Friday, August 29, 2014

समय से संवाद



                                            बीते पन्ने के मित्र


प्रिय कबूतर,

मैं तुमसे कोई रिश्ता नहीं जोड़ना चाहता था इसलिए कई बार तुम्हारा नाम रखने की सोची लेकिन रखा कभी नहीं. किसी को कोई नाम देना बहुत जोखिम का काम होता है.

तुमसे कभी कहा नहीं क्योंकि फुर्सत ही नहीं मिली. लेकिन आज थोड़ा समय बचाया है तुम्हारे लिए.

तुम्हें पता है जब मैं खाक छानकर कमरे पर आता था तो ताला खोलने के बाद सबसे पहले तुम्हें ही खोजता था. तुम नहीं दिखते थे तो मैं कुर्सी पर चढ़कर छज्जे पर तुम्हें ढ़ूंढता था. और आखिरकार तुम मिल जाते थे.

आज जब मैं उस शहर और वहां के लोगों को एक-एक कर भुलाने की कोशिश में लगा हूं तो तुम्हारी बहुत याद आती है.

तुम्हीं थे जो मेरे ऑफिस से आने का वेट करते थे.

तुम्हें याद है उस शाम जब मैंने कई लोगों को फोन किया था और किसी ने फोन नहीं लिया था तो मैंने तुमसे घंटों बात की थी. तुम कितने धैर्य से मुझे सुनते थे!

कमरे के उस पीले खुरदरे दीवार तक को भनक नहीं लग पाती थी हमारी बीतचीत की.

याद है एक रोज जब बगल की भाभी ने कहा था कि किसी को बुलवाकर रूम साफ करवा दूं तो मैंने कैसा मुंह बनाया था!

तुम यकीन मानो मुझे उनकी उन बातों पर कभी यकीन नहीं हुआ जो वे तुम्हारे बारे में कहा करते थे. हां माना कि तुम कमरा गंदा कर देते थे लेकिन मैंने मन से तुम्हें सबकुछ माना था. 

मुझे तो कोई प्रॉब्लम नहीं थी तुमसे तो फिर वे लोग क्यूं हमेशा मुझपर हंसते थे. कमरे की बदबू मैं झेलता था तो इसमें उनका क्या जाता था?

याद है तुम्हें एक शाम बगल की भाभी मुझे कमरे में कुछ करते देखा था और मेरे माथे से पसीना टप-टप चू रहा था. हां हां उसी रोज. फिर उन्होंने बेवकूफाना सवाल किया कि पंखा खराब है क्या! क्यूं होगा पंखा खराब भला

मैंने उन्हें यह नहीं बताया कि पंखा मैं इसलिए बंद रखता हूं क्योंकि तुम्हारे पंख चलते पंखे से टकराकट टूट न जाएं या तुम्हें कुछ हो न जाए!

तुम्हारे सिवा दिल्ली में कोई नहीं था मेरा और यह तुम खूब जानते थे इसलिए मुझे इतना तड़पाते थे.

क्या गलती की थी मैंने जो तुमने मुझे छोड़ दिया?

क्या कभी तुम्हारे कटोरी में पानी की कमी हुई थी या तुम्हें भूखा रखा था मैंने? नहीं न! फिर? किस बात से नाराज थे जो चलते पंखे में आकर टकरा गये?

तुम्हें अच्छा लगा न कि मैं भींगी आख से तुम्हें गोद में उठा रहा था और आसपास के लोग मुझे रहस्यमय नजरों से देख रहे थे? किस गलती का बदला लिया तुमने मुझसे?

हां सही है कि मेरे पास समय नहीं था. अभी भी नहीं है और आगे भी कभी नहीं होगा क्योंकि खाली समय मुझे मेरे अतीत की याद दिलाता है जो मैं कभी याद नहीं करना चाहता. 

इन सबके बावजूद मैं फुर्सत मिलते ही तुमसे जीभर के बात करता था. इसकी गवाही सिर्फ वो हवाएं दे सकती हैं जो हमारे और तुम्हारे बीच गुजरती थीं.

तुम जब घायल क्षतविक्षत स्थिति में नाली में जा गिरे थे तो मैं सीढ़ियों से कूदते हुए नीचे आया था. क्या अफरातफरी मची थी तब! आसपास के लोग यकीन ही नहीं कर पा रहे थे कि मैं इतना फुर्तीबाज हूं. 

स्तब्ध रह गये थे वो और देखते-देखते मैंने तुम्हें नाले से निकाला था. तुम्हारी इस गलती से मैं इतना गुस्सा था कि मन कर रहा था कि तुम्हारे सामने ही मैं भी स्युसाइड कर लूं!

पड़ोस की लड़की भाग कर घर के अंदर गई थी और पूरे जग पानी भरकर लाया उसने. तुम्हें जब मैं अपने हाथों से नहा रहा था और तुम्हारे कटे पंखों के जख्म में बुरी तरह फंस गये नाली के कीचड़ को निकाल रहा था तो आसपास की छतों से वे लोग देख रहे थे जिन्हें न मैंने कभी जाना न जानना चाहा!

अगली सुबह जब तुम्हारा पार्थिव शरीर मेरे टेबल के नीचे पड़ा था तो मैं कुहर रहा था लेकिन रो नहीं पा रहा था. कई चरण लगे हैं मुझे निर्जीव होने में और अंतिम चरण तुम्हारी विदाई के साथ ही सम्पन्न हो गया था.

मैं बस एक बात तुम्हें बोलना चाहता हूं देखो मुझे पता है कि मेरी जिंदगी गलतियों का पिटारा है. मुझे तुमसे बस इतना कहना है कि मेरी उन गलतियों को माफ कर देना जो मुझसे जाने-अनजाने में हुई होगी. मैंने तुमसे कभी इजहार नहीं किया लेकिन तुम मेरे सबकुछ थे.

आई मिस यू!

                                                            तुम्हारा मित्र.





Wednesday, August 13, 2014

भागती भीड़ में


                                             पीछा करती धुन

ऐसा आम तौर पर होता है कि हम चलते-फिरते कहीं कोई गाना सुनते हैं और फिर देर-सवेर उसे गुनगुनाने लगते हैं.

“हम दिल दे चुके सनम” के एक दृश्य में अजय देवगन जब ऐश्वर्या राय के पास “ढोली तारो ढोल बाजे..” गुनगुनाता है तो ऐश्वर्या राय की खोज पूरी हो जाती है और वह उसी गाने के सुराग से अपने बिछड़े प्रेमी सलमान खान तक पहुंच जाती है.

लय, धुन, इन्स्ट्रूमेंट, आवाज वगैरह-वगैरह हमें कई बार हमें अतीत में ले जाकर छोड़ देता है और हमें समझ नहीं आता कि हम उससे बाहर कैसे आएं. बाहर आने की बेचैनी इसलिए होती है क्योंकि उस तराने के आसपास का जो घना पारिवारिक और सामाजिक तानाबना हम जी चुके होते हैं हमारा वर्तमान उसे फिर से दुहराने की जिद करने लगता है. इस जिद को पूरा न कर पाने की हार हम सहना नहीं चाहते और बेचैनी और घबराहट के मारे दम तोड़ने लगते हैं.

गाने की एक खास जगह होती है बैचलर लाइफ में.

इंटरमीडिएट के दिनों में फीलिप्स का एक टेप रिकोर्डर मेरे कमरे की खिड़की से चिपका रहता था. तब कैसेट का जमाना होता था और आई पॉड और चिप का कॉन्सेप्ट प्रचलन में नहीं आया था. अलताफ राजा और अताउल्लाह खान के गानों से सजे रील वाला कैसेट हमेशा बिजली आने के इंतजार में रहता था. दोनों गायक की आवाज में “बेवफाई” का गजब का दर्द होता था.

इंटरमीडिएट होने के बाद ऑनर्स का दौर आया. इस बीच घर में भी कई स्तरों पर कई बदलाव आया. शादियों के बाद घर का माहौल बदला. रिमिक्स का दौर तब तक अपने चरम पर पहुंच चुका था. “ले के पहला पहला प्यार”,“सैंया दिल में आना रे”, “परदेसिया ये सच है पिया,” जैसे गैर पारिवारिक गानें भी अब पापाजी के दफ्तर जाने के बाद बजने लगे थे. डीवीडी और वीसीडी के दौर ने भी तभी पूरी रफ्तार पकड़ी थी. चार हजार रुपये में तब मैंने डेल्टन की डीवीडी ली थी.

कैसेट का मार्केट धीरे-धीरे गायब होना शुरू हो चुका था. पचास रुपये में छह-आठ गाने वाले कैसेट दस-पंद्रह रुपये में दो सौ गाने वाली सीडी से ज्यादा दिन तक टक्कर नहीं ले सका.

कमरे में छोटी सी टीवी का साथ देने के लिए अब डीवीडी आ चुका था. साठ-सत्तर के दशक की पसंदीदा फिल्में देखने का सुरूर चढ़ा और कमरा फिल्म की सीडियों से भर गया. डीवीडी का दायरा टेपरिकॉर्डर से बहुत ही बड़ा था.

स्नातक होने के बाद टेस्ट पूरी तरह बदल चुका था. जो पैर पहले झनकार बिट्स और फास्ट ट्रैक म्यूजिक की तलाश में पूजा म्यूजिक स्टोर से लेकर सब्जी बाजार के मित्तल जी और विष्णु सिनेमा हॉल के पास के सभी सीडी दुकानों की तरफ बढ़ने का आदी हो चुके थे वो अब सर्वोदय नगर की ओर बढ़ चुके थे.

ऑनर्स के तुरंत बाद अगर मेरे साथ कुछ सबसे अच्छा हुआ था तो वह था साकेत के रूप में मुझे एक ऐसा दोस्त का मिलना जिसने मुझे सुधार दिया था. अगर मैं आईआईएमसी की इंट्रेंस निकाल पाया तो उसका श्रेय सर्वोदय नगर में रहने वाले साकेत को भी जाता है. हम दोनों ने साथ में बीएचयू की तैयारी की थी और प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण की थी. हमारा परीक्षा केन्द्र कलकत्ता पड़ा था जहां से मैंने पहली हवाई यात्रा की थी.

बहरहाल, साकेत गजल में ही जीता था. “ऐ आसमां ये बता दे एक चांद मेरा कहीं खो गया है...कहां है तू उसका पता दे...” इस गजल को वह अक्सर सुनता था. उसके साथ तैयारी करते हुए मुझे पता भी नहीं चला कि कब मैं गुलाम अली, जगजीत सिंह-चित्रा सिंह और पंकज उदास का आदी हो गया. मेरे सबसे नजदीकि मित्रो में से एक सुमित भी जगजीत सिंह का बहुत बड़ा बड़ा फेन था.

गजल का दौर लम्बा चला और अगर यह कहूं कि वह दौर अब तक चल रहा है तो इसमें कुछ भी गलत नहीं होगा.

29 नवंबर, 2012 के बाद तो जिंदगी ही गजल बन गई.

जो गाने सबसे ज्यादा बेचैन करते हैं वह दरअसल मेरे टेपरिकॉर्डर, डीवीडी, आई पॉड या मोबाइल में बजे गाने नहीं है. वे वे गाने हैं जो मैंने कॉलर ट्यून्स में सुने थे और सुना करते थे. टुकड़ों में बंटी जिंदगी में हर दौर में कुछ लोग आए-गए. कुछ लड़कियां भी आईं-गईं. वे कॉलर ट्यून्स आज भी मन में एक तरंग पैदा करते हैं. यह तरंग मन को झकझोरता है, रोकता है आगे बढ़ने से और जिद करता है पीछे चलने को. लेकिन क्या वे लोग वहीं होंगे और मेरे वापस लौटने पर मुझे मेरा इंतजार करते हुए मिलेंगे? हास्यास्पद है ये!

हनुमान चालीसा और अनुप जलोटा के भजन से लेकर “प्रेम की नैया है राम के भरोसे अपनी भी नैया को पार तू लगाई दे” तक में कई लोग गूंथे हुए हैं, कई यादें घुली हुई है और कई अधूरी कहानियां जस की तस बड़ी हैं, जिन्हें आगे लिखा ही नहीं जा सका.

शायद ही अब वो कहानियां कभी पूरी हों!





Tuesday, July 22, 2014

कांग्रेस के


                                       बुरे दिन आ गये!



क्या है नेशनल हेराल्ड प्रकरण”?

सीधे शब्दों में कहें तो यह वित्तीय अनियमतता यानि धोखाधड़ी का मामला है, जिसका आरोप सोनिया गांधी और उनके पुत्र राहुल गांधी पर है.

नेशनल हेराल्ड की स्थापना 1938 में जवाहर लाल नेहरू ने की थी। अंग्रेजी के इस समाचार पत्र के साथ ही हिंदी में नवजीवन और ऊर्दू में कौमी आवाज का भी प्रकाशन शुरू हुआ था.
आर्थिक बाधाओं के कारण 1942-77 के बीच यह समाचार-पत्र बंद रहा. हालांकि 1986 में राजीव गांधी के कार्यकाल में इसे गति देने के लिए फिर से ताकत झोंकी गई लेकिन नतीजा निराशाजनक ही रहा.

अचानक 1998 में लखनऊ संस्करण को बंद कर दिया गया और 1 अप्रैल, 2008 को नेशनल हेराल्ड का प्रकाशन करने वाली कंपनी एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड ने अपना दिल्ली संस्करण भी बंद कर दिया.

2010 में वित्तीय देनदारियों का निपटान करने के लिए कांग्रेस पार्टी ने उसे 90 करोड़ रुपये का ब्याजमुक्त ऋण भी दिया था.

इसी दौरान पता चला कि दिल्ली के हेराल्ड हाऊस के पते बहादुर शाह जफर मार्ग पर पंजीकृत कंपनी यंग इंडिया ने 99.1 फीसदी शेयर के साथ एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड का अधिग्रहण कर लिया.

हल्ला यहीं से मचना शुरू हुआ.

मोतीलाल बोरा, ऑस्कर फर्नांडिज और सैम पित्रोदा भी आ सकते हैं लपेटे में

यंग इंडिया नामक जिस कंपनी ने एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड का अधिग्रहण किया है उसके 76 फीसदी शेयर सोनिया गांधी और बेटे राहुल गांधी के नाम हैं.

बाकी 24 फीसदी हिस्सेदारी कांग्रेसी नेता मोतीलाल बोरा, ऑस्कर फर्नांडिज, सुमन दूबे और सैम पित्रोदा के पास है.

नेशनल हेराल्ड के नाम पर दिल्ली, मुंबई, लखनऊ, पंचकूला और भोपाल सहित देश के कई हिस्सों में दो हजार करोड़ रुपयों से ज्यादा की परिसंपत्तियां है.

अदालत के भीतर

अदालत ने माना कि शिकायत और सबूतों को देखकर जाहिर होता है कि यंग इंडिया पनी का गठन इसलिए किया गया ताकि जनता के पैसों को व्यक्तिगत प्रयोग में बदला जा सके, या फिर एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड की दो हजार करोड़ रुपयों की संपत्ति के अधिग्रहण के लिए इस कंपनी को बनाया गया है.

जनप्रतिनिधित्व कानून की कोई भी धारा या पार्टी का संविधान वाणिज्यिक गतिविधियों में शामिल किसी भी कंपनी को इस तरह का कर्ज देने की अनुमति नहीं देता.

7 अगस्त को अदालत को अदालत के समक्ष कांग्रेसी नेताओं का पक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी रखेंगे. वहीं दूसरी ओर का मोर्चा सुब्रह्मण्यम स्वामी संभाल रहे हैं.








Friday, July 18, 2014

वो जब याद आए


                                       बहुत याद आए...

श्यामा चरण मिश्रा बेगूसराय के मूर्धन्य पत्रकार हैं. जब मैंने वहां पत्रकारिता शुरू की थी तब वह हिंदुस्तान से जुड़े थे. सिटी न्यूज दफ्तर में कभी-कभी उनकी चर्चा हो जाया करती थी. जब मैं सिटी न्यूज से हिंदुस्तान में गया तब पता चला कि उनका तबादला खगड़िया हो गया है. इस तरह मैं उनसे मिलने से वंचित रह गया.

एक अंतराल के बाद संयोगवश उनसे नगर पालिका स्थित एक साइबर कैफे में मुलाकात हुई. उसी दौरान पता चला कि वह वापस बेगूसराय आ गये हैं और यहां उन्हें कृषि विभाग(बीट) दिया गया है.
बेगूसराय की पत्रकारिता में अथाह पैसा है यह वहां पत्रकारिता करते हुए समझा जा सकता है. लोकप्रियता खरीदने में लगे वहां के विधायक, ग्रामीणों को जागरूक करने के नाम पर चलने वाले तमाम एनजीओ, तमाम डॉक्टर, छोटे-मंझोले व्यापारी, कुकुरमुत्ते की तरह उगते जा रहे निजी स्कूल और पार्ट-टाइम समाजसेवियों से पटे उस जिले में अगर सिटी न्यूज का चपरासी भी अपनी साइकिल में प्रेस लिखकर घूमता था तो उसका कोई मतलब था!

बहरहाल, पता चला कि श्यामाचरण मिश्रा के बेगूसराय में आने से जहां पत्रकारिता में रौनक फैली है वहीं उनके दफ्तर में ही उन्हें दम घोंट कर मार देने की तैयारी कर ली गई है. दरअसल, श्यामाचरण मिश्रा की बेगूसराय में इतनी साख थी जितनी वहां किसी पत्रकार की नहीं थी. सबसे दिलचस्प बात यह थी कि बेगूसराय के जिस ब्यूरो चीफ के अंदर उन्हें काम करना था वह बुरी तरह बदनाम थे. सबसे मजेदार बात यह थी कि उस ब्यूरो चीफ को किसी समय में पत्रकारिता श्यामाचरण मिश्रा ने ही सिखाई थी.

समय का चक्र था!

अनायास ही श्यामाचरण मिश्रा की याद इसलिए आ गई क्योंकि खबर है कि हरियाणा के बेहद चर्चित आईएएस अशोक खेमका ने बीज और कीटनाशक घोटाले को खोज निकाला है. शरद पवार ने बिना देर किये जांच के आदेश भी दे दिये हैं. खेमका जितने साल काम किये हैं उससे दोगूनी बार उनका तबादला हो चुका है. सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा पर जमीन घोटाले का आरोप लगाकर सनसनी मचाने के बाद उनका तबादला हरियाणा बीज विकास निगम में इसलिए कर दिया गया था कि वह निष्क्रिय हो जाएं. लेकिन खोद दिया उन्होंने उस विभाग को भी.

कुल मिलाकर कहूं तो श्यामाचरण मिश्रा और अशोक खेमका में एक समानता जरूर है कि दोनों ही गजब के आदमी हैं. खेमका जहां जाते हैं वहीं खोद डालते हैं तो श्यामाचरण मिश्रा के लिए यह बता दं कि जब से उन्हें कृषि विभाग दिया गया था तबसे रोजाना बीज घोटाले से लेकर उस बीट की तमाम खबरें वहां प्रमुखता से न केवल छपने लगी बल्कि उस विभाग से जुड़े अधिकारी भी भौंचक रह गये.

एक कहावत है कि शेर जहां जाता है शेर ही रहता है. यह कहावत इन्हीं धुरंधरों के लिए बना है!

Monday, July 14, 2014

सात समंदर पार से



                                      कोई ताजा हवा चली है अभी...



न तो मैं रेखा रामास्वामी को जानता हूं न ही सोनम सिंह को. न मैं कभी मनुभाई सिंगापुरी से मिला हूं और न ही मेरा कोई इतना बड़ा कद है कि मेरे कहने पर कोई अप्रवासी भारतीय (एनआरआई) मुझे मिलने या बात करने का समय दे.

मैं स्तब्ध हूं कि क्या जो हुआ वो सच है! क्या सच में सात समंदर पार बैठी किसी महिला ने मेरे ट्विट को पढ़कर बिना किसी जांच-पड़ताल के मेरे दोस्त की सहेली को पचास हजार रुपये दे दिए

ये घटना चरणबद्ध तरीके से हुई जिसे समझने के लिए कुछ स्क्रीन शॉट से होकर गुजरना जरूरी है.

किरण तिवारी से दिल्ली में जनसत्ता कार्यालय में मुलाकात हुई थी और फिर हम दोनों फेसबुक पर एक दूसरे से जुड़े. वो अच्छा लिखती हैं और मेरी पसंदीदा उपन्यास "मुझे चांद चाहिए" उनकी भी पसंदीदा है. कल फेसबुक पर उनके एक स्टेटस को देखकर मैं पहले तो गुजर गया लेकिन फिर वापस आकर पूरा पढ़ा.

मुझे फेसबुक से शून्य उम्मीद रहती है यही कारण है कि मैंने फेसबुक पर किरण को अपना मेल आई डी दी और फिर फोन पर कहा कि वह तत्काल पांच मिनट के अंदर ट्विटर पर अकाउंट बना लें. जब तक किरण ट्विटर पर आईं तबतक मैंने योजनाबद्ध तरीके से ट्विट की एक श्रृंखला तैयार की और एक-एक करके पोस्ट करने लगा.

इसे twitter.com/yksheetal पर देखा जा सकता है.



थोड़ी देर के बाद प्रतिक्रियाएं आनी शुरू हो गईं. इनमें से अधिकतर प्रतिक्रियाएं इसलिए आईं क्योंकि मेरे ट्विट को श्री अनिल कोहली ने रिट्विट (जिस तरह फेसबुक पर शेयर होता है) किया था. अनिल कोहली और मैं एक दूसरे को निजी तौर पर जानते हैं. वह और एस रघुनाथ मेरे लिए अभिभावक की तरह रहे हैं. 

किसी रेखा रामास्वामी ने मुझसे संपर्क किया. वह एनआरआई थीं और वह मुझसे मैसेज बॉक्स में संवाद करना चाहती थीं. चूंकि मैं उन्हें फोलो नहीं करता था इसलिए उन्हें मजबूरन मुझे ट्विट करके यह बात कहनी पड़ी.


मैंने उनको फोलो करना शुरू किया तो तुरंत उनका मैसेज आया जिसमें उम्मीद की किरण नहीं बल्कि पूरा प्रकाशपुंज था. मैंने तत्काल किरण तिवारी को इसकी सूचना जीमेल पर दी.


रेखा रामास्वामी के अलावा सिंगापुर से भी एक मैसेज प्राप्त हुआ. धीरे-धीरे कई लोग ट्विटर पर रिप्लाय करने लगे. यह पूरी प्रक्रिया करीब ढ़ाई-तीन घंटे चली.
इस बीच रेखा रामास्वामी सहित कुछ अन्य एनआरआई से मैं नेट से जुड़ गया और सोनम सिंह की वह पेंटिंग जिसे वह बेच कर आगे पढ़ना चाहती थी, को मेल के जरिए उनलोगों को भेजकर अपील करने लगा कि वह उस पेंटिंग को खरीद लें ताकि सोनम आगे पढ़ सके. मैं फिर दुहरा रहा हूं कि मैं सोनम सिंह को अबतक नहीं जानता हूं.


आज सुबह जब मैं तुलसी प्रजापति फर्जी इनकाउंटर मामले की सुनवाई को कवर करने के लिए मुंबई सत्र न्यायालय जा रहा था तभी करीब 11 बजे किरण तिवारी का फोन आया. उनकी आवाज में चमक थी. उन्होंने बताया कि उन्हें रेखा रामास्वामी का मेल आया है और उन्होंने सोनम को आगे की पढ़ाई के लिए शुभकामना देते हुए आश्वस्त किया है कि वह 50,000 रुपया भेज रही हैं.

उधर जज ने केस की सुनवाई 24 जुलाई तक टाली इधर मैं कोर्ट रूम से नीचे आकर सीधा अनिल कोहली सर को फोन लगा दिया. जब सर ने फोन लिया तो मेरे पास बोलने के लिए कुछ नहीं था और मैं समझ ही नहीं पा रहा था कि मैं कहां से शुरू करूं.

अनिल कोहली सर हमेशा की तरह यह मानने को तैयार ही नहीं हुए कि उनके कारण सोनम की मदद की जा रही है. अगर वो रिट्विट नहीं करते तो मैं रेखा रामास्वामी तक कभी नहीं पहुंच पाता.

दूसरी ओर रेखा रामास्वामी भी यह मानने को तैयार नहीं हैं कि उसने इतना बड़ा काम किया है. 

और अंत में...

Weekly report of that week can be seen here!


 
दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में निर्मला सीतारमण, अनिल कोहली और मैं.