Monday, October 16, 2017

अनुराग की याद में...


                                        कुछ पुराने पन्नों की कतरनें                                                   

"मुझे चांद चाहिए" पहली हिंदी उपन्यास थी जिसे उतना लीन होकर पढा था जितना कि "अनुराग" को पढ़ा। ऐसा कई बार हुआ है कि दुनियादारी के किसी घने असमंजस में पड़ा हूं और अनंत छोड़ तक कोई नहीं है इसी बीच कोई साहित्य आकर सहारा दे जाये! अनुराग ऐसा ही सहारा दे गया। 

2012 के किसी महीने का कोई दिन था और दिल्ली में वह एक आम दिन की तरह ही बीत रहा था। मैं अपनी कुर्सी पर बैठा खबरों का संपादन कर रहा था। दिन के करीब ग्यारह बज रहे थे और अखबार छपने के लिए करीब-करीब तैयार था। 

सात और नौ पृष्ठ की अंतिम प्रूफ रीडिंग की और कुछ संपादन करके ऑपरेटर को उसे आगरा भेजने को कह दिया। डीएलए का मुख्य संस्करण आगरा से ही प्रकाशित होता था।

सबलोग चाय पीने के लिए बाहर निकले और मैं भी कंप्यूटर शट टाऊन करने लगा। फोन बजा। लगा आगरा से होगा!

हैलो, हमलोगों का एक कार्यक्रम है हम आपको उसमें बुलाना चाहते हैं (महिला की आवाज थी)
क्या कार्यक्रम है...आपने मेल किया है क्या...
नहीं आप अपना मेल आईडी दे दीजिए...दहेज कानून के दुरूपयोग के खिलाफ...!


                डीएलए अखबार का नोएडी स्थित दफ्तर (तस्वीर : 2012)
किसी महिला का दहेज कानून के खिलाफ कोई कार्यक्रम करने की बात ही चौंकाने वाली थी!  मैंने क्रॉस चैक किया और फिर से पुष्टि की कि सच में वह महिला दहेज पीड़ित नहीं बल्कि दहेज कानून के दुरुपयोग के खिलाफ कोई कार्यक्रम के बारे में बता रहीं थीं। उन्हें अपना ईमेल आईडी दे दिया और बाहर चाय के शौकीन सहकर्मियों को कंपनी देने आ गया। 

जबतक बाहर रहा दिमाग में यह बात घुमती रही कि एक महिला दहेज कानून के दुरूपयोग के लिए कार्यक्रम कर रही है। उत्सुकता बढ़ी तो एक रिपोर्टर को कह दिया कि वह इस खबर को ट्रेक करे! बाद में क्या हुआ उस खबर का याद नहीं लेकिन जो याद रहा वह था उस महिला का नाम। ज्योति तिवारी। वह उनसे मेरी पहली बातचीत थी!

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2012 एक दर्दनाक साल रहा था। 29 नवंबर 2012 को आंधी आई और 5 दिसंबर तक चली। वह एक ऐसी आंधी थी जो अपेक्षित होने के बावजूद उसके लिए पूरी तैयारी नहीं थी। इसकी वजह शायद दिल्ली का वह स्ट्रगल था जो कुछ सोचने के लिए वक्त ही कहां देता था! 

खैर ज्योति तिवारी का नाम ध्यान से गया नहीं और मैंने उन्हें फेसबुक पर खोजा और उनसे जुड़ा। आखिर क्या था जो मुझे ज्योति तिवारी की बातों की तरफ खींच रहा था यह एक लंबी कहानी थी।

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महिलाओं को लेकर मन में द्वंद्व का पहला बीज तब पनपा जब बरखा दत्त ने एक महिला सहकर्मी की मदद से मेरे खिलाफ पुलिस में मामला दर्ज करवाने की असफल कोशिश की। यह पहली बार था जब मैंने नजदीक से देखा कि किस तरह लड़की की मदद लेकर किसी को फंसाया या परेशान किया जा सकता है और इस घटना के बाद महिला ही पीड़ित होती है की सोच निर्णायक रूप से बदल गई।

2016 दूसरा ऐसा अनुभव लेकर आया जिसने महिलाओं को लेकर मेरी धारणा में अजीबोगरीब बदलाव कर दिये। 

"आपको इस बात का गुस्सा नहीं है कि आपने सेक्स क्यूं नहीं किया बल्कि आपको यह गुस्सा है कि मैं लड़की होते हुए अपने मन से सेक्स कैसे कर ली!"

जीवन में जो कुछ कहीसुनी याद रह जाती है वैसी ही एक बात यह थी जो देर तक याद रही। बाद में सतत प्रवाह में बहती गंदगी की तरह यह बात एक किनारे में जा लगी और पानी का प्रवाह सतत चलता रहा। प्रवाह को बनाए रखने के लिए मेरी पत्नी भाग्य कहीं से अतिरिक्त ऊर्जा लेकर आई थी शायद! 

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अनुराग पढ़कर ऐसा लगा कि किसी ने मेरे बारे में लिख दिया हो। अनुराग के अंतिम कुछ पृष्ठ पढ़ते हुए हिम्मत टूट गई और भरी आंखों से दीदी को फोन लगा दिया। उस दीदी को जिसने मुझे अनुराग होने से बचाया था और जिसने कहा था कि तुम अगर खुद को बांध कर रखे हुए हो तो तुम्हें इसपर फक्र होना चाहिए न कि किसी लड़की के कुछ कह देने से तुम्हें इस तरह टूटना चाहिए!


अनुराग सिर्फ उस लड़के की आपबीती नहीं है जो  किसी लड़की के चक्कर में फंसकर सबकुछ बर्बाद कर लेता है, बल्कि अनुराग लड़कों की उस प्रजाति की कहानी है जो बेवजह ही समाज में संदिग्ध हो चुका है। खुद को लेकर ही हीन हो जाने वाले लड़कों के लिए अनुराग काफी कुछ छोड़ गया है।

जैसा कि अनुराग की मौत के बाद एक पत्रकार कहता है कि शायद वह और उसके दोस्त शराब पीकर गाड़ी चला रहे होंगे, यह जतलाता है कि इस प्रजाति पर कितना संदेह माहौल के कारण बना है! हालांकि उस पत्रकार को जब त्वरित जवाब मिलता है कि अनुराग की गाड़ी में रखे शराब की बोतल का सील भी नहीं खुला है, तो वह पत्रकार बेशर्मी से खिसक लेता है।

ज्योति तिवारी ने जिस तरीके से सपाट होकर अनुराग को लिखा है वह सराहनीय है। आसान शब्दों का इस्तेमाल, घटनाओं के सजीव चित्रण के लिए वाक्यों का तालमेल, बेलागलपेट चीजों को उसी तरह रखना और कम से कम शब्दों में सभी बातें कह देना यह कुछ ऐसी चीजें हैं जो अनुराग को बहुत ही खास बनाती है।

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मध्यवर्गीय परिवार और विशेषकर उत्तरी भारत का मध्यवर्गीय परिवार सामाजिक तानेबाने में इस तरह बंधा होता है कि उसपर न केवल अघोषित बंदिशें लगी होती है बल्कि उसे रोजाना की जिंदगी में भी अतिरिक्त सतर्कता बरतनी होती है। 

उदाहरण के लिए अनुराग अपनी दीदी ज्योति तिवारी से सबकुछ साझा करने के बावजूद उस लड़की से हुई अपनी बातों के उस हिस्से को साझा नहीं कर पाता है जो कि उसके लिए बहुत महत्वपूर्ण था। 

यह मध्यवर्ग की मर्यादा है जिसे लाज, शर्म, अनुशासन वगैरह के नाम से भी संदर्भित किया जाता है। अनुराग अगर अपनी बहन को उस लड़की के अतीत के बारे में बता देता तो इसकी गुंजाइश थी कि सिविल सेवा की तैयारी करने वाली उसकी तेज तर्रार बहन उसे उस लड़की के भावनात्मक जाल में फंसने से रोक लेती! अगर नहीं भी रोक पाती तो कम से कम जिस अनुपात में नुकसान हुआ उस अनुपात में उतनी क्षति नहीं होती!

लड़की : "मैं तुमको ब्रॉड माइंडेड समझती थी अनुराग।"

मैं (अनुराग) : "मैं नहीं हूं ब्रॉड माइंडेड. खतम करो बकवास"
                                                                सौजन्य : अनुराग

अनुराग जिस लोकेशन पर फंसा है वहां से उसका निकलना इसलिए मुश्किल था क्योंकि बतौर लड़का उसपर यह मनोवैज्ञानिक दबाव था कि वह साबित करे कि वह ब्रॉड माइंडेड है! यह अलग बात है कि ब्रॉड माइंडेड होने के लिए जो करना पड़ता है वह उसने न कभी अपने परिवार में देखा, न आसपास के समाज में। वह इसलिए ब्रॉड माइंडेड नहीं था क्योंकि वह शराब नहीं पीता था, गर्लफ्रैंड नहीं पालता था, फिजूलखर्ची नहीं करता था और घरवालों की बात मानता था! 

अनुराग के मन में एक टीस थी जो न निकलती थी और न ही रूकती थी। 

टीस इस बात की भी होगी कि जब वह लड़की वालों से कहता है कि वह शादी में कोई शान नहीं चाहता है और साधारण शादी चाहता है तो लड़की वालों ने ही पैसा फेंकने का प्रलाप किया और फिर बाद में उसी पर दहेज का मामला दर्ज करवा दिया। 

गलत काम से अर्जित किये रुपयों का मालिक कैसा होगा इतना सोचने की क्षमता होने के बावजूद अनुराग अगर यह सब देखता रह गया तो यह उसकी नादानी थी और इसकी कीमत उसने बाद में चुका दी। वह लड़की शादी से पहले ही अनुराग के लिए करवाचौथ का व्रत रखती है। 

कमाल है ब्रॉड माइंडेड लड़की के इस अप्रत्याशित से कदम पर भी अनुराग सचेत नहीं होता है। 

पीरियड्स एक ऐसी चीज है जिसका लड़कियां अपने हिसाब से कई बार उपयोग करती हैं और यह कोई रहस्य नहीं है। जो लोग दफ्तर में काम करते हैं, उन्हें मालूम होगा। फेमिनिस्ट विचार वाली उस लड़की ने भी पीरियड्स का बहाना बनाकर अनुराग को खुद से दूर रखा और अचानक एक दिन बताया कि वह मां बनने वाली है। अनुराग को उसने यह यकीन भी दिला दिया कि बच्चा उसी का है। 

फेमिनिज्म के सहारे कितना बड़ा खेल कैसे खेला जाता है यह समझने के लिए अनुराग से अच्छी कोई किताब हो ही नहीं सकती।

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2003 में पहली बार पुलिस लोहियानगर मुहल्ले में आई थी। मध्यमवर्गीय उस परिवार के करीब सभी सदस्यों पर अपहरण का एक मामला दर्ज हुआ था। पुलिस आई तो आसपास के लोग घर के सामने जुटे। तमाशा बना। कहानियां बनीं और पसरीं। पुलिस डराधमका कर चली गई। 

मामला आगे बढ़ा। मोर्चेबंदी शुरू हुई और साहस के साथ लड़ने का निर्णय लिया गया और लड़ाई तबतक चली जबतक कि 2009 में इलाहाबाद में एक होटल में अपहरण का केस दर्ज करवाने वाले उस आदमी की बेटी की लाश पंखे में टंगी हुई न मिल गई।

वह घर अनुराग का नहीं था और अपहरण का केस दर्ज करवाने वाले उस आदमी ने गलती यही की कि उसने उस घर को किसी अनुराग का घर समझ लिया।

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और अंत में...


"SISTERS ARE JOINED HEART TO HEART"








Thursday, September 21, 2017

इस बार का बेगूसराय


                                    हम अपने शहर में जाएंगे मुसाफिर की तरह

बेगूसराय को नए तरीके से देखने के लिए यह अंतिम मौका होगा शायद! अगर इस बार बेगूसराय नया नहीं लगा तो फिर कब लगेगा!

यह पहली बार होगा जब तमाम द्वंद्व को साधते हुए बेगूसराय स्टेशन पर एक लड़का उतरेगा। क्यूं इतना रोमांचित हूं इस बार बेगूसराय जाने के लिए मैं!

हिंदी सिनेमा में कई बार ऐसे दृष्य फिल्माये गए हैं जिसमें धौंस जमाते हुए कोई कहता है कि "दरवाजा उधर है...अब आप जाते हैं कि मैं सिक्युरिटी को बुलाऊं"!

"रहना है तेरे दिल में" में सैफ अली खान अनुपम खेर को दरवाजा दिखाता है जब अनुपम खेर खान को दिया मिर्जा और अपने बेटे के साथ प्यार की बात बताने आता है। खेर मायूस होकर बदनामी को घोंटते हुए दरवाजे की तरफ बढ़ता है। फिल्म आगे बढ़ती है और अनुपम खेर फिल्म खत्म होने से पहले हवाईअड्डे पर खुशी के मारे पागल दिखता है, जब दिया मिर्जा खुद को खान वहां हवाईअड्डे पर लाकर खेर के बेटे को सौंप देता है!

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बेआबरू होकर कहीं से निकलना कैसा लगता होगा! घर से, मुहल्ले से, जिले से, राज्य से और हद से हद तक किसी के मन से, दिल से, डायरी से!

कितने लोग डायरी से बेआबरू होकर निकल लिये इसका हिसाब कभी फुरसत में किया जाएगा और साथ में यह भी हिसाब किया जाएगा कि उनके निकलने की क्या-क्या वजहें रही होंगी!

अपन कितनों की डायरी में आए-गए इसका हिसाब किताब वे करें!

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बेगूसराय एक मनहूस शहर जैसा ही एक जगह रहा है! घुप्प अंधेरे में संभावनाओं की तलाश में कटते हुए दिन-रात एक मनहूसियत से दौर में बीता हुआ समय से ज्यादा और कुछ भी नहीं था।

उस समय में बने हमदर्द ताउम्र हमदर्द बन गये और उस समय में छिटके लोग ताउम्र निशाने पर आ गये।

सिकंदर आईआईएमसी के बाद भी संपर्क में रहा। उसकी बातचीत से कई बार ऐसा लगा कि हम दोनों में काफी चीजें साझी है।

एक बार उसने बताया था कि किस तरह आकाशवाणी में काम करने के दौरान उसे एक बड़ी महिला अधिकारी ने अपमानित किया था। सिकंदर स्वाभिमानी था और उसने वहां से इस्तीफा दे दिया। बहुत दिनों के बाद मालूम हुआ कि सिकंदर सीआईएसएफ में अफसर बन गया है। यूं ही बातचीत में एक बार पूछा कि जाके उस मैडम को अब अपनी शक्ल दिखा दे शायद वह शर्मिंदा हों! सिकंदर ने टाल दिया। वह अब उस दौर में वापस नहीं जाना चाहता था और उसकी बात से ऐसा लगा कि उसने उनको माफ कर दिया या फिर बात को भूल गया।

ऐसा कई बार होता है कि आदमी आगे बढ़ जाने के बाद ऐसे लोगों को सबक सिखाने के बजाय उसको नजरअंदाज कर जाता है।


Friday, September 15, 2017

विशेष


                                             तुम जो मिल गये हो...

एक नेगेटिव मोड से निकलकर दूसरे नेगेटिव मोड में ही फंसते रहना, यह वह प्रक्रिया थी जो सालों से चलती आ रही थी।

हर बार की तरह 14 सितंबर की रात आई और हर बार की तरह मैं बिस्तर पर लंबा होकर गहरे में जाने की तैयारी में लग गया। हर बार की तरह दिवाल ने सहारा दिया लेकिन हर बार की तरह इस बार नींद नहीं आई क्योंकि हर बार की तरह इस बार शून्य नहीं था। इस बार भाग्य थी जो पास में मोबाइल पर रोमांटिक गाने चला रही थी।

12 बजते ही उसने बर्थ डे विश किया। फिर दूध गर्म करने के लिए उठी।

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आदमी चाहे जो भी कह ले प्यार उसे अच्छा लगता है। नाउम्मीद हो चुके आदमी में भले ही प्यार की अपेक्षा खत्म हो जाती है लेकिन कुछ है जो हमेशा इसे जिलाए रखता है।

नाउम्मीदी के एक लंबे दौर को जीने के बाद उमंग खत्म हो जाती है। आदमी दर्शनार्थी की तरह चीजों को देखना शुरू करता है और हर चीज में अंदर तक धंस जाता है। हर चीज को परत दर परत खोलने की लत लगती है और फिर आदमी दूसरों की नजर में फ्रस्ट्रेटेड और अपनी नजर में ऑथेंटिक बनने लगता है।

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...खुशी के लिए रुपयों की जरूरत होती है इसे लेकर स्टैंड तय नहीं हो पा रहा था। अनुभव बताता है कि खुशी आपसी समझदारी के सहारे छोटी चीजों से भी हासिल की जा सकती है!

चीजों को मानकर भी खुशी हासिल की जा सकती है। यह उस सिद्धांत पर आधारित है जिसके तहत कहा जाता है कि आदमी को पहले खुद का सम्मान करना चाहिए।

मान लो कि तुम्हारे पास वह सबकुछ है जो तुम्हें खास और सबसे अलग बनाता है।

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भाग्य को दूध गर्म करने में इतनी देर पहली बार हो रही थी!

क्या कर रही हो
अरे...ठंढा कर रही हूं..

जीवन रात में भी उसी गति से चलती है जिस गति से दिन में चलती है। रात में जीवन स्थिर सा लगता है लेकिन वह स्थिरता आसमान में उड़ रहे हवाईजहाज की तरह ही है, जहां एहसास तो स्थिरता का होता है लेकिन होते हैं सब गति में। कई बार रात की गति दिन की गति से तेज होती है।

देर रात की शांति में मन शांत था। उसी शांत मन में शांति के साथ खयाल भी चल रहे थे और वह निर्बाध चलता रहे इसके लिए जरूरी था कि बकाया सारा काम निपटा कर नींद के आगे आत्मसमर्पण कर दिया जाए।

दूध इतना क्या गर्म हो गया..
बस हो गया..

बीप बीप ने रात की शांति भंग की। किसी अनजान नंबर का मैसेज था और जन्मदिन की बधाई के साथ कोई नाम भी नहीं लिखा था!

मोबाइल सिरहाने में पड़ा था। मोबाइल ऑफ करने के बाद झटके से उठा तो आंख फटी रह गई। भाग्य छिपकर बैलून फुला रही थी और बगल में रखा दूध अपनी गति में ठंढा हो रहा था।

                                                                              जुनून-ए-इश्क
शादी के बाद पहली बार इतना प्यार भाग्य के लिए अचानक से उमड़ा था।

भाग्य जिस धुन में बैलून एक के बाद एक फुलाए जा रही थी, वह धुन पहली बार मैंने देखा था। गर्भ के सातवें महीने में भाग्य ने करीब तीन मिनट में छह बैलून फुला कर तैयार कर दिये थे, वह भी बिना मुझे बताए।

सरप्राइज जारी रखते हुए उसने छिपाकर रखा हुआ केक निकाला और फिर आखिरकार मैंने अबतक का सबसे यादगार जन्मदिन अपनी जीवनसाथी के साथ एंटोपहिल के एक बंद कमरे में मनाया।

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और अंत में...












Friday, September 1, 2017

एक अजीबोगरीब महीना


                                             इस बार का अगस्त


अगस्त एक महीने में ही कई महीना लेकर आया इसबार। बीतते दिनों में कई बार यह संदेह पैदा हुआ कि इसी महीने के किसी दिन घटी कोई घटना शायद पिछले महीने की है और कई बार ऐसा लगा कि इसी महीने के किसी तारीख को होने वाली घटना अगले किसी महीने में होने वाली है।

झटके की शुरुआत उस सन्न कर देने वाले फोनकॉल से हुई जिसने तय कर दिया कि नए ठिकाने की जो संभावना अगस्त के अंतिम दिनों में मिलने वाली थी वह आशंकाओं से घिरी हुई है.

इस फोन कॉल के आगे और पीछे के कुछ दिन दुनियादारी की उलझनों को सुलझाते हुए बीती।

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खाली दिमाग उतना खतरनाक नहीं होता है जितना कि खाली बैठा अफसर। दफ्तर में काफी प्रतिकूल वातावरण रहा। कहीं से शुरू हुई बात कहीं होते हुए कहीं पहुंच गई।

अनुबंध खत्म होने के बाद अगस्त ही पहला महीना था जो बीत रहा था। बीतते हुए इस महीने में बहुत कुछ अप्रत्याशित सा बीता दफ्तर में!

दिल्ली में रहते हुए यह समझ विकसित हुई थी कि किसी कामकाजी आदमी को उसके काम से अलग कर देना उसके लिए सबसे बड़ी सजा होती है।

अन्नू कपूर ने एक शो में किसी अभिनेता के बारे में जिक्र करते हुए कहा था कि किस तरह उस अभिनेता ने अपने संघर्ष भरे दिनों में कई ऐसी घटनाएं देखी थी जब उन्हें उनके मनपसंद काम से हटाकर कोई अलग काम दे दिया जाता था!

उदाहरण के लिए लगातार कोर्ट कवर करने वाले किसी फील्ड रिपोर्टर को अगर उसका दफ्तर दीपिका पादुकोण की प्रेस वार्ता में भेज रहा है तो उस रिपोर्टर के लिए उससे बड़ी सजा कोई हो ही नहीं सकती!

खैर...! अगस्त को बीतना था और वह बीता।

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अजय सर उस दिन काफी परेशान से थे।

काम करेंगे
सर, हम तो काम ही देख रहे हैं..
भेजें कुछ फाईल
भेजिए, प्राइयोरिटी पे देखेंगे..

फिर छह फाईल मेल में आई जिसका अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद करना था। जिस दिन फाईल आई उसके दो-तीन दिनों बाद ही पुणे में एक कार्यक्रम में ऑफिस की तरफ से भेजा गया। दुनियादारी खुद को विस्तारित करती चली गई और नतीजा सिफर रहा।

अपना कमिटमेंट पूरा न कर पाने का बहुत मलाल रहा।

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एक अनुभवी पत्रकार ने फेसबुक पर लिखा कि 2005 के बाद पहली बार ऐसा हुआ कि उनके घर पर अखबार नहीं आया। उनका इशारा घनघोर बारिश की तरफ था, जिसकी भयावहता की तुलना वह 2005 की बारिश से कर रहे थे।

मेरे लिए मुंबई की यह तीसरी बारिश थी, जो कि पहली भयावह बारिश साबित हुई।

होंडा एक्टिवा अच्छी गाड़ी है, डूबने के बाद भी चलती रहती है। वडाला और पांच उद्यान के पास गाड़ी आधी डूबकर भी साथ चलती रही लेकिन हिंदमाता फ्लाईओवर के पास आकर मेरी ही हिम्मत नहीं हुई कि अब गाड़ी को पानी में उतारा जाये!

बारिश चलती रही और उसके समानांतर दफ्तर का फोन भी बरसता रहा! स्काइप पर पहली बार लाईव का अनुभव मिला! भाग्य का दिया सत्तू पराठा एक टैक्सीवाले के साथ उसकी टैक्सी में बैठकर खाते हुए जब शाम के 7 बज गये और दोनों मोबाइल डिस्चार्ज हो गया तो सिवाय जोखिम के कोई विकल्प नहीं बचा।


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करीबियों के फोन तबतक ले चुका था और वह अनुभव बहुत ही सुनहरा रहा!

भाग्य ने पहली बार इतनी बारिश देखी थी और मैं दादर में फंसा हुआ था यह जानकर वह और पूरा परिवार परेशान हो चुका था।

आखिरकार रात आठ बजे जलजमाव के बीच गाड़ी को घुरकाते हुए वडाला तक पहुंचा। वडाला चर्च के पास बड़ा पेड़ गिरने के कारण आवागमन पूरी तरह ठप था। रात करीब ग्यारह बजे तक रास्ता बदलते हुए चार रास्ता तक आने के बाद तय किया कि गाड़ी वहीं छोड़कर कमरे की तरफ बढ़ा जाए क्योंकि थोड़ी ही दूरी से भारी जलजमाव शुरू हो चुका था।

29 अगस्त की वह रात मुंबई में अबतक की सबसे भयानक रात रही।


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पहली बार ऐसा हुआ कि ट्रैफिक पुलिस ने मेरी गाड़ी छूने की न केवल जुर्रत की बल्कि चालान भी काट दिया। विषम परिस्थिति में भी शायद ही मैंने कभी कोई ट्रैफिक कानून तोड़ा हो या फिर सड़क पर कोई स्टंटवाजी की हो!

सुषमा स्वराज के कार्यक्रम को कवर करने का दबाव अन्य खबरों को कवर करने के दबाव से ज्यादा होता है। अपनी ही गाड़ी लेकर बांद्रा कुर्ला कम्प्लेक्स के लिए निकल गया। अफरातफरी में सड़क के किनारे लगी गाड़ियों के बीच अपनी गाड़ी भी लगा दी और अपना आई कार्ड लेकर तेजी से विदेश भवन में घुसा।

फोटो साभार : रूही मलिक
अंदर आने के बाद डीएसएनजी के स्टाफ को कह दिया कि वह गाड़ी पर नजर बनाए रखे। स्टाफ खुद गाड़ी पर बैठ गया लेकिन होनी होकर ही रहती है। प्रचंड बारिश शुरू हुई और वह भागा भागा अपनी गाड़ी में बैठ गया। इसी बीच अगस्त ने अपना असर दिखा गया और गाड़ी को ट्रैफिक पुलिस वालों ने उठा लिया।

436 रुपये के चालान पर वापस गाड़ी मिल तो गई लेकिन एक कलंक लग गया जो अबतक कभी नहीं लगा था।

राज्यपाल के यहां कोई कार्यक्रम था उस दिन! विनित की बाईक थी और मैं पीछे बैठा था। वह बिना हेल्मेट के था और मेरे कहने पर उसने हंसकर टाल दिया। आगे नरीमन प्वांट के चौराहे पर ही ट्रैफिक पुलिस ने आगे हाथ देकर गाड़ी रुकवाई और उसका चालान कर दिया।

विनित को शायद लगा होगा कि मैं दूरदर्शन का हवाला देकर उसका चालान कटने से बचा लूंगा लेकिन जिस समय उसने हेल्मेट पहनने की मेरी सलाह को हल्के में लिया था उसी समय मैंने निर्णय ले लिया था कि इसका साथ देने का मतलब इसका मनोबल बढ़ाना है।

हमें नियम मानना चाहिए, जबतक कि नियम तोड़ने की कोई ठोस वजह नहीं हो।

डीएसएनजी स्टाफ ने ट्रैफिक पुलिस स्टेशन पर जो बात नजरों से कही वह वैसी ही थी जैसे विनित की थी!

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लॉ का रिजल्ट ठीक 31 अगस्त को आया।

भाग्य न होती तो लॉ का तीसरा और चौथा सेमेस्टर शायद पास ही नहीं कर पाता! जिस तरह चौथे पहर के ठीक पहले तीसरा पहर होता है वैसे ही 31 अगस्त से ठीक पहले अगस्त के कुल 30 दिन बीते। आखिरकार 31 अगस्त को जब भिंडी बाजार में पांच मंजिला इमारत के गिरने की रिपोर्टिंग में मैं व्यस्त रहा तो भाग्य का चहकते हुए फोन आया "डार्लिंग आप पास हो गये"!

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प्रिय सर,

वक्त की ऐसी मार है कि एक सांस में एक पोस्ट तक ब्लॉग पर नहीं लिख पाता! आज पांच सितंबर है।
ऐसे वक्त में भी आपको याद कर रहा हूं तो इसकी कुछ तो वजह होगी।

राम बहादुर सर एकमात्र वैसे व्यक्ति याद आते हैं जिन्हें मैं तहे दिल से बहुत पसंद करता था। उनकी चाय की दुकान थी और वह मुहल्ले के एक गरीब बुजुर्ग थे। उनकी दो बेटियां भी उसी स्कूल में पढ़ती थी जहां वह पढ़ाते थे। शायद अपनी बेटियों की पढ़ाई का खर्चा न उठा पाने के कारण वह उस स्कूल में पढ़ाकर हिसाब बराबर करते होंगे।

"Am" का मतलब एकबार उन्होंने कक्षा में पूछा था। शायद दूसरी या तीसरी की कक्षा थी। मेरे बगल में रवि बैठा था, उसने उसका मतलब "मां" कहा। मेरी बारी आई और मैंने "हूं" कहा। इस तरह Am का सही अर्थ बताने वाला मैं अकेला छात्र बना।

राम बहादुर सर ने कभी मुझे नहीं मारा। हमेशा मुझे उनकी आंखों में अपने लिए एक अलग जगह दिखती थी। वह मुझे सबसे ज्यादा प्यार करते थे और मुझे यह कहने में संकोच नहीं होता कि होश संभालने के बाद वह पहले ऐसे शिक्षक हुए जिन्हें मैं हमेशा याद रखता हूं।


आज भी लोहियानगर चौक से पूरब की ओर दो सौ मीटर चलने पर उनकी चाय दुकान है।

अंतिम शिक्षक जिसे मैंने बतौर  शिक्षक सम्मान दिया वह शिशिर सिन्हा हुए।

कक्षा में बेवकूफ दिखने के डर से सवाल न कर पाना और झिझक के कारण चुप बैठना एक आम बात है! शेयर बाजार एक ऐसी चीज थी जिसे मैं लाख कोशिशों के बाद भी नहीं समझ पा रहा था।

उस दिन भारतीय जनसंचार संस्थान में शिशिर सिन्हा गेस्ट फेकल्टी के रूप में आये और मेरी झिझक को समझते हुए न केवल मेरा मनोबल बढ़ाया बल्कि मुझे शेयर मार्केट की सारी तकनीकियों को भी आसान शब्दों में समझा दिया।

यह सब साधारण था। असाधारण वह बात थी जो इस दौरान हो रही थी। कक्षा के कुछ छात्र हंस रहे थे और मैं उनकी हंसी के बीच बार-बार सर को फिर से समझाने के लिए कहता जा रहा था और सर फिर से समझाते जा रहे थे आखिरकार अंत में मैंने एक बड़ी जंग जीती और यह संयोग ही है कि उस कक्षा के करीब तीन साल बाद मैं बतौर बिजनेस करसपोंडेंट डीडी न्यूज में नियुक्त हुआ।

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और अंत में ...


एक यादगार अगस्त...


Friday, August 18, 2017

Office Diplomacy




                                           A boss is a boss is a boss

The west offers two basic schools of thoughts on coping with the nonstate armed groups. The first, enemycentric approach suggests that such engagement is not fundamentally different from conventional warfare, in which the main effort is to neutralize armed units by locating and engaging them. “A war is a war is a war”, as a U.S officer once said.

The second approach is population centric, focused on gaining the support of the civilian population, a tactic known as “winning hearts and minds”, to deprive insurgents of their main source of support.

Interestingly, similar things happen in different offices – government and private. When a boss deals with another boss, he prefers enemycentric approach. They know that they cannot defeat each other as both are India and China and Dalai Lama recently rightly said in his inaugural lecture in the TISS that India and China cannot defeat each other.

They know that they are enemies still they wait time to pass until and unless one of them successfully gains support of the third power and launch direct attack like Germany did in London in midnight during World War II. The result of the joint attack in office comes out as transfer, suspension, force leave or demotion. So, ultimately complete neutralization of a Boss without any diplomatic tactic.

The second approach, which is population centric, is exercised by a Boss when he deals with a casual or contractual staff or non-permanent staff in any nature.


In this case, the boss is the Boss, he is neither a colleague nor a friend. He is the Boss is the Boss is the Boss. Very cautiously he recognizes his target. Always remember, All bosses except legends want to make a difference and that’s the reason why Private Boss and Government Boss are different. A private boss especially in Corporate or Private Firm has rich experience, which makes him a Boss and he doesn't need to do much to differentiate himself from rest of the bosses because his experience and gesture already differentiate him from rest of the bosses.

For example, an editor of a Newspaper generally has around ten years experience in reporting. On the other hand, in a government media, your editor may be a former engineer with an IT company.

So, let's understand how population centric attack is launched! Like India isolates Naxals from rest of tribal community, the boss does the same. For example, he'll say, "Why all issues occur with you only", "all people have problems but why your face is shaken always", "Why you're coming late even X,Y and Z come from L,M and N place but they never come late, etc". Very smartly he'll establish that how you're different from others and how you're alone irrespective of the fact that you're not alone at all and your issues are not exceptional.

Theodore Roosevelt, the 26th President of the United States had rightly said, "People ask the difference between a leader and a boss. The leader leads and the boss drives."