Thursday, March 19, 2015

Speechless Love


After alleged murder of IAS D K Ravi, his dog emotional a due!



Sunday, March 15, 2015

It happens...


                                   Misa Bharti episode : My view


As soon as I came to know about the complete episode of Misa Bharti, I started recalling uncountable moments I countered on different occasions.

I wonder why people are giving hype to this issue. When I write “People”, I want everyone to be under the ambit, especially those whom I personally experienced.

No!

Being a youth and experiencing the same thing in my life, I want to express some feelings on her behalf. She may agree or disagree but I cannot control my anguish of expression.

First of all, let my confess that I have been a victim of English and till my IIMC days my English was not up to the mark so my classmates(not friends) used to tease and mock me. So, please don’t lose your patience during reading this item.

One thing what I notice from the episode is, Misa is a dreamer.

I remember my college days when I used to speak before mirror and always try to kick off an argument with anyone so that I could develop my skill of speaking.

Dreamer Yogesh with his friends during a show on CNBC Awaz

                           





These are “fake” pics. I confess I asked someone to click this. There are two aspects of these pics.

First, I wanted others to watch me in this style and let them think according to the messages, carried by this pic. Second, I wanted myself to see as a speaker.

It happens. Misa Bharti is a human being. Instead of making her embarrassed we should introspect and remember those moments when we were willing to be clicked with some big-wigs.

Misa may have issued wrong statement or tried herself to be looked as she dreamt herself to be but one thing which emerged from this episode is that a dream has been buried in her heart and the dream is yet to be fulfilled. I wish, she may fulfill her dream.

                                         
Dream matters : Real or Fake!


In “Special 26”, We experience mind of a man, who lose his dream in a close contest. Dream never dies and if it dies it is considered as the most dangerous thing.
Pash has written in his Poetry,

                        “Sabse Khatarnaak hota hai sapno ka mar jana”

We must remember that Misa Bharti had also contested national election. Of course, she lost the election but at least she shown courage to fight. It matters! Think it. Twice. Thrice. More and More…

I have no hesitation to say that Misa Bharti wants her identity to be separate from her well-known father.

A girl/lady/woman wants her separate identity should always be admired even after her few mistakes like what she allegedly did.  

One pic reminds me my days of dreaming to appear on TV Screen.  Had I not been selected for DD News, this pic would have made me embarrassed even more than Misa Bharti.

So, again I wish Misa’s dream to be fulfilled.

------------- 

Some more pics...

Fake speech delivery in IIMC on Annual Day

Total Fake!

Fake that time

I don't drink but this pic was needed for other purpose


I feel happiness and complete satisfaction to share that all my dreams come true!






Sunday, February 15, 2015

समय से संवाद




                                           बीता बरस

सबकुछ भर चुका है दिमाग से लेकर बिस्तर पर पड़े रहने वाले कागजों के ढेर तक.

लैपटॉप ऑन करते ही ध्यान आता है कि डेस्कटॉप पर सेव तमाम फाइलें अबतक वैसे ही पड़ी हैं, कई आर्टिकल आधे लिखे हैं और एक नोवेल जो मैं पिछले एक साल से लिखने की कोशिश कर रहा हूं वह भी आधी-अधूरी सेव है.

किचन-वॉशरूम में कुछ काम करवाना है जिसकी याद तभी आती है जब वहां जाता हूं.

कमरा खोलते ही नजर किताबों के रेक पर पड़ती है. कई नई किताबें जो फ्लिपकार्ट से ऑर्डर करके पढ़ने के लिए मंगाई थी, वैसे ही पड़ी हुई है. मेरे साथ गोवा, कोल्हापुर, दिल्ली, बिहार आदि जगहों पर वे किताबें मेरे साथ घूम चुकी है लेकिन जिस उद्देश्य से उसे खरीदा था वह अब तक पूरा नहीं हुआ है.

जूता पहनते हुए याद आता है कि अरे मेरे पास फॉर्मल शू तो है ही नहीं, वुडलैंड पहनकर ही काम चल रहा है. फॉर्मल शू लेने का प्लान करीब सात महीने से बन रहा है लेकिन अब तक लिया नहीं गया.

बिस्तर पर आते हुए ध्यान आता है कि दो चादर जो लौंड्री वाले को देना था वह वैसे ही कमरे के एक कोने में रखा हुआ है कब से.

टेबल पर रखे फ्रंटलाइन, इंडिया टुडे, ईपीडब्ल्यू सहित तमाम पत्र-पत्रिकाएं मुझसे सवाल करती हैं कि मुझे कब पढ़ोगे योगेश और मैं चुपचाप उसे एक नजर देखकर रह जाता हूं.

ये कैसा अंतहीन दौर है जो बस आज-कल-परसों के बीच कटता जा रहा है!

सबकुछ बदल चुका है. रिश्ते अब कहीं नहीं हैं.

घर के जो लोग हाल-चाल पूछते थे अब नहीं पूछते. अब काम की बात होती है. इधर से भी उधर से भी.

कल सुबह पांच बजे उठा दीजिएगा, सात बजे की बुलेटिन में लाइव है

-----------
अररिया से मुगलसराय का टिकट उस डेट में बना देना
-----------

जिंदगी में हमेशा चुनना पड़ता है. सुबह या शाम, ये या वो, ऐसे या वैसे, इतना या उतना, अब या तब, इसका या उसका....

शहर छूटा तो दोस्ती भी दम तोड़ती चली गई. फोन और फेसबुक के वेंटिलेटर पर कुछ दोस्ती अगर बची भी है तो बस बची ही है, उसमें अब वो असर और गर्मी नहीं रही.

चौकन्ना रहना इतना जरूरी कभी नहीं था जितना अब है.

वो लड़की हर बात में हमेशा बोलती है. अगर किसी ने उससे एक बार मदद मांगी तो वह बाद में कहेगी कि मैं हमेशा तुम्हारी मदद की हूं. अगर कोई उसे कहेगा कि आज उसकी तबियत ठीक नहीं है तो वह कहेगी कि हमेशा इसकी तबियत खराब ही रहती है. अगर किसी ने गलती से अपनी किसी घटना का जिक्र करके थोड़ा अफसोस कर लिया तो वह कहेगी कि ये हमेशा रोता ही रहता है...
अंदर और बाहर की जिंदगी कई बार समांतर होते हुए भी समान सी हो जाती है.

अंदर की उलझन बाहर न दिख जाए इसके लिए बरती गई सारी सतर्कता और सावधानी धरी रह जाती है.

अरे कल तुम्हारा हेडफोन यहीं छूट गया था...तुम्हारी डायरी यहीं रह गई थी कल...उस केस का पूरा प्रिंट आउट तो तुम यहीं भूल गये थे कल...अरे आज तुम्हारा शाम में कवरेज था न!....
कोर्ट से निकलकर जब दोपहर में जोर की भूख लगती है तभी याद आता है कि लंच बॉक्स तो कमरे पर ही रह गया...!

---------------------------------------------       

प्रिय तुम,
      अब समय गुजर रहा है तो फिर गुजर ही जाने दो. अब आने का कोई फायदा नहीं. जितना बिगड़ना था उतना बिगड़ चुका है. अब अगर तुम आ भी गई तो बस कहानियां बचेगी सुनाने को क्योंकि मन का वह हिस्सा दम तोड़ चुका है, जो तुमसे अबतक गुहार लगाता रहा कि आओ और इन तमाम उलझनों को सुलझाने में मेरी मदद करो. बदले में सबकुछ ले लो.

      अंतर्विरोध और उलझनों में मैं अब भी फंसा हूं लेकिन अब और तब में अंतर है. तब मेरे पास यह सबकुछ नहीं था जो अब है. अब मेरे पास वो तमाम अच्छी यादें हैं जो मुझे जिलाती रहेंगी.

      पिछले एक साल में मैंने वो तमाम तस्वीरें खिंची हैं और खिंचाई हैं जिसे देखकर मैं खुद को यकीन दिला सकता हूं कि मैं मरा नहीं हूं.

      तुम्हारा आना अब बेमतलब ही होगा क्योंकि तीसरा पहर तो कट गया. अब बस पूरा दिन कैसे अच्छे से गुजरे इसके लिए मुझे मेहनत करनी है जो मैं कर रहा हूं. तुम आती तो शायद मुझे उतना अभिनय नहीं करना पड़ता जितना मैंने किया.

-----------------------------  

      गर्मी एक अच्छा मौसम है. पसीने से भींगे लोग अच्छे लगते हैं. हाथ घुमा कर बांह से मुंह पोछते लोग. मुंबई में इस मौसम को देखना और भी दिलचस्प है.
-----------------------------

      मुंबई पहला प्यार है. 14 फरवरी, 2014 को दिल्ली-मुंबई राजधानी से ही आया था दिल्ली से मुंबई. वेलेंटाइन डे के रोज. राजधानी की खिड़की में लगे लंबे शीशे से बाहर की लोकल में चिपके लोगों को देखकर ही प्यार आ गया था मुंबई पर. वह प्यार अब भी कायम है और आगे भी कायम रहे...बस यही कामना है!

--------------------------------

समय का पौधा:
हम दोनों से समय का एक पौधा लगाया है. दोनों अनिश्चितताओं से घिरे हैं. ये पौधा बड़ा होकर एक अच्छा समय होगा और उसका फल हमदोनों को उन बीमारियों से मुक्त कर देगा जिससे हम दोनों ग्रसित हैं.

अनहद सब्र चाहिए इस पौधे को बड़ा करके परिपक्व बनाने के लिए.
कभी लगता है हो पाएगा. कभी लगता है नहीं हो पाएगा.
------------------------------

और आखिर में...

मुंबई में सालभर की कुछ तस्वीरें






















and now, my first live!!
















      

Tuesday, February 3, 2015

दुनिया मेरे आगे



                                 कैंसर के समांतर चलती जिंदगी


ऐसे समय में जब मैंने सोचना करीब-करीब पूरी तरह छोड़ दिया है, लिखना तनाव मोल लेना ही है. आ बैल मुझे मार जैसा कुछ! क्योंकि लिखने के लिए सोच का संग्रह चाहिए जिससे थोड़ी-थोड़ी मात्रा में आप उसे निकालकर शब्दों में अनुवादित करके परोस दें. बिना सोचे लिखने का यह नया अनुभव है!

पहले भी कई बार कुछ ऐसी महिलाओं को देखा था जिनके सर के बाल मुड़े होते थे या बहुत छोटे होते थे. कभी जिज्ञासा नहीं हुई जानने की कि उन महिलाओं ने ऐसा क्यूं किया!

ऑफिस के गेस्ट हाऊस के जिस डॉरमेट्री में फरवरी से अप्रैल तक ठहरा था वहीं मुझे यह पता चला कि कीमो लेने के बाद उसके असर से बाल झड़ जाते हैं. कीमो में सांप का जहर होता है ऐसा उनके पति ने बताया. कीमो कैंसर रोगियों को दिया जाता है ऐसा मैंने कुछ लोगों को कहते हुए सुना था.

एक आदमी जिसे यह पता हो कि वह कभी भी मर सकता है, उसके लिए जीना कैसा होता होगा?

दस विदानियां फिल्म की तरह वह भी अपने सपने साकार कर लेना चाहता होगा या फिर मुन्ना भाई एमबीबीएस के उस मरीज की तरह अस्थिरता के चरम बिंदू पर जाकर दोलन करता होगा. या फिर संभव है कि सफर फिल्म के राजेश खन्ना की तरह बची जिंदगी कल्पना के सागर में रम जाना चाहता होगा.

उस दंपति में जो मैंने महसूस किया वह इन सबसे अलग था.


पति के चेहरे पर कभी चिंता नहीं दिखी लेकिन यह हमेशा महसूस होता रहा कि उसके अंदर एक और पति है जो हमेशा रो रहा है. पत्नी के चेहरे पर कभी कैंसर का डर नहीं दिखा लेकिन हमेशा लगता रहा कि वह सबकुछ समझ रहीं हैं.

आदमी कितना भी कोशिश कर ले स्त्री जैसा धैर्य नहीं धर सकता. स्त्रियों के साथ अबतक के व्यवहारिक अनुभवों से मैं कई बार इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं.

एक रोज दफ्तर के बाहर वह जोड़ा मिल गया. पता नहीं क्या मन हुआ हम तीनों पास के एक मंदिर चले गये. मंदिर में हम तीनों ने थोड़ा समय बिताया. मैं छुप-छुप कर उस महिला को देखता. काफी कोशिश करने के बाद भी मुझे उनकी आंख में वह नहीं दिखा जो मैं देखना चाह रहा था. कोई बेबसी नहीं!

उनके पति से पता चला कि वह भी सरकारी नौकरी में हैं और कैंसर से पीड़ित होने के बावजूद न केवल दफ्तर का काम आम सहकर्मियों की ही तरह करती हैं बल्कि घर भी देखती हैं, वैसे ही जैसे अन्य महिलाएं देखती हैं.

फिर रुक क्या रहा है?

इस सवाल पर आकर मैं ठहर जाता हूं. आखिर क्या है जो रुक गया? सिवाय इसके कि वह कभी भी निर्जीव हो सकती हैं ऐसा क्या है जो उन्हें बाकी महिलाओं, बाकी पत्नियों, बाकी मांओं या फिर बाकी महिलाओं से अलग कर रहा है? कुछ भी तो नहीं!
फिर?

------------------------------------------------------------------------------------------------- 

कई बार यह सोचता हूं कि सरकारी नौकरी की तरह ही अगर जिंदगी में भी वीआरएस यानि स्वैच्छिक सेवानिवृत्त का विकल्प होता तो समाज कैसा होता! फर्ज कीजिए कि किसी की एक बेटी है और उसका सपना है कि वह उस बेटी की शादी किसी आईएएस से कर दे. उसका सपना पूरा हो गया.

इसी तरह किसी का एक बेटा है और वह उसे पायलट बनाना चाहता है. मान लीजिए उसका बेटा पायलट बन गया. इसी तरह वैसे लोग जिनके सपने पूरे हो गये तो वह बची नौकरी का भला क्या करेंगे?
जिंदगी में सपना देखना और उसे पूरा करना ही सबकुछ है.

जो लोग सपना नहीं देखते और ऑटो मोड पर चलते जाते हैं वह पता नहीं कैसी जिंदगी जीते हैं. लेकिन ऐसा लगता है कि उनकी जिंदगी कम से कम उन लोगों की जिंदगी से अच्छी होती होगी जिन्होंने जवानी में सपने देखे और फिर उसे जवानी में ही पूरा कर लिया लेकिन फिर वह दूसरा सपना नहीं देखना चाहता.

सपने की कीमत होती है.

एक सपने के लिए दूसरे सपने की कीमत भी देनी होती है. मान लीजिए किसी लड़के ने किसी लड़की को चाहा लेकिन वह लड़का प्रोफेशनली वह नहीं बनना चाहता है जो उस लड़की के परिवार वाले चाहते हैं. ऐसे में लड़के को अपने दो सपनों ने किसी एक को ही चुनना होगा. वह जीत जाता है लेकिन फिर बाकी जिंदगी के लिए उसका कोई मकसद नहीं रह जाता क्योंकि वह सपने देखना छोड़ देता है इसलिए नहीं कि सपनें वह देख नहीं पता बल्कि इसलिए कि वह अपने सपनों को विकल्प के रूप में नहीं देखना चाहता!

------------------------------------------------------------------------------------------------------

पटना के उस परिवार ने जिस तरह कैंसर को बिल्कुल भाव ही नहीं दिया है, ऐसा लगता है कि जिंदगी की अब वास्तविक कीमत उतनी नहीं रह गई है कि लोग इसे खोने में डरते हैं. अब जिंदगी बस कटने और कटते जाने का नाम है.
कैंसर अगर बिना दर्द का वीआरएस होता तो कितना अच्छा होता.

------------------------------------------------------------------------------------------------------

और आखिर में जब मैं उन्हें दादर स्टेशन पर विदा करने गया तो लौटते हुए यह फोटो अपने साथ लेते हुए गेस्ट हाऊस आ गया...










Saturday, November 8, 2014

समय से संवाद


                                             इंतजार और सही



प्रिय तुम,

      रोज तुम्हें मिस करता हूं. ऐसे समय में जब हर व्यक्ति दूसरा लगता है, हर शख्स परेशान लगता है, और हर फॉन कॉल एक जवाबदेही देकर ही कटता है, मैं दो पल तुम्हें सोचने में खर्च करता रहता हूं.

      तुम्हारा आना शायद मुमकिन न हो इन परिस्थितियों में, लेकिन इस उम्मीद में कि तुम एक दिन आओगी, हर दिन कटता जाता है.

      टेबल पर जो कोरे कागज पसरे रहते हैं उन्हें मैं रोज कुछ न कुछ लिखकर गंदा कर देता हूं. किसी पर किसी न्यूज का इनपुर, किसी पर किसी का मोबाइल नंबर, किसी पर संक्षिप्त डायरी-शायरी या फिर किसी कागज पर कोई पेंटिंग बैठे-बैठे बनाने लगता हूं. अगली सुबह जब कुर्सी पर बैठता हूं तो सामने कोई कागज कोरा नहीं रहता लिखने के लिए और झल्ला जाता हूं. फिर तुम्हारी कल्पना करके सोचता हूं कि तुम होती तो रोज टेबल पर कुछ कोरे कागज मेरे लिए सहेजकर रख दिया करती ताकि मैं उसे गंदा कर सकूं.

      लिखने की लत पुरानी है. लिख-लिख कर ही तो पूरा दौर काट दिया!

      किसी किसी सुबह अनायास ही तुम्हारी कल्पना करके सोचने लगता हूं कि तुम होती तो याद से मुझे नींद आने के बाद मेरा लैपटॉप बंद कर दिया करती. फिर तुम्हारे मुंह से निकलने वाले अपेक्षित वाक्य को सोचकर थोड़ा रोमांटिक सा हो जाता हूं, 

मैं तुम्हारी नौकरानी नहीं हूं अपना लैपटॉप सोने से पहले बंद क्यूं नहीं करते”!

तुम्हारी कल्पनाओं का पूरा आकाश तैयार किया है मैंने. बस इंतजार है कि उस आकाश से कब तुम बादल बनकर उतरोगी और मुझपर अपना रंग चढ़ा दोगी.

कई बार ऐसा लगता है कि मैं हार जाऊंगा और मुझे ही तुमतक आना होगा सबकुछ त्यागकर. यह दौर दरअसल कौन बनेगा करोड़पति जैसा है! मैं अगर खेलना बंद करूंगा तो मैंने अबतक जितना जीता है उसका एक हिस्सा ही ले जा पाऊंगा.

                                          तुम्हारा मैं