Sunday, November 4, 2018

                                               
                                                      अबकी बरस!

कुछ था जो उस वक्त हवाओं में घुल जाता था।

पतंग का मौसम भी करीब होता था और हर गली के पास से उठता हुआ धुआं उस खुशी को बढ़ा देता था। कचरा खरीदने वाली जिसे महानगर में भंगार बोला जाता है, तब और अधिक सक्रिय हो जाया करती थी। सुबह से ही उसकी आवाज सुनाई देनी शुरू हो जाती थी। घर के बच्चों को बस इंतजार होता था मम्मी के इशारे का और फिर वे तुरंत बाहर निकलकर आवाज का पीछा करने लगते। आवाज जिस भी गली से आती वह उसे छान लेते और फिर भंगारवाले को घर पर बुलाकर रद्दी, काम न आने वाला सामान, पुराने चप्पल जूते, घड़ी की बैट्री वगैरह देकर कुछ रुपये लिये जाते थे।

बगीचे और गलियों में झाडू देकर कचरा एक जगह जमा करने के बाद पूरे दिन छोड़ दिया जाता था ताकि वह धूप में सूख सके। सूखने के बाद केरोसीन छीट कर उसे जलाया जाता था और जलने के बाद जो महक उठती वह दीपावली की आहट होती थी जिसे सूंघकर मन बागबाग हो जाता था।

स्कूल के दिनों की इन यादों को जीते हुए कितना अच्छा लगता है। स्कूलों की छुट्टियां, घर से मिले कुछ रुपये, दीपावली की खरीदारी, सजावट, कपड़े, घरकुंडे, मुरही-बताशा, शंठी, हुक्कापाती और एक शांत वातावरण!

पापाजी फिजुलखर्ची बिल्कुल नहीं करना चाहते थे। बनाबनाया हुक्कापाती न लेकर वह शंडी और सोन लेकर घर आते थे और फिर दिन के करीब दो बजे रेडियो सुनते हुए वह खुद ही शम्मत बनाते थे। अपने बाल खुद काटना उनका शौक है और बाल सैलुन में कटवाना भी वह एक तरीके से फिजुलखर्ची मानते थे। हालांकि हमलोगों को सैलुन भेजने में कभी हिचकिचाते उन्हें नहीं देखा। एक मध्यवर्गीय परिवार का मुखिया एक कुशल प्रबंधक होता है।

दीपावली का वह दौर, जो कि बहुत लंबा नहीं चला, भाता था। आसपास में हमउम्र के लड़कों का होना भी इसकी एक वजह थी। सब लड़के रात में छत पर पटाखा फोड़ते थे। पटाखे में दिलचस्पी न होने के बावजूद छत पर आकर अच्छा लगता था। हर तरफ रोशनी, हर तरफ कुछ लोगों का समूह, परिवार की लड़कियों का पड़ोस की लड़कियों के साथ छत पर गपशप, किसी का पटाखा फोड़ते हुए डरना, किसी का बहुत खुश होना, किसी का एक कोने में खड़े रहकर सबकुछ देखना और किसी का बस वहां होने भर से पूरे माहौल का उमंगित होना, कितना भाता था तब!

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दिल्ली में मनहूसियत कभी कम तो कभी ज्यादा हावी रही। कई बार चूक जाने की आशंका मन को भारी कर देती थी। मालूम चले कि किसी को बैंक की नौकरी लग गई तो मन बैठने सा लगता था। इतना बड़ा सपना देखना क्या सही था?

दीपावली को घर जाने से झिझक होने लगी। इंजीनियरिंग की होड़ में सभी इंजीनियर होने लगे और जो बचे वे बैंक की तैयारी में खप रहे थे। पत्रकारिता क्या कोई करियर भी हो सकता है? दिल्ली में क्या पढ़े और उससे क्या हासिल कर लिया? सरकारी नौकरी तो नहीं मिलेगी!

न्यू अशोक नगर एक स्लम ही तो था। दीपावली में घर नहीं जाने का सबसे बड़ा खतरा तो यह होता था कि आसपास के लोगों में यह कौतूहल का विषय होता था। तुम घर नहीं गये? नहीं गया। छुट्टी नहीं मिली क्या कंपनी में?

कंपनी? स्लम वाले लोग कंपनी में ही तो जाते हैं! कंपनी। वाह। अच्छा है।

योगेश भैया का कमरा अंधेरा है..आप मोमबत्ती नहीं जलाये?
जलाऊंगा बाबू...अभी कुछ काम कर रहा हूं।

लैपटॉप में रखी तस्वीरें ऐसी तन्हाइयों में ही तो काम आती है। चैत से लेकर फागुन तक की रंगबिरंगी तस्वीरों के बीच कटती दिल्ली की वह तन्हा रात यूं ही तन्हा रह जाती अगर खुशी चुपके से कमरे में घुसकर मोमबत्ती न जला देती।

पड़ोस की वह बच्ची जिस आत्मविश्वास से मेरे कमरे में घुसी थी, वह चौंका देने वाला था। अपने कमरे की निजता का इतिहास कुछ ऐसा रहा है कि कमरे का दरवाजा खुला दिखने पर घर के बाकी लोग उसे भिरका दिया करते थे कि कहीं कोई भूल से मेरे कमरे में न आ जाए!

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भाग्य के साथ यह पहली दीपावली है। प्रधानमंत्री का शिर्डी दौरा नहीं होता तो शायद हम दशहरा भी साथ मना पाते!
इस बार शायद दीपावली त्यौहार की तरह मने। रौशनी हो, पटाखे हों, मिठाइयां हो और कई सालों का बकाया ब्याज हो!

Wednesday, October 31, 2018


                                                 अच्यतानंद साहु के दरम्यान


अच्युतानंद साहु की शहादत के बाद संयोगवश आज अपने कैमरामेन के कई संस्मरण साझा करने का मौका मिला।

झबुआ में खराब सड़कों के बीच करीब बीस किलोमीटर प्रति घंटे की गति से जा रही दूरदर्शन की गाड़ी से कैमरा चोरी हो जाना, फिर कैमरा विभाग द्वारा सभी कैमरामेन की सैलरी से उसका रुपया काटना और फिर जाकर तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के हस्तक्षेप के बाद हुई पुलिस दबिश से कैमरा का मिलना।

इसी तरह झबुआ के उन बदमाशों की कहानी जो लूटपाट करते हुए हत्या जरूर करते थे क्योंकि बिना हत्या या मारकाट किये लूटपाट करने को वह फोकट का खाना मानते थे और उन दुर्दांतों का मानना होता था कि रुपये यूं ही नहीं लेने चाहिए बल्कि उसके लिए मेहनत करना चाहिए और मेहनत के अंतर्गत मारकाट आता था।

इसी तरह कोहिमा में वहां के अलगाववादियों द्वारा मना करने के बाद भी दूरदर्शन के कैमरामेन का वहां जाना। अलगाववादियों द्वारा एक कैमरामेन के कनपटी पर बंदूक तान देना और फिर कैमरामेन कै बहादुरी से यह कहना कि वह वहां अपनी ड्यूटी के लिए आया है। अलगाववादी द्वारा दोनों कैमरे को कुएं में फेंक देना।

इसी तरह राजीव गांधी के प्रेस कांफ्रेंस के दौरान एक पत्रकार को उसके नाम से बुलाना और हालचाल पूछने के दौरान पत्रकार का यह कहना कि उसे चाय नहीं दी गई और फिर राजीव गांधी का प्रेस वार्ता को थोड़ी देर के लिए स्थगित करके उस कैमरामेन के लिए चाय मंगवाना। 

Monday, October 8, 2018

UPSC-IIS

                                           
                                                                Oops!

Although this is not the first and only setback in last few years but it's definitely the one which has jolted each and every emotions of my sense.

I was very much confident to get, at least, shortlisted for this interview but all I learnt from the website is, I missed it.

What I missed, a table-kursi job, a permanent job, a status, an ensured family life, a government quarter, an opportunity to work in my hometown, an ensured leave schedule, medical reimbursement and ultimately a fearless life.

Should I regret? To some extent, a regret is justified because it was the only golden opportunity which I got coincidentally last year but at the same time I can this setback for grated as well.

Overall, a bad day of this year.

Oops!   

Thursday, October 4, 2018


                                                      पहचान                         

ऐसा क्या है जो पिछले कुछ सालों में वैसा नहीं रहा जैसा था! रिश्ते, नौकरी, जगह, लोग, समय या फिर मैं खुद!

तुम मुझे कैसे जानती हो?
तुम्हें मुहल्ले में देखा है।
अच्छा तो तुम मुझे मुहल्ले से जानती हो?
नहीं, तुम्हारे बारे में पड़ोस की दीदी ने बताया...कि तुम मोनू के भाई हो।
कौन मोनू?

"कौन मोनू" टाइप करते हुए लगा कि समय अब भी वही है। बदला नहीं।

मोनू कौन? उस चैट को बेनतीजा खत्म करने के थोड़ी देर बाद लगा कि भले ही रिश्ते, नौकरी, जगह, लोग या फिर मैं खुद बदल रहा हूं लेकिन समय नहीं बदला।

अगर हाइपोथिटिकल होकर सोचा जाए तो चीजें कितनी बदली हुई होती अभी!

बेगूसराय से विदा लिए दशक होने को आए लेकिन पहचान तो वही रही। संदर्भ तो वैसा ही मिला। चेहरे तो वही रहे। और तुम?

काश तुम इनसब चीजों को एकबार अपनी आंखों के सामने घटित होते हुए देखते। काश तुम यह देख पाते कि किस तरह उस एक घटना ने सिलसिलेवार अनगिनत घटनाओं के होने की वजह बना और किस तरह कई निर्दोष लोग उसकी चपेट में बारी-बारी से आते चले गये।

इस बीच बसी एक अलग सी दुनिया को हमेशा समेटे रहने की जरूरत कब पैदा हुई उसका ठीक-ठीक पता मुझे भी नहीं है।

जो डर 2003-2004 के समय पैदा हुआ, वह डर वैसे ही बहुत समय बाद तक बना रहा। उस डर को उस छोटे से चैट ने फिर से ताजा कर दिया।


Tuesday, September 25, 2018


                                                     ये कौन सा दयार है!

नसीरुद्दीन शाह पुरानी फिल्मों में भी जंचते हैं और नई में भी। मैं हू न, इजाजत और मासूम तीनों ही फिल्मों में उन्होंने उस आदमी भी निभाई है जो एक्स्ट्रा मेरिटल अफेयर का मारा है और भयानक रूप से पसोपेश की स्थिति में आ चुका होता है।

रेखा के साथ रेलवे स्टेशन के उस वेटिंग हॉल का नजारा हिंदी फिल्म के सुनहरे नजारों में से एक है। फिल्म इजाजत में शाह और रेखा की जिंदगी का जो हिस्सा दिखाया जाता है वह गरमाहट और तनाव दोनों से भरा है। शाह का अतीत उसके वर्तमान से इस तरह गुंथता जाता है कि शाह कहीं के नहीं रहते और अंत में इजाजत लेकर रेखा चली जाती है। रेखा का इजाजत लेने वाला वह दृश्य उन आशिकों के लिए दर्दनाक है जो उसे समझने की कोशिश करते हैं।

मैं हूं ना और मासूम में वह कमोवेश एक ही तरह गिरगिराते नजर आते हैं। एक्स्ट्रा मेरिटल अफेयर से शाह को जो बेटा रहता वह उनकी कानूनी पत्नी को मंजूर नहीं होता वैसे ही जैसे फिल्म मासूम में होता है। मासूम में एक नया पेंच यह रहता है कि शाह दो बेटियों के बाप रहते हैं।

दो बेटियों का बाप होते हुए एक संयोगवश हुए बेटे की घटना और एक बेटा होते हुए संयोगवश हुए बेटे की बात में जो बुनियादी फर्क है उसकी जड़ें सामाजिकता से होते हुए कई रास्ते तक जाती है। खैर!