वाहिश रोती रहती है,
  मेरे अंदर बारिश होती रहती है"

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प्रिय जीवन,
                 मुझे नहीं पता तुमने इतने सारे सवालों के लिए मुझे ही क्यूं चुना लेकिन मुझे ऐसा महसूस होता है कि कहीं न कहीं कोई है जो मुझे तुमसे हारने नहीं देगा. वो मेरा आत्मविश्वास भी हो सकता है या मेरी जिद भी हो सकती है.

                 देखो मैदान छोड़ने वालों में से मैं नहीं हूं यह तुम जान लो. मैं बाय डिफॉल्ट जिद्दी हूं और गलतियां करने की आदत मुझमें तभी से है जब मैंने क्लास फोर्थ में एक लड़की को आई लव यू बोल दिया था. एक घंटा मुर्गा बनाए रखा था मुझे शिक्षकों ने और फिर अगले ही दिन मैंने दूसरी लड़की को प्रपोज कर दिया था.

                 यौवन को मैं बचपन में ही जी चुका हूं और जवानी में बुढापा जी रहा हूं. उम्र से बड़े तजुर्बे हैं मेरे ऐसा मैंने तुम्हें पहले भी कई बार अपने काम से बता चुका हूं इसलिए अब तुमसे कहता हूं कि बेकार में बार-बार परेशान करना छोड़ दो अपने सवालों से. तुम सवाल खड़े करते-करते थक जाओगे एक दिन!

                 तुम्हें ऐसा क्यूं लगा कि मैं आत्मसमर्पण कर दूंगा? इसका जवाब दो.

                                                                                                                        तुम्हारा!


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 देखो ये जो समाज है न यह एक पिंजड़ा है.
बिहार तभी आना जब छठ का सूरज निकले. पागल हो जाओगे यहां. जवाब नहीं होंगे तुम्हारे पास देने के लिए इन लोगों को जिन्हें इस पिंजड़े की आदत लग चुकी है.

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- 1860 266 2425

"हैलो! उधर कोई है?"

"हां सर बोलिये."

"क्या आप साइक्रेटिस्ट हैं? मैंने आपका नंबर गूगल पर देखा था. मुझे शाम से डर लगता है. क्या मेरा इलाज हो सकता है?"

"सर, कहां से बात कर रहे हैं आप? आपका नाम क्या है?"

"मेरा नाम योगेश है न्यू अशोक नगर में हूं इस वक्त मैं. यहीं रहता हूं. आप बताइए न क्या आप साइक्रेटिस्ट हैं? मुझे कोई एडवाइस दीजिए न प्लीज. मैं रोज योगा और प्राणायाम करता हूं कभी-कभी नाइट शिफ्ट के कारण सुबह नींद नहीं खुलती इसलिए नहीं कर पाता हूं. क्या इसी कारण मुझे डर लगता है?"

"सर आपकी आवाज कट रही है...हैलो हैलो!!??"

"मेम आपकी आवाज आ रही है मुझे आप प्लीज बताइए मैं क्या करूं? दिल्ली में बात करने का समय किसी के पास नहीं है. आप प्लीज बताइए न कि मैं क्या करूं?"

"सर आप लोगों से बात कीजिए और दोस्त बनाइए."

"मेम आप मजाक क्यूं कर रहीं हैं. मैंने कहा न आपको मुझे दोस्ती बिल्कुल पसंद नहीं है. आपके पास कोई टिप्स है तो दीजिए वरना मैं फोन रखता हूं."

"सर आप एक नंबर लीखिए ये डॉ अमिताभ शाहा का है यह एक साइक्रेटिस्ट हैं और वैशाली में इनकी क्लीनिक है. आप इनसे मिल सकते हैं. नंबर है - 9818796611/9711303038"

"ओके. थैंक्यू मेम...हैलो हैलो मेम मैं यह बोल रहा था कि अभी इनको फोन करना सही रहेगा?"

"सर कल दिन में कर लीजिएगा. इतनी रात शायद वो सो चुके होंगे."



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सर मैं मेट्रिमोनियल डॉट कॉम से बोल रही हूं. आपने कहा था आप रजिस्ट्रेशन करवाएंगे.

देखिए मुझे शादी करनी ही नहीं है आप प्लीज मुझे आगे से फोन मत कीजिए. मैं आज ही अपना अकाउंट वहां से डिलीट कर दूंगा.

सर हमारे पास आपके लिए अच्छे ऑफर हैं...

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You left me without a goodbye!


I've tried so many times but can't get her out of my mind cause every single detail in my daily life reminds me of her. Fighting with my diary became a routine work for me now. I wish, I could scratch the pages and got her for my answer! I wish...!!!

Yes I accept my defeat that I couldn't get the "deserved job", for which I was given an ultimatum of six months.

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"सर, मुझे कुछ रुपये चाहिए गुजरात जाकर एक स्टोरी करना चाहता हूं."
"कितना?"

"तीन-चार हजार चाहिए. बस आने जाने का. बाकी वहां रहने का बंदोबस्त मैं कर लूंगा."
"ठीक है. मैं इंडिया आ रहा हूं इस तारीख को. एयरपोर्ट पर मिलो. एयर फ्रांस की फ्लाइट है."

"ओके सर."

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"देखिए मैं दिल्ली में इधर-उधर से 20-22 हजार बना लेता हूं. पटना में 25000 लूंगा."
"ठीक है. तुम आओ न पहले. हम तुमको दुखी होने नहीं देंगे."

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 योगेश तुम इतने कनफ्यूज क्यूं हो यार?

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और अंत में:

                                                                                     Photo Credit: Sumit Roy

                                                                             Photo Credit: Manish Kadam

                                                                                       Photo Credit: Laukik




                                                                            Photo Credit: Sagar Chougule
                                                                                           Photo Credit: Gaurav


                                                                                         Photo Credit: Gaurav

                                                                    Photo Credit: Sachin Ninave (BSE)


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Friday, March 28, 2014

जाति जाती नहीं


                                                शीतल के बाद क्या!


जाति जानने के लिए नया तरीका ढ़ूंढा जाना चाहिए. क्यूंकि नए तरह के कई उपनाम आने के बाद पुराने लोगों को जाति जानने में बड़ी कठिनाई होती है और उनकी यह असहजता सामने वाले को भी असहज बना देती है.

पिछले दिनों एक स्कूली छात्रा से साक्षात्कार करने को गया. छात्रा के अंदर अभिव्यक्ति की तड़प थी और उसने उसे शब्दों में ढालकर एक कविता गढा था. उस कविता को कई ने सराहा तो उसका मनोबल भी बढ़ा. बढ़े मनोबल से वह कैमरे के सामने आई. साक्षात्कार हुआ और हम चलने को हुए कि उसकी पढ़ी-लिखी सी दिखने वाली मां ने फिर से नाम पूछ लिया!

दुनियादारी करते-करते अब इतना तो सयाना हो ही गया हूं कि अगर कोई तीन बार पूरा नाम पूछे तो उसका मतलब समझ सकूं.

"शीतल..हां आगे...शीतल के बाद!"
उनके चेहरे से उनकी असहजता साफ झलक रही थी.

"मेम मेरा नाम शीतल के बाद खत्म हो जाता है."
मैंने यह जवाब उनसे आंख मिलाकर दिया यह सोचकर कि वह समझ जाएंगी लेकिन जब उन्होंने बेचैनी छिपाते हुए फिर से वही सवाल किया तो मैं खुद से उलझ गया.

खुद से उलझने के बाद धैर्य कहां साथ देता है सो मैंने बिना कुछ परवाह किये कह दिया कि "आई डाेंट विलिव इन कास्ट, क्रीड, रिलीजन एंड सच फिल्दी थिंग्स"

इसके बाद उन्होंने क्या कहा यह मैंने ठीक से सुना ही नहीं क्यूंकि मैंने उसे सुनना चाहा ही नहीं. हो सकता है उन्होंने अपने बचाव में कुछ कहा होगा लेकिन मुझे वो सुनना ही नहीं था.

इस छोटी सी घटना ने मेरी उस अवधारणा को ही मजबूत किया कि पढ़े-लिखे लोग और मूर्ख लोगों में समझ को लेकर कोई खास अंतर नहीं होता है.