Tuesday, October 29, 2019

अतीत का पन्ना

                                               

                                                      अलविदा डीएलए!


नोएडा में जिस अखबार में इंटर्नशिप की, उसके बंद होने की खबर पाकर मन भारी हो गया।

डीएलए में की गई इंटर्नशिप एक औपचारिक इंटर्नशिप थी। औपचारिक इसलिए क्योंकि पत्रकारिता की औपचारिक पढ़ाई के बाद वह इंटर्नशिप की गई थी। हालांकि दिल्ली आने से पहले बेगूसराय में सिटी न्यूज, हिंदुस्तान, हिंदुस्तान टाईम्स, नवबिहार और सन्मार्ग के स्थानीय कार्यालय में प्रखंड से आ रही खबरों को कसना, प्रेस विज्ञप्तियां बनाना, रिपोर्टिंग करना वगैरह हो चुका था लेकिन दिल्ली में पत्रकारिता की पढ़ाई के बाद जो पहला इंटर्नशिप हुआ वह नोएडा के सेक्टर पांच में हुआ।

हरिराम गुप्ता, निधि गिल, विपिन उपाध्याय, हेमंत पांडेय, शशिकला सिंह, नीरज श्रीवास्तव, अरुण पांडेय, गौरव शर्मा, शशिकांत त्रिगुण, संजीव मिश्रा, प्रदीप सिंह, संतोष पाठक, संतोष कुमार, सूरज सिंह सोलंकी, दिनेश सिंह, किशोर और मोहित उपाध्याय सहित करीब पंद्रह लोगों का वह दफ्तर था। चार टेलीफोन, दर्जन भर कम्प्यूटर और उतनी ही कुर्सियों से बना हुआ वह दफ्तर एक अनुशासित दफ्तर था और उसे अनुशासित बनाए रखने का श्रेय अगर किसी को दिया जाये तो वह वीरेन्द्र सेंगर ही होंगे।

इंटर्नशिप में वीरेंद्र सेंगर जैसा संपादक मिलना उसे सुखद बना देता है। सेंगर सर सरल व्यक्तित्व के आदमी थे। कम बोलना और धीरे बोलना, इतना ही काफी है उनके व्यक्तित्व को समझने के लिए। एक मात्र कथन जो उनका तब था वह यह कि गलती ठीक है लेकिन उसकी पुनरावृति नहीं होनी चाहिए। कम शब्दों में कही गई बहुत बड़ी बात थी यह जो उनको एक कद के लायक बनाती थी।




जब अजय अग्रवाल का लिखा यह पत्र भड़ास की वेबसाइट पर पढ़ा तो सबसे पहले अजय अग्रवाल का चेहरा आंखों के सामने से गुजरा। आगरा में एक बार उनसे मुलाकात हुई थी। मुलाकात से पहले उनके बारे में दफ्तर में जो बातें हुआ करती थी उससे ऐसा लगता था कि वह मालिक हैं। 

नोएडा दफ्तर का काम हेमंत आनंद संभालते थे जो मेहनती थे। एक खुशगवार युवा की तरह उनकी जिंदगी दिखाई देती थी और उनके कुछ शौक थे जो उनकी जीवनशैली में भी झलकती थी। कुल मिलाकर एक समृद्ध परिवार के चिराग जैसी रौनक हेमंत आनंद के चेहरे पर हुआ करती थी। उन्होंने एक बार बहुत काम की बात कही थी जो मुझे हरदम याद रही। बात यह थी कि लीडर वह नहीं होता जिसे सबकुछ आता है बल्कि लीडर वह होता है जिसे यह पता होता है कि किसे क्या आता है। उन्होंने एमबीए किया था और उनका यह विश्लेषण सच में दमदार और तार्किक था।

बहरहाल, अजय अग्रवाल से मिलने के लिए जब आगरा गया तो उनसे मिलने से पहले नीरज पटेल से मुलाकात हुई। नीरज तब आगरा में ही किसी समाचारपत्र में काम कर रहा था और आईआईएमसी में हम दोनों साथ पढ़े थे। बातचीत के दौरान मालूम चला कि अजय अग्रवाल उस प्रजाति के बिजनेसमैन हैं जो चाय का भी हिसाब किताब किये रहता है। हालांकि हेमंत आनंद के बारे में ऐसी समझ मेरी बनी हुई थी एक घटना के बाद लेकिन अजय अग्रवाल के बारे में पहले से यह जानना अच्छा इस लिहाज से रहा कि जब मैं उनसे मिलने गया तो चाय की अपेक्षा तब नहीं की थी।

चूंकि डीएलए नोएडा के बंद होने की खबर तब दफ्तर में चर्चा में थी, बातचीत के क्रम में उन्होंने डीएलए आगरा में अंतर्राष्ट्रीय मामलों पर लिखने का प्रस्ताव दिया। मतलब यह था कि मुझे दिल्ली से आगरा शिफ्ट होना होगा। बेचैनी भरे उस दौर में फैसला लेना जटिल हुआ करता था। अस्पष्ट नतीजे पर पहुंचकर मैंने उनको विदा किया और फिर दिल्ली आकर उसी नोएडा दफ्तर में पहले की तरह काम करने लगा।

डीएलए बंद होने के पीछे वजह जो भी रही हो लेकिन डीएलए का बंद होना दुखद है। यह दुखद इसलिए है क्योंकि डीएलए जैसे अखबार इंटर्न के लिए आगे का रास्ता आसान करते हैं। शुरुआत जितने छोटे से हो आगे का रास्ता उतना ही आसान होता जाता है।

खैर! 

Monday, September 16, 2019

खामोशियां...

                                               
                                                    गुमनाम है कोई...!

नीलम शर्मा के निधन की खबर पर यकीन मुश्किल से हुआ। कॉलेज के दिनों में उनके एक शो में ऑडिएंस के बीच बैठकर सवाल करना और फिर बाद में उनके साथ कई बार लाइव रिपोर्टिंग करना, उनसे मिलना, दूरदर्शन के मुंबई गेस्ट हाऊस में ग्यारहवें तल उनके साथ जाना और उनके साथ काम करने वाले प्रोड्यूसर रमन हितकारी का किसी को फोन करके यह कहना कि यह कमरा रहने लायक नहीं है, वगैरह कई चीजें दिमाग में बारी बारी से घुमने लगी।

अप्रैल में जब चुनाव का कवरेज करने के दौरान अमरावती गया था तो बोरियत दूर करने के लिए संत गाडगे बाबा अमरावती विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में बैठने का निर्णय लिया ताकि पत्र पत्रिकाएं पढ़कर मन को बहलाया जा सके। अंदर की प्रक्रिया थोड़ी सरकारी थी। एक आवेदन देना और फिर उसपर हस्ताक्षर करना फिर उसे लेकर इधर से उधर जाना जैसा।

इसी बीच लाइब्रेरियन पर नजर पड़ी तो उनके केबिन में गया और अपना परिचय दिया। औपचारिकता के बाद उन्होंने जो पहला नाम लिया वह नीलम शर्मा का था। वह अचानक उस ब्लैक एंड व्हाइट दौर मं पहुंच गये जब दूरदर्शन ही एकमात्र चैनल हुआ करता था। उन्होंने नीलम शर्मा से जुड़ी स्क्रीन की कई यादें गिनाई। आलम यह हो गया कि मैंने नीलम शर्मा को वहीं से फोन कर दिया लेकिन पुस्तकालय में नेटवर्क न होने की वजह से मुझे उन्हें यह बताने के लिए परिसर में आना पड़ा कि महाराष्ट्र के विदर्भ के एक पुस्तकालय में मैं उनके एक प्रशंसक के सामने बैठा हूं। हालांकि मैं उस लाइब्रेरियन से उनकी बात तकनीकी कारणों से नहीं करवा पाया, जिसका खेद मुझे उस दिन के बाद भी रहा।

खैर, समय अपनी गति में चलता रहता है।

अलविदा नीलम शर्मा 
अब जब नीलम शर्मा राख हो चुकीं है जिंदगी के दर्शन को लकर मन में अचानक एक नई तरंग सक्रिय हो गई है। पिछले दिनों उनके साथ काम करने वाली एक एंकर मुंबई आई और खाना खाते हुए उसने बताया कि दफ्तर में भी किसी को नीलम शर्मा की बीमारी के बारे में जानकारी नहीं थी।

इसका एक मतलब साफ है कि दफ्तर में कोई भी उनके करीब नहीं रह पाया दशकों के उनके दफ्तर में उनके होने के बावजूद।

इस गोपनीयता का एक अपना दर्शन है। आदमी अपनी निजता को लेकर अतिरिक्त सतर्कता तभी बरतता है जब वह बाहरी दुनिया से किसी भी तरह की उम्मीद होनी बंद हो जाती है। खुद को किसी के साथ साझा करना अत्यंत ही जोखिम भरा काम है, खासकर महानगरों में काम करने वाली किसी महिला के लिए, जिसकी लोकप्रियता इतनी हो कि उसके निधन के बाद सारे समाचारपत्रों में खबर छपे और लोग सोशल मीडिया पर लंबी चौड़ी पोस्ट लिखकर उनके व्यक्तित्व के अनछुए पहलुओं का जिक्र करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए कतारबद्ध हो जाएं।

नीलम शर्मा मरी नहीं हैं बल्कि गुम हो गई हैं। वह पहले भी गुम थीं, अब भी गुम हैं। कोई तो ऐसा व्यक्तित्व का पहलू उनका जरूर होगा जो उन्होंने शायद किसी से साझा नहीं किया वरना आज जब लोग रक्तदान करते हुए भी फोटो खिंचवा कर सोशल मीडिया पर डाल देते हैं, ऐसे में ब्रेस्ट कैंसर जैसी बीमारी को जीते हुए एक संजीदा महिला भला कैसे बिना किसी को बताये कोई इस तरह कैसे मुख्यधारा से हाशिये की तरफ खिसकते हुए गायब हो सकता है।

बहरहाल, उनकी गुमनामी ही नया दौर है, जहां आज वह हैं, कल कोई और था और कल कोई और होगा।

Wednesday, August 7, 2019

अचानक

                                            ऐसी कहानी!

तुलसी जैसी फिल्म शायद ही कोई दूसरी होगी। इतनी दर्दनाक फिल्म की स्क्रिप्ट किसी न किसी जिंदगी में भी कभी न कभी जरूर ही लिखी गई होगी। हो तो यह भी सकता है कि उससे भी कराहती हुई कहानी किसी ने जी ली हो, कौन जाने!

फिल्म को एक सांस में पूरा देखना बहुत मुश्किल है। मुमकीन ही नहीं है एक तरह से। इस तरह किसी ताजा विधवा का अपना बच्चा किसी को सौंपना यह जानकर कि वह खुद भी मरने वाली है, अति से भी आगे है यह तो!

इरफान खान का तो वैसे भी जवाब नहीं है। जादुई अभिनेता हैं। उन्हीं की झलक देखकर यह फिल्म देखने का मन किया और हमेशा की तरह इरफान ने निराश नहीं किया। मनीषा कोईराला खुद ही कैंसर को अनुभव कर चुकी हैं ऐसे में उनपर यह फिल्म सूट भी करता था।

फिल्म देखने का समय शायद गलत चुना मैंने वरना इतना इमोशनल नहीं होता।

खैर!

                                                     

Monday, August 5, 2019


                क्या देंगे हम अगली पीढी को

अर्थिंग में पानी देकर वोल्टेज बढ़ाने से लेकर एंटीना घुमाकर ब्लैक एंड व्हाईट टीवी में पिक्चर की गुणवत्ता सुधारने तक के उस दौर में कई ऐसी घटनाएं नियमित होती थीं जो शायद एक दौर के बाद स्मृतियों से ओझल होने लगेंगी।

कल जिसे कई जगह चापाकल कहा जाता था, अब कहां दिखती है! कहां दिखता है लैंडलाइन फोन जिसके तार दिवालों की खूंटियों से होते हुए फोन तक आते थे और कहां रहा वह रोमांच जो लैंडलाइन फोन के रिंग सुनकर आता था।

रेडियो का न अब वह एंटीना है जिसे तीन स्टेप में खींचकर लंबा करके ऊपर की तरफ किया जाता था और न ही फिलिप्स का वह टेपरिकॉर्डर है जिसमें एक कैसेट में ही कई तरह के गाने उलट-पुलट कर सुने जाते थे। एक तरफ का खत्म होने पर एजेक्ट करके कैसेट को बदलना और गाने की आवाज में गड़बड़ी होते ही उसे बंद करके फंसे रील को पेचकस से निकालकर ठीक करना, हेड को थूक लगाकर साफ करना और वापस गाना लगा देना।

आसपास के लड़कों का किसी के घर पर जुटना और कैरमबोर्ड खेलना, अब कहां हो पाता है! 

यह कैसा दौर आ गया है जहां इतना सूनापन और तनाव के बीच खुशी का नामोनिशान तक मिट चुका है। हर आदमी क्यूं झूठा लगता है और हर चीज क्यों संदिग्ध लगती है! क्यों किसी का फोन लेने से पहले खुद को मानसिक रूप से तैयार करने की जरूरत होने लगी है और क्यों किसी से कुछ साझा करने से पहले दिल बगावत पर उतरने लगा है!

अगली पीढ़ी के लिए खुशी का कोई ठिकाना खोजना इतना मुश्किल सा हो चुका है। घर में नया लैंडलाईन लगना, नए गैस कनेक्शन मिलना, नया टीवी आना, नया आलमीरा आना, नई साइकिल आना,पहली बार ट्रेन पर चढ़ना ये सब में जो खुशियां थी क्या नई पीढ़ी को वही खुशियां इन चीजों में उसी अनुपात में मिलेगी? क्या नई पीढ़ी को क्रिकेट खेलने के लिए पास में ग्राउंड मिलेगा! महानगरों में आसपास जगह नहीं होने के कारण घर के ऊपर घर चढ़ते जा रहे हैं, ऊपर तक भर जाने के बाद का क्या होगा? तबाही!

Wednesday, June 19, 2019


                                                      अलविदा प्रवीण!

कॉलेज के वाट्सएप ग्रुप के चैटबॉक्स में करीब तीन सौ मैसेज पड़े थे। सवेरे अचानक कई लोग एक साथ टाईप करते दिेखे, आमतौर पर ऐसा किसी के जन्मदिन या किसी त्यौहार में बधाई देते समय होता है जब सबलोग बारी-बारी से औपचारिकता निभाते हैं और इस क्रम में कुछ लोगों की टाईपिंग दूसरे से टकराती हुई भी दिखती है, लेकिन इस बार ऐसा नहीं था। प्रवीण द्विवेदी की मौत हो चुकी थी और उसी से जुड़े हुए चैट वहां हो रहे थे।

प्रवीण के फेसबुक पर किसी से खोजा तो कुछ दिनों पहले किया हुआ उसका एक पोस्ट दिखा।

                                    "नसीब का लिखा, वह लिखकर जिससे राफ्ता न हो,
                                    समुंदर तो समुंदर रहा पर साहिल अब साहिल न रहा।"

पढ़ते हुए ऐसा लगा कि प्रवीण इसे अपनी आवाज में सुना रहा हो और वहां दूर-दूर तक कोई नहीं हो। कल ही "द फॉल्ट इन आवर स्टार्स" फिल्म देखी थी। अगस्टस अपनी मौत से पहले एक बनावटी अंत्येष्टि आयोजित करता है और वहां अपनी तरह ही कैंसर से जूझ रहे दो दोस्तों को बताता है जिसमें से एक होती है हेजल, जो कि उसकी दोस्त बन जाती है और दोनों गहरे प्यार में पड़ जाते हैं। हेजल खुद भी कैंसर के बुरे दौर से गुजर रही होती है।

प्रवीण की जिंदगी में बाधाएं कॉलेज के समय से ही दिखनी लगी थी। वह एक पैर से विकलांग था। आमतौर पर वह आशुतोष मणि त्रिपाठी के साथ ही ज्यादा दिखता था और दोनों की अच्छी दोस्ती भी थी। आशुतोष अंदर का ठीक लड़का था हालांकि उन दोनों की दोस्ती की वजह का कभी पता नहीं चला।

प्रवीण द्विवेदी को प्यार से सब पीडी कहते थे। ग्रुप में भी उसके बीत जाने की खबर पीडी के नाम से ही आई, जो सबको बारी-बारी से चौंका गई। पिछले कुछ महीनों से वह बीमार था और डॉक्टरों से उसे ब्रेन टीवी का मरीज बताया था। मुश्किल से बत्तीस-तैंतीस की उम्र में आईआईएमसी बैच 2010-11 ने अपने एक जवान साथी को खो दिया। प्रवीण तीसरा है। प्रवीण से पहले सागर मिश्रा और अंशु सचदेवा अलग-अलग वजहों से आत्महत्या कर चुके हैं।

प्रवीण ने क्या जिया, कितना जिया, कबतक जिया यह सब उसके नजदीक रहने वाला ही कोई इंसान बता सकता है लेकिन प्रवीण जिस तरह से गया उसके पूरे बैच को और भी खाली कर दिया है।

एक वाक्या याद करते हुए आशुतोष बताता है कि उसके रूममेट ने एक नया किराये का कमरा देखा था जो चौथे फ्लोर पर था। प्रवीण से जब उसने पूछा तो वह खुशी-खुशी राजी हो गया। इतना ही नहीं कई बार चाय पीने के लिए वह झट से नीचे भी आ जाता था। यह सब तब था जब उसका एक पैर नकली था और उसे उतनी सीढियां चढ़ने के लिए अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ती थी। उसकी जिंदादिली के कई किस्से उसके साथ ही चले गये।