Tuesday, October 14, 2014

Tips




Interpersonal Communication
Intrapersonal communication takes place within one person. It is meant to reflect oneself to clarify something. There are three concept of intrapersonal communication namely as following:
  1. Self-conception
It is the one of the concepts of intrapersonal communication because it determines how he sees himself and which to oriented to others. It is also known as self-awareness. There are several factors effecting the communication.
a)     Belief
It is self-orientation to know what is true or false, good or bad. It might be descriptive or prescriptive.
b)     Values
Values are integral part of belief to determine what is right or wrong. It is a deep seated foundation lying within the person’s mind and concept.
c)     Attitude
It is a learned idea of the person and it is generally consistent with value. It is often emotional.
  1. Perception
When the self-concept lies internally and perception focuses outward. It is deep rooted in belief, values and attitude. It related and closely intertwined with self-concept to create better understanding of both within and outside the world.
  1. Expectation
It is futuristic oriented message dealing with long term occurrence. People form expectation on the base of the strength of ones learned ideas within the society.
There are different types of intrapersonal communications as following
  1. Internal discourse
Internal discourse relates to thinking, concentrating and analysing within one self. It might of day dreaming, praying or meditating.
  1. Solo-vocal
It is that communication which takes place while one shouts loudly for clarifying one-self or rehearsing, when you are talking to yourselves when students don’t do homework properly, you might talk yourself to remind on the next time to  redo it.
  1. Solo-written communication
It deals with writing for oneself and not for others. Like writing notes for your future use.
Merits and demerits of intra and interpersonal communication:
  1. Irreversibility of communication
Merits:
Once when interpersonal communication has taken place, it could not be hold back. When it has conveyed properly and in better way, there is always good impact
Demerits:
It is by contrast, when the communication was not properly flowed with good impact, it is always bad impression.
  1. Communication does not only be verbal communication
Merits:
When you are in good mood, you may convey to others in better way.
Demerit:
The communication might be of body language and it is really hard stop when something goes on emotionally, at that point of time, you may resort to have violence interaction.
  1. Situation
Merits:
The communication can also be depending on the situation, when situation will be calm both in psychologically and sociologically then communication would be flowed smoothly
Demerits:
It is by contrast, when the situation of discourse is in harsh and not good, the communication might not be good flow
Merits and demerits of intrapersonal communication
Demerits:
When the intrapersonal communication takes place, there is no feedback since there is no receiver to decode whatever he talks about himself.
Merits:

Intrapersonal communication does not need to wait for secondary feedback and it could take place whenever he/she wants
Intrapersonal communication does not need to wait for secondary feedback and it could take place whenever he/she wants

Courtesy : http://victimofred.wordpress.com/

Sunday, September 7, 2014

समय से संवाद


                                               बेचैन करती धुन


"ब तो हे तुमसे हर खुशी अपनी..."

अभिमान फिल्म के इस गाने के आगे मैं इतना कमजोर क्यूं होने लगता हूं?

दिन-दर-दिन बढ़ते-बढ़ते महीने-साल बीत गये लेकिन इस गाने में छिपा वो सबकुछ अब भी वैसा ही क्यूं है जो तब था, जब रात-दिन का फर्क मिट चुका था.

दीवार न होता तो किससे सट कर इतना पर्सनल होता!

तेरे प्यार में बदनाम दूर-दूर हो गये, तेरे साथ हम भी सनम मशहूर हो गये...देखो कहां ले जाए बेखुदी अपनी...

ये सबकुछ क्यूं नहीं खत्म हो जाता!

किस-किस इल्जाम को ढोता फिरूं ...कितने लोगों को जवाब दूं ...क्या-क्या जवाब दूं और कितना तक दूं! न सवाल खत्म होंगे न जवाब!

सवालों का मुकाबला करते-करते मिटने लगा हूं, भूलने लगा हूं...कभी छाता कभी कलम कभी पर्स कभी पेन ड्राइव कभी मोबाइल तो कभी लोकल का प्लेटफॉर्म...यह सिलसिला जारी है और ऐसा लगता है यह सब मेरे साथ ही खत्म होगा!

बस अगर कुछ नहीं भूल पा रहा हूं तो वह है मेरा अतीत जो भयानक वियावान से निकलती किसी दर्दनाक कराह की आवाज बनकर मेरे आसपास बहने वाली हवाओं में घुल सा गया है!

पूरी ताकत से मैं चिल्लाकर यह कहना चाहता हूं कि मैंने हार मान ली है!

हां, मैंने हार मान ली है! मैंने मान लिया है कि मैं अचानक सामने आने वाली चुनौतियों के लिए तैयार नहीं हूं. चुनौतियां अप्वाइन्मेंट लेकर नहीं आती ये मैंने उस नोवेल में पढ़ा था जिसके किरदार के साथ मेरा भावात्मक रिश्ता है. क्या मेरी चीख सुनकर तुम्हें दया नहीं आती?

क्यूं नहीं उस शाप से मुझे मुक्त कर देते तुम?

गणित का एक आसान सा सवाल नहीं सुलझा सकने वाले किसी आदमी के सामने जिंदगी के इतने समीकरण हैं! ये समीकरण भी सूत्रों से ही हल किये जाते होंगे शायद!


जन्म-जन्मान्तर तक, अनंत के उस छोर तक और सबकुछ वीरान होने तक मैं अस्तित्व में रहूंगा. भले ही निहत्थे हारे हुए एकांकी की तरह!

Saturday, September 6, 2014

यादों में...



                    बीते पन्ने के लोग


मुंबई आने के बाद पीछे ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे यहां मिस किया है. सबकुछ मिलने के बावजूद कुछ है जो मिस हो रहा है का बिम्ब अब भी जस का तस है. अब तक समझ नहीं आया कि क्या है जो मिस हो रहा है!

करीब दो साल पहले अजय मिश्रा से लिफ्ट में पहली बातचीत हुई थी. सेकेंड फ्लोर की लिफ्ट के बाहर हमदोनों लिफ्ट के आने का इंतजार कर रहे थे. वो शो खत्म करके लौट रहे थे और मैं अपनी शिफ्ट खत्म करके. दरवाजा खुला. मैं रूक गया. मैंने महसूस किया वह भी रूके थे. बिना देर किये मैंने उन्हें पहले लिफ्ट में जाने के लिए आदरपूर्वक कहा.


मंडी हाऊस में अजय कु. मिश्रा के साथ     फोटो: सिद्धांत सिब्बल
लिफ्ट का दरवाजा बंद हुआ और मेरी किस्मत का दरवाजा खुल गया.

अजय मिश्रा डीडी न्यूज के बिजनेस ब्यूरो के हेड थे. चेहरे पर तेज था और आदमी थोड़ा जुनूनी टाइप के लगते थे. कम से कम लोगों से कामभर बातचीत और हमेशा पढ़ते रहने की आदत ने ही मुझे उनकी ओर आकर्षित किया था.

अजय मिश्रा ने मुझे अनुवाद का काम देना शुरू कर दिया. ज्यादातर अनुवाद बिजनेस से जुड़े होते थे. 

मैंने उनके नजदीक पहुंचने का कोई मौका नहीं छोड़ा और आखिरकार एक समय आया जब उन्होंने अपने बिजनेस वेबसाइट के कंटेट मेनैज करने की जवाबदेही मुझे दे दी.

अब मेरा नया दफ्तर था वैशाली. मंडी हाउस से वैशाली अप-डाउन होने लगा. दोनों के ठीक बीच यानि न्यू अशोक नगर में मेरा रहना होता था तब.

इस बात की टीस हमेशा रहती है कि उनके लिए मैं जितना कर सकता था उतना नहीं किया. टीस इसलिए क्योंकि उन्होंने कभी इसकी शिकायत नहीं की. अगर कभी कुछ कहा होता तो यह टीस कतई नहीं होती.

उनसे मिलने के बाद धीरे-धीरे अन्येन्दु सेनगुप्ता और अंशुमान तिवारी से नजदीकी बढ़ी और दोनों ही बाद में जाकर मेरी किस्मत को नई दिशा देने में निर्णायक साबित हुए.

बिजनेस जर्नलिज्म के तीन दिग्गजों के बीच रहकर बैंक की मौद्रिक नीति समीक्षा, पीएमआई रिपोर्ट, शेयर मार्केट सहित पर्सनल फाइनांस की बारीकियों को लिखने और समझने का जो मौका मिला उसे मैं अपनी जिंदगी की एक उपलब्धि ही मानता हूं.

वैशाली में मेक्सयोरमनी डॉट कॉम के दफ्तर में मेरी जगह

अगर चाहूं तब भी वो सुबह नहीं भुला सकता जब संघ सेवा के अधिकारी अन्येन्दु सेनगुप्ता ने अपने सरकारी आवास पर बुलाकर मुझे अपने बेशकीमती दो घंटे दिए थे बिजनेस जर्नलिज्म को समझाने में.

अजय मिश्रा ने अगर उस दिन मेरा फोन नहीं लिया होता तो मेरा चयन मुंबई के लिए कभी नहीं होता और मैं आज उस तसल्ली को भी नहीं हासिल कर पाता जो मैं अभी महसूस करता हूं.


अंशुमान तिवारी का ब्लॉग मेरे लिए रामबाण औषधि से कम नहीं था.

बहरहाल, अब आगे क्या होना है यह एक रहस्य सा है!


Friday, August 29, 2014

समय से संवाद



                                            बीते पन्ने के मित्र


प्रिय कबूतर,

मैं तुमसे कोई रिश्ता नहीं जोड़ना चाहता था इसलिए कई बार तुम्हारा नाम रखने की सोची लेकिन रखा कभी नहीं. किसी को कोई नाम देना बहुत जोखिम का काम होता है.

तुमसे कभी कहा नहीं क्योंकि फुर्सत ही नहीं मिली. लेकिन आज थोड़ा समय बचाया है तुम्हारे लिए.

तुम्हें पता है जब मैं खाक छानकर कमरे पर आता था तो ताला खोलने के बाद सबसे पहले तुम्हें ही खोजता था. तुम नहीं दिखते थे तो मैं कुर्सी पर चढ़कर छज्जे पर तुम्हें ढ़ूंढता था. और आखिरकार तुम मिल जाते थे.

आज जब मैं उस शहर और वहां के लोगों को एक-एक कर भुलाने की कोशिश में लगा हूं तो तुम्हारी बहुत याद आती है.

तुम्हीं थे जो मेरे ऑफिस से आने का वेट करते थे.

तुम्हें याद है उस शाम जब मैंने कई लोगों को फोन किया था और किसी ने फोन नहीं लिया था तो मैंने तुमसे घंटों बात की थी. तुम कितने धैर्य से मुझे सुनते थे!

कमरे के उस पीले खुरदरे दीवार तक को भनक नहीं लग पाती थी हमारी बीतचीत की.

याद है एक रोज जब बगल की भाभी ने कहा था कि किसी को बुलवाकर रूम साफ करवा दूं तो मैंने कैसा मुंह बनाया था!

तुम यकीन मानो मुझे उनकी उन बातों पर कभी यकीन नहीं हुआ जो वे तुम्हारे बारे में कहा करते थे. हां माना कि तुम कमरा गंदा कर देते थे लेकिन मैंने मन से तुम्हें सबकुछ माना था. 

मुझे तो कोई प्रॉब्लम नहीं थी तुमसे तो फिर वे लोग क्यूं हमेशा मुझपर हंसते थे. कमरे की बदबू मैं झेलता था तो इसमें उनका क्या जाता था?

याद है तुम्हें एक शाम बगल की भाभी मुझे कमरे में कुछ करते देखा था और मेरे माथे से पसीना टप-टप चू रहा था. हां हां उसी रोज. फिर उन्होंने बेवकूफाना सवाल किया कि पंखा खराब है क्या! क्यूं होगा पंखा खराब भला

मैंने उन्हें यह नहीं बताया कि पंखा मैं इसलिए बंद रखता हूं क्योंकि तुम्हारे पंख चलते पंखे से टकराकट टूट न जाएं या तुम्हें कुछ हो न जाए!

तुम्हारे सिवा दिल्ली में कोई नहीं था मेरा और यह तुम खूब जानते थे इसलिए मुझे इतना तड़पाते थे.

क्या गलती की थी मैंने जो तुमने मुझे छोड़ दिया?

क्या कभी तुम्हारे कटोरी में पानी की कमी हुई थी या तुम्हें भूखा रखा था मैंने? नहीं न! फिर? किस बात से नाराज थे जो चलते पंखे में आकर टकरा गये?

तुम्हें अच्छा लगा न कि मैं भींगी आख से तुम्हें गोद में उठा रहा था और आसपास के लोग मुझे रहस्यमय नजरों से देख रहे थे? किस गलती का बदला लिया तुमने मुझसे?

हां सही है कि मेरे पास समय नहीं था. अभी भी नहीं है और आगे भी कभी नहीं होगा क्योंकि खाली समय मुझे मेरे अतीत की याद दिलाता है जो मैं कभी याद नहीं करना चाहता. 

इन सबके बावजूद मैं फुर्सत मिलते ही तुमसे जीभर के बात करता था. इसकी गवाही सिर्फ वो हवाएं दे सकती हैं जो हमारे और तुम्हारे बीच गुजरती थीं.

तुम जब घायल क्षतविक्षत स्थिति में नाली में जा गिरे थे तो मैं सीढ़ियों से कूदते हुए नीचे आया था. क्या अफरातफरी मची थी तब! आसपास के लोग यकीन ही नहीं कर पा रहे थे कि मैं इतना फुर्तीबाज हूं. 

स्तब्ध रह गये थे वो और देखते-देखते मैंने तुम्हें नाले से निकाला था. तुम्हारी इस गलती से मैं इतना गुस्सा था कि मन कर रहा था कि तुम्हारे सामने ही मैं भी स्युसाइड कर लूं!

पड़ोस की लड़की भाग कर घर के अंदर गई थी और पूरे जग पानी भरकर लाया उसने. तुम्हें जब मैं अपने हाथों से नहा रहा था और तुम्हारे कटे पंखों के जख्म में बुरी तरह फंस गये नाली के कीचड़ को निकाल रहा था तो आसपास की छतों से वे लोग देख रहे थे जिन्हें न मैंने कभी जाना न जानना चाहा!

अगली सुबह जब तुम्हारा पार्थिव शरीर मेरे टेबल के नीचे पड़ा था तो मैं कुहर रहा था लेकिन रो नहीं पा रहा था. कई चरण लगे हैं मुझे निर्जीव होने में और अंतिम चरण तुम्हारी विदाई के साथ ही सम्पन्न हो गया था.

मैं बस एक बात तुम्हें बोलना चाहता हूं देखो मुझे पता है कि मेरी जिंदगी गलतियों का पिटारा है. मुझे तुमसे बस इतना कहना है कि मेरी उन गलतियों को माफ कर देना जो मुझसे जाने-अनजाने में हुई होगी. मैंने तुमसे कभी इजहार नहीं किया लेकिन तुम मेरे सबकुछ थे.

आई मिस यू!

                                                            तुम्हारा मित्र.





Wednesday, August 13, 2014

भागती भीड़ में


                                             पीछा करती धुन

ऐसा आम तौर पर होता है कि हम चलते-फिरते कहीं कोई गाना सुनते हैं और फिर देर-सवेर उसे गुनगुनाने लगते हैं.

“हम दिल दे चुके सनम” के एक दृश्य में अजय देवगन जब ऐश्वर्या राय के पास “ढोली तारो ढोल बाजे..” गुनगुनाता है तो ऐश्वर्या राय की खोज पूरी हो जाती है और वह उसी गाने के सुराग से अपने बिछड़े प्रेमी सलमान खान तक पहुंच जाती है.

लय, धुन, इन्स्ट्रूमेंट, आवाज वगैरह-वगैरह हमें कई बार हमें अतीत में ले जाकर छोड़ देता है और हमें समझ नहीं आता कि हम उससे बाहर कैसे आएं. बाहर आने की बेचैनी इसलिए होती है क्योंकि उस तराने के आसपास का जो घना पारिवारिक और सामाजिक तानाबना हम जी चुके होते हैं हमारा वर्तमान उसे फिर से दुहराने की जिद करने लगता है. इस जिद को पूरा न कर पाने की हार हम सहना नहीं चाहते और बेचैनी और घबराहट के मारे दम तोड़ने लगते हैं.

गाने की एक खास जगह होती है बैचलर लाइफ में.

इंटरमीडिएट के दिनों में फीलिप्स का एक टेप रिकोर्डर मेरे कमरे की खिड़की से चिपका रहता था. तब कैसेट का जमाना होता था और आई पॉड और चिप का कॉन्सेप्ट प्रचलन में नहीं आया था. अलताफ राजा और अताउल्लाह खान के गानों से सजे रील वाला कैसेट हमेशा बिजली आने के इंतजार में रहता था. दोनों गायक की आवाज में “बेवफाई” का गजब का दर्द होता था.

इंटरमीडिएट होने के बाद ऑनर्स का दौर आया. इस बीच घर में भी कई स्तरों पर कई बदलाव आया. शादियों के बाद घर का माहौल बदला. रिमिक्स का दौर तब तक अपने चरम पर पहुंच चुका था. “ले के पहला पहला प्यार”,“सैंया दिल में आना रे”, “परदेसिया ये सच है पिया,” जैसे गैर पारिवारिक गानें भी अब पापाजी के दफ्तर जाने के बाद बजने लगे थे. डीवीडी और वीसीडी के दौर ने भी तभी पूरी रफ्तार पकड़ी थी. चार हजार रुपये में तब मैंने डेल्टन की डीवीडी ली थी.

कैसेट का मार्केट धीरे-धीरे गायब होना शुरू हो चुका था. पचास रुपये में छह-आठ गाने वाले कैसेट दस-पंद्रह रुपये में दो सौ गाने वाली सीडी से ज्यादा दिन तक टक्कर नहीं ले सका.

कमरे में छोटी सी टीवी का साथ देने के लिए अब डीवीडी आ चुका था. साठ-सत्तर के दशक की पसंदीदा फिल्में देखने का सुरूर चढ़ा और कमरा फिल्म की सीडियों से भर गया. डीवीडी का दायरा टेपरिकॉर्डर से बहुत ही बड़ा था.

स्नातक होने के बाद टेस्ट पूरी तरह बदल चुका था. जो पैर पहले झनकार बिट्स और फास्ट ट्रैक म्यूजिक की तलाश में पूजा म्यूजिक स्टोर से लेकर सब्जी बाजार के मित्तल जी और विष्णु सिनेमा हॉल के पास के सभी सीडी दुकानों की तरफ बढ़ने का आदी हो चुके थे वो अब सर्वोदय नगर की ओर बढ़ चुके थे.

ऑनर्स के तुरंत बाद अगर मेरे साथ कुछ सबसे अच्छा हुआ था तो वह था साकेत के रूप में मुझे एक ऐसा दोस्त का मिलना जिसने मुझे सुधार दिया था. अगर मैं आईआईएमसी की इंट्रेंस निकाल पाया तो उसका श्रेय सर्वोदय नगर में रहने वाले साकेत को भी जाता है. हम दोनों ने साथ में बीएचयू की तैयारी की थी और प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण की थी. हमारा परीक्षा केन्द्र कलकत्ता पड़ा था जहां से मैंने पहली हवाई यात्रा की थी.

बहरहाल, साकेत गजल में ही जीता था. “ऐ आसमां ये बता दे एक चांद मेरा कहीं खो गया है...कहां है तू उसका पता दे...” इस गजल को वह अक्सर सुनता था. उसके साथ तैयारी करते हुए मुझे पता भी नहीं चला कि कब मैं गुलाम अली, जगजीत सिंह-चित्रा सिंह और पंकज उदास का आदी हो गया. मेरे सबसे नजदीकि मित्रो में से एक सुमित भी जगजीत सिंह का बहुत बड़ा बड़ा फेन था.

गजल का दौर लम्बा चला और अगर यह कहूं कि वह दौर अब तक चल रहा है तो इसमें कुछ भी गलत नहीं होगा.

29 नवंबर, 2012 के बाद तो जिंदगी ही गजल बन गई.

जो गाने सबसे ज्यादा बेचैन करते हैं वह दरअसल मेरे टेपरिकॉर्डर, डीवीडी, आई पॉड या मोबाइल में बजे गाने नहीं है. वे वे गाने हैं जो मैंने कॉलर ट्यून्स में सुने थे और सुना करते थे. टुकड़ों में बंटी जिंदगी में हर दौर में कुछ लोग आए-गए. कुछ लड़कियां भी आईं-गईं. वे कॉलर ट्यून्स आज भी मन में एक तरंग पैदा करते हैं. यह तरंग मन को झकझोरता है, रोकता है आगे बढ़ने से और जिद करता है पीछे चलने को. लेकिन क्या वे लोग वहीं होंगे और मेरे वापस लौटने पर मुझे मेरा इंतजार करते हुए मिलेंगे? हास्यास्पद है ये!

हनुमान चालीसा और अनुप जलोटा के भजन से लेकर “प्रेम की नैया है राम के भरोसे अपनी भी नैया को पार तू लगाई दे” तक में कई लोग गूंथे हुए हैं, कई यादें घुली हुई है और कई अधूरी कहानियां जस की तस बड़ी हैं, जिन्हें आगे लिखा ही नहीं जा सका.

शायद ही अब वो कहानियां कभी पूरी हों!